Friday, August 9, 2013

मुबारक मुबारक

फोटो: FB पर नीरज शाह की दीवाल से
वो कुछ अच्‍छा-अच्‍छा बोलने की मंशा लेकर आये थे, लगे हाथ अच्‍छा सुन लेंगे की कहते हाथ दबाते, मुस्कियाते, लहराते चले आये थे, आते ही लात-हाथ फेंकने लगे, थोड़ी मुझको बहुत ज्‍यादा मुझे मेरा कच्‍छा-बनियान दिखाने समझाने लगे, मतलब आसपास के सब जहान को धो-धोकर पिलाने लगे, हाथ ऊपर किये मैं लपककर अलमारी चढ़ गया, गिड़गिड़ाता बौराने लगा, आज ईद है, भाई जान, कटोरी-भर सेवइयां नहीं लाये, ठीक है इतना ग़म हम घोलकर पी लेंगे, पीकर घुलते भूलते रहने की आदत है, मगर यह देगची और ओसारा-भर गालियों में तो मत नहलाइये, त्‍यौहार का दिन है आज तो मुंह की इस डेढ़ कटोरी जर्दा से बाज आइये. लहराकर अलमारी से नीचे खींच वो मुझको बतलाने, नज़ारों की रंगीनी में गिराने लगे, ससुर कितने भोले हो, अनामिका के फेलियर तीसरे आशिक, अनमनाईन पुर के शोले हो, डेढ़ हाथ की कुरती औ’ छौ हाथ की बेचारगी में तीज औ’ त्‍यौहार फिराने निकलते हो, आईने में दीखता है चेहरे की रंगत कैसी उड़ी हुई है, अबे कपूरशंख, क्‍या खाकर ईद मनाने चलते हो, चिरई के कपार पर हाथी का भंडार लादे का क्‍यों तुम्‍हें शौक चर्राये रहता है, हम कहते हैं मुंह पर रुमाल बांधे चुप्‍पे पटाये रहो तो मुंह पर लाली डाले मुबारक जिंदाबाद बोले का खौफ़ कैसे, कहां से तुमको अटकाये रहता है. हाथ-मुंह धो लो, गली की गुमटी से एक उधारी की बीड़ी पिये आयेंगे, लगे हाथ कोई मिल ही गया जो तो साथे ईद की सेवइयो पायेंगे!

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