Wednesday, August 7, 2013

दिल्‍ली जो शहर है..

दिल्‍ली की अय्यारी और नयी उमर की उसकी अय्याशियों पर दो वर्ष पहले राना दासगुप्‍ता ने एक अच्‍छा निबंध लिखा था, ज़ाहिर है अंग्रेजी में लिखा था, जैसाकि नीलांजना रॉय एक दूसरी अय्यारी के संदर्भ में कभी पहले लिखती हैं, और दासगुप्‍ता जैसे विशिष्‍ट की नहीं, आम लिखनेवालों की बाबत कह रही हैं, “And as this generation begins to tell and write its stories.. There are 125 million English speakers, of whom a much higher percentage has made it their first language in the decade since the Census data (2001) was collected, a number large enough to make its own marketplace. If that happens, this new generation of writers might finally be able to step away from the debates that have come down across a century-and-a-half of Indian writing in English,” और जैसाकि किसी और ने कहा है, कहने को मैं भी कहे जाता हूं, कि ‘भारत के बारे में लिखना अंग्रेजी में ही लिखना होता है’, इतर ज़बानों में लिखा राष्‍ट्रीय प्रसंग नहीं बनता, न उस छोटे लघुकाय ‘भाषायी लिखाई-पढ़ाई’ समुदाय से बाहर किसी के ध्‍यानाकर्षण की वज़ह बनता है.

‘राष्‍ट्र एक राष्‍ट्रीय भाषा से बनता है’ यह जिसने भी कहा था वह भारत आकर देख सकता है कि गुनगुनाने, गाली और गोली चलाने, माल बेचने, खरीदने की भाषा जो भी हो, विचार-वितरण की भाषा अंग्रेजी ही है. और इसके बाबत (वैसे ही जैसे हिंदी की महान, व महानतम किताबों की बिक्री का वास्‍तविक आंकड़ा क्‍या है, और हिंदी कविताओं की किताब कौन खरीद रहा है, और अंग्रेजी ‘जान चुके’ कितने अभिभावक हैं जो अपने घर के बच्‍चों को हिंदी साहित्‍य में ‘दीक्षित’ करने का उत्‍साह रखते हैं, की बाबत) लोग दिखावे में कितना ही गाल बजावें, भीतर की असल वास्‍तविकता क्‍या है से सब खूब परिचित हैं. पिछले हफ्ते फेसबुक पर जैसे एक पंजाबी (अंग्रेजी) के स्‍टैंड-अप कॉमिक ने तीन शब्‍दों का एक स्‍टेटस छोड़ा था, ‘आंध्रप्रदेश गया तेलंगाने’, तो कुछ उसी तर्ज़ पर हिंदी के तेल लगाने गये को भी अब एक ज़माना हो गया है. उस हिंदी को हो ही गया है जिस हिंदी के पीछे कॉलेजों में मास्‍टरी पायी जाती है, आलोचना के ग्रंथ लिखे जाते व पुरस्‍कार-प्राप्ति की कवितायें लिखी जाती हैं. एनीवे, दिल्‍ली व राना दासगुप्‍ता से बहकता कहां मैं फिर हिंदी की तिलकुटई में उलझ गया.

दिल्‍ली की नयी अय्यारियों पर राना दासगुप्‍ता का दिलचस्‍प लेख अंग्रेजी में है, और ऑनलाइन ग्रांटा के वेबसाइट पर है लेकिन सब्‍सक्रिप्‍शन की मांग करता है, गनीमत है राना ने उसे यहां चढ़ा रखा है. एक और दिलचस्‍प लेख शहर नहीं, व्‍यक्ति (आईआईपीएम के अरिंदम चौधुरी) पर सि‍द्धार्थ देब ने लिखा था, मान-हानि के अदालती टंटे में जिस पत्रिका के लिये वह लेख लिखा गया था, पत्रिका ने अपने वेबसाइट से उसे हटा लिया है, यही नहीं संदीपन की निबंधों की जिस किताब का वह पहला निबंध हुई थी, देख रहा हूं उसके भारतीय प्रिंट-संस्‍करण से भी वह गायब है, गनीमत है किसी जुझारु बच्‍चे ने उसे नेट पर अभी तक बचा रखा है, कभी फुरसत निकालकर धीरज से उसे यहां बांचिये.

बाकी फिर बांचने को रामसुजान सुमिरन शास्‍त्री की कबीता है ही:

हिंदी गयी है तेल लगाने
एक जोम है एक थानवी
बकिया बाढ़ है कुकुरमुत्‍ता
पटने सतने बरेली अपने
हंसने-हंसाने अलख जगाने
इधर दिखाने उधर लगाने
वर्ष के गिनके तीं झुनझुने
बारी-बारी उनको पाने.

3 comments:

  1. बांचियेगा राना को भी धीरज से ही, वैसे ही उस वेबसाइट के अक्षर किसी अन्‍य ग्रह से आयातित महीन हो रहे हैं, और दिल्‍ली के दिल की तकलीफ़ों की दुनिया भी कोई कम महीन नहीं है.. हमारी शुभकामनाएं..

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  2. अाजकल राना दासगुप्ता दिल्ली के नवधनाड्‌यों पर एक वृहत पुस्तक भी लिख रहे हैं।

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  3. @अच्‍छा है, मिहिर, 'सोलो' के बाद राना जितना 'दिल्‍ली खोलो' हों. अच्‍छा होता हिंदी में भी कोई ऐसे उत्‍साही होता. महत्‍वाकांक्षी नैरेटिव के फेर में निकलता..

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