Thursday, August 8, 2013

ओट की ओट..

फोटो: https://www.facebook.com/nirmal.poddar.7
‘ई कौची है, बुच्‍चन’, मुंह में पहला चम्‍मच डालते ही मौसा का चेहरा बिगड़ गया, ‘सुबहै-सुबा बकरी बनाये ला हमहीं भेंटाये थे जी?’

मौसा सच्‍ची के मौसा नहीं थे, न उनकी अपनी कोई मौसी थी, वह तो चंदन उनकी खड़खड़ि‍या स्‍कूटर के पीछे दौड़ता उनको ‘फिर तेल चुआ रहा है, मौसा?’ पुकारता रिसाया करता था, उसी की देखादेखी सबके बीच मौसा नाम पड़ गया.

‘ओट का उपमा है,’

‘ओट का है? सामने का नहीं बना सकती थी?’ वइसही घबराये, मुंह से चम्‍मच की डेढ़ बित्‍ता की दूरी बनाये मौसा बुदबुदाये.

मेरा माथा गरमा गया. वइसही सुबह से सुग्‍गा रंग का सलवार और नारंगी कलर का ओढ़नी डाटे भागाभागी में हलकान हो रहे हैं, कौनो एक्‍को मर्तबा नहीं पूछिस कि नवका सलवार कब सिलाइस रे रंजु, और हियां नया रेसीपी आगे पेश करके दो तो पीछे-पीछे फिर एसप्‍लेनिंगो करते चलो! रहते-रहते, सच्‍चो, मन उचिट जाता है ई घर में, लेकिन फिर घर छोड़ के लइकी जात जाये कहां?

‘आपौ मौसा, छुपाये वाला नहीं, खाये वाला ओट है! अमरीका में ऊ सब खाता है, आपका किस्‍मत है आपको बनाके खिया रहे हैं तो आपको बुखार छूट रहा है, एक बार परीक जाइयेगा त फिर आके रोज हमसे निहोरा करते रहियेगा, नहीं खाये के है त रख दीजिए प्‍लेट, नौटंकी मत बतियाइये!’

मैं टुटका मोढ़ा खींचकर बैठ गई, नारंगी ओढ़नी से गाल और गरदन का पसीना पोंछने लगी. मौसा प्‍लास्टिक वाली कुरसी पर संभलकर प्‍लेट का उपमा संभालने लगे. धीरे-धीरे हिम्‍मत बांधकर दो चम्‍मच मुंह के अंदर किये. लेकिन चेहरे का गड़बड़ाया रंग गड़बड़ाया ही रहा.

हमको सुतपा पर गुस्‍सा आ रहा था. मुंहजार कहीं की, खुद कीनी नहीं, हमके पट्टी पढ़ाके साठ रुपैया का कोट कीनवा दी! कोट नहीं, ओट! अउर हियां कोई खइय्ये नहीं रहा है! चंदनवो डेढ़ चम्‍मच छूके प्‍लेट सरका दिया, अम्‍मा, देखी न तुम, हम परौठा मांगे त अंड-बंड का खेला करके सबको भुक्‍खा मार रही है?

‘अब अमरीका वाला तगड़ा खाना हियां का छकड़ा-छकड़ी पेट से पचेगा, हो,’ मुंह में फिर से एक चम्‍मच डालने की हिम्‍मत करके मौसा बोले, मुंह अलबत मेहराया ही रहा, ‘ऊ पेप्‍सी-लेप्‍सी अउर कोला-ठोला का बात अलग है, नाक दाबके आदमी नीचे गिरा लेता है, तीन ठो डकार छोड़के मामला खलास, मगर ई ओटवा त बुच्‍चन,’

‘अइसा मुंह में गड़ रहा है त रहे दीजिए,’ हमको मौसा पर ममता छूट गया, ‘बाद में चुन्‍नन या बंटिया खा लेगा, या लाइये, बकरी का कटोरा में बसिया दाल के संगे फेंट के डाल देते हैं?‘ खीझ में मैं दन्‍न से उठी और पीछे मोढ़ा उलिट गया.

मौसा ‘ना-ना, ना-ना’ बोलते प्‍लेट पीछे खींच लिए.

मैं डरकर ठहर गई, कि कहीं ऐसा न हो कि मौसा को लिए-दिये पुरनकी प्‍लास्टिक की कुरसियो जवाब दे दे! इस घर की कौनो एक चीज का भरोसा है जी, न्‍न्‍ना!

मौसा के हिम्‍मत को दाद देना पड़ेगा, दू चम्‍मच अउर ओट का गरदन का नीचे उतार लिए, ऊपर से मुस्‍कराकर बोले, ‘पुरनका जाति का लोक है न, बुच्‍चन, नवका ची सब पचाये में अड़चन त पड़बे न करेगा हो? मंजरी का शादी में ऊ मर्तबा हम मोजा पहिन लिये त चाम में तीन दिन कइसा आगी फूंक दिये रहा? अब धीरे-धीरे न आदत पड़ता है जी? अब रंजन नक्‍शा में हमसे शिलांग खोजने को पूछ दिये थे त हम अंततोगत्‍वा खोज लिये कि नहीं? शिलांग आखिर भारते में न है जी, हमसे पकड़ाता कइसे नहीं? अमरीको पकड़ायेगा, पकड़ायेगा कइसे नहीं, ई दुनिये में न है, बुच्‍चन?’

(धीरे-धीरे बदलती दुनिया के बाहर एक अमरीका होता है जो कटे-पिटे सपनों में लौट-लौटकर पकड़ाता रहता है, मगर उससे भी बहुत-बहुत बाहर कई सारी और दुनिया होती है, शिलांग, सियाटल, शांघाई से दूर, ओट की ओट, पहचानी आवाज़ों से, अभ्‍यस्‍त पहचानों से दूर, वह कैसे पकड़ायी में आता है?– स्‍वामी अपूर्णानन्‍द )

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