Friday, August 30, 2013

कुर्सी: एक कुर्सीजघन्‍य निम्‍नतम निबंध..

(कुर्साभाव में सीयाइन नदी की छाती दलते हुए, किन्‍हीं प्राचीनतम क्षणों में)
कुर्सी ज़रूरी है. जितनी अच्‍छी टिकाऊ और खूबसूरत होगी उतने ही अच्‍छे टिकाऊ और खूबसूरत आप भी होंगे. बड़ा सीधा सम्‍बन्‍ध है. आप जितना ज़रूरी अपने लिए हैं उससे ज्‍यादा ज़रूरी आपके लिए कुर्सी है. सारा कारोबार ही कुर्सी-अनुप्राणित है (अब अनुप्राणित का मुझसे अर्थ मत पूछिये. अनुप्राणित का अर्थ जानता होता तो मेरे कदम्‍ब नितम्‍ब के नीचे एक सुगठित प्रोफेसरायी गदरायी अहा इठलायी कुर्सी होती, नहीं होती? नहीं है). तो पहला नियम तो यह कि कुर्सी को किसी भी सूरत में मत छोड़ि‍ये. ऑफिस में तो भूलकर भी नहीं. सारे काम छूट जायें, छंटते छूटते रहें, कुर्सी किसी सूरत न छूटे. एक बार छूट गई तो दुबारा मालूम नहीं कहां, किसके चैम्‍बर में पायी जाये. दुबारा मालूम नहीं आप कहां पाये जायें. मेरे यहां गिड़गिड़़ाते नहीं ही आयें, कि भइय्या जी, बड़ा ग़ज़ब हो गया, मिनिट भर को खिड़की पर शीशा सूंघने गये रहे और इतने में.. इतने में ही तो आजकल सब होता है! इतने में ही तो आपको मनुष्‍य होने की अनुभूति होती है. इतने में ही तो आपको याद आता है कि बीसियों घंटों की हाय-हाय मचाये हुए आप अपनी कुर्सी से एक मर्तबा हिले तक नहीं हैं! तो इतने में को कम करके मत आंकिये. इतने में आपकी बीवी आपको एक मर्तबा आकर आंक गयी तो फिर आप कहीं के जहीं भी रहें, अपनी बीवी के तो नहीं ही रहेंगे. फिर आपकी बीवी और घर में उसकी कुर्सी होगी, आपका घर होगा, आप उस घर में कहीं नहीं होंगे. कवि ने वक्रोक्ति में गान कहा है ‘लोगों के घर में रहता हूं, कब अपना घर होगा,’ ऐसे मौकों के लिए ही कहा है. वक्रोक्ति का अर्थ भी मुझसे मत पूछिये. बात कुर्सी की हो रही है और बेहतर हो हम कुर्सी से हटे नहीं. (अपनी ज़रुरत के हिसाब से यहां मेरी तरह पूर्ण विराम की जगह आप विस्‍मयबोधक चिन्‍ह बरत सकते, या नहीं भी बरत सकते हैं. आपका जीवन स्‍वयं एक विस्‍मयबोधक चिन्‍ह हो तो ऐसे में अच्‍छा यही होगा कि आप विस्‍मयबोधकों को छिपाकर ही रखें, मतलब स्‍वयं को स्‍वयं से छिपाते रहें. मतलब अपने को अपने में कम, कुर्सी में ज्‍यादा देखें.)

कहीं भी खड़े रहिये (पहली कोशिश तो यही करें कि खड़ा होने का काम दूसरों को करने दें, अपने को कुर्सी में जड़ने का काम दें), चौंकन्‍नी नज़रों से ताड़ि‍ये कितनी कुर्सियां हैं, आपकी पहुंचायी वाली किधर है. एक बार इतना लोकेट हो जाये, इसके बाद उसे ओझल होने मत दीजिए. एक बार आया मौका फिर दुबारा नहीं आता (संदर्भ: ऊपर लगी मेरी फोटो को देखिए, सौंदर्य और कुर्सी की विनम्र अनुपस्थिति, विस्‍थापन को देखिए, सीयाइन नदी की पुलिया पर लेटा में, आने का एक मर्तबा पाया था, दुबारा फिर पा नहीं सका हूं. न ही अपना वह खोया हुआ काला चश्‍मा. कुर्सी तो ख़ैर तभी विस्‍थापित थी. तो अपने गाढ़े अनुभव की रौशनी में कह रहा हूं), जैसे एक बार गया वसंत फिर नहीं आता, पास्‍काल और प्रूस्‍त नहीं आते. प्रमोद सिंह आते हैं लेकिन साथ ही साथ यह भाव भी चला आता है कि कुर्सी कहां है. नहीं है. कुर्सी के अभाव में आना ‘आने’ में परिगणित नहीं हो सकता. परिगणित का अर्थ मुझसे नहीं, रामजस कालेज के सियाराम तिवारी से पूछिये.

एक बार हाथ आ जाने पर कुर्सी का ओर-छोर जान लीजिए. ऐसा न हो नितम्‍ब आपके कुर्साश्रित हों, और ओर-छोर अन्‍यान्‍याश्रित. वह ग़लत होगा. फिर आप भी अन्‍यान्‍याश्रित ही होंगे. पूरा मुल्‍क अन्‍यान्‍याश्रित हुआ खड़ा है, कम से कम आप खुद न हों. पहला काम करें उसकी गद्दी टटोलकर देखें. उसकी मजबूती. फिर कुर्सी के पाये पटककर देखिए (अपने को पटककर मत देखियेगा. करने के पहले सोचकर काम करिये कि कर क्‍या रहे हैं. आशा और राम को आसाराम से मिक्‍स मत करिये. पटकने और पीटने से अलबत्‍ता कर सकते हैं). कुर्सी को बचाने के लिए यूं भी ज़रूरी है बीच-बीच में पटकना, और पीटना. पिटना नहीं. हालांकि कुर्सी बचाने के लिए बीच-बीच में वह भी ज़रूरी हुआ ही जाता है. मूल सवाल है कुर्सी बची रहे. भले आप गड़ही में खड़े रहें. या अतल, अंतहीन समंदर के गाढ़े ठंडेपने में. दिमाग दलदल हो रहा हो, जीवन प्रतिपल दल बदल रहा हो, आप जितना भी हिले हुए हों, बस कुर्सी अपनी जगह से हिल नहीं रही हो!

13 comments:

  1. ये सस्ता संस्करण जरूर लोकप्रिय होगा। बेस्ट सेलर ऑफ द इयर। बाई गॉड की कसम।

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    1. अरे, अनुधारा किरिया, सच्‍चो? मने छै सौ पाठक लोक का बाधा-दौर हम पार जायेंगे? धूर-धुसरित दिन भुलाय के 'मेरे गर्दिश के दिन' के निर्मल भर्मा सोहानी लेखनी के दिन सब नजीके आ रहा है?

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    2. दम्मै, परमोद बाबू। निस्फिकर होकर लगे रहिए इस नेक काम में।

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  2. ई फोटो में एक ठो इन्फ्लेटेबल तकिया का दरकार है :)

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    1. बंगलोर से, या बांसीयेपुर से, एगो भेजा नहीं सकती थीं?

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  3. फ़ोटू अच्छा है। आशा और राम के बीच कुर्सी का भी कभी-कभी कीर्तन करने का मन होता होगा!

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  4. कुर्सी की आत्मा बैठने वाले में समाई गयो रे। मानसिक रूप से चार पैर वाला।

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  5. बहुत अच्छा कुर्सी पुराण .
    http://dehatrkj.blogspot.com

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  6. जांघ में दबी कुर्सी की कसावट बनी रहे औ कुर्सी के दम पर अपनी कसावट से औ उस कसावट से कुर्सी बनी रहे

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  7. अरे हमारा कमेंटवा कुर्सी की तरह गायब कहां हो गया

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  8. "पूरा मुल्‍क अन्‍यान्‍याश्रित हुआ खड़ा है, कम से कम आप खुद न हों."
    ***
    "अन्‍यान्‍याश्रित"
    वाह, क्या यूनिक व बढ़िया शब्द है स्थिति को कह जाने के लिए...

    शब्द, भाव, व तथ्यों की धनी लेखनी को बारम्बार प्रणाम.

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  9. अहा...जै हो महराज!! थोडा कंफ्युजनग्रस्त हुआ...इस पबित्र चित्र मे किसी अद्रुश्य कुर्सीग्रसित हो कर उसे बेड़ा कर लम्बलेट मुद्रा मे दिब्य छटा बिखेरते हुए अपने काले चस्मे से कम्बखत दुनिया के काले करेजे पर छुरियां तेज कर रहे हैं?..या सच मे किसी स्टूल पर वज्रासन धारते हुए भारत सरकार की रीढ रज्जु की तरह एक्दम सीधे एटेन्शन अवस्था मे है....गर्दन घुमा घुमा के देखने मे लगता है कि बैकग्राउंड मे सेआइन माई नैंटी डिगरी पर पोज बनाती आपकी बैक पर बालपेपर अबस्था मे आ गयी हैं..!!!! वैसे टाइटिल से सेँटीग्रस्त हो कर दमसाध पूरा निबँध बाँच गया.. कि कुर्सी की अवतारगाथा मे कही बवासीर जैसे भकुआये बिल्लेन का भी जिकर होगा...मगर लगता है निबँध का सीक्वेल आना बाकी है!!...जरा व्यासगद्दीआसन पर और भी प्रकाश डालिये... कि किँचित कुर्सीफाइड क्राइस्ट के टेस्टीमनी अपन भी बाँचेँ... :-)

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    1. मगर कुर्सीजघन्‍य अपूर्बनयन, इतनी देर मैं एक निबन्‍ध में लगा रहूंगा, तो मेरी कुर्सी मुझमें लगी रहेगी? आज के समय में? कुर्सीब्राइट बाइट्स का सोच रहे हो?

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