Friday, August 16, 2013

जीवन छूटता है, मकान नहीं छूटता..

जीवन हारकर साथ छोड़ देता है, मगर एक मर्तबा मकान में घुसने के बाद किरायेदार कब्‍बो मकान छोड़ता है, कहां छोड़ता है जी? छुड़ाने की, और न छोड़ पाने की, एक अंतहीन, दीन, संगीन, गुफ़्तगू के महीन, रंगीन तानें चलती हैं, किरायेदार कहीं नहीं चलता..

8 comments:

  1. “जब तक हम आपका एक-एक प‍इसा नहीं चुका देंगे तबतक आपके घर से नहीं निकलेंगे।”
    वाह क्या बात है। बेचारा मकान मालिक... :(

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  2. thank you...thank you...thank you.
    ये वाला मेरा बहुत फेवरिट है. मज़ा आ गया.

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  3. जय हो..जय हो। मकान नहीं हैं न, प्राण हैं हम इस मकान के।

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  4. arey waah...! Itna purana wala nikale....maja aa gaya. :)

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    1. बंगलोर जाके मगर पिछवां कितना सारा लोर छोरे गये, ई तुमको, मगर, बाबू, कहंवा बुझाता है..

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  5. मकान मालिक और किरायेदार बने रहे। ये जीवन बना रहे। :)

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