Sunday, August 18, 2013

कैसे, मगर कैसे, कर लेते हैं?

यह खाने का ब्‍लॉग है, यह घूम आने का. यह अरमानों का, यह ज़मानों का. यह ऊंट को बहलाने का,  यह शहंशाही जताने का. यह विज्ञान में रमने और ज्ञानगुण गुनगुनाने का. यह फिर बने रास्‍तों से निकलकर ज़रा दुनिया झांक आने का..

फिर एक यह जगह है स्‍वीडी कविताओं को हिंदी में बांच पाने का. ज़ाहिर है आप ही के लिए है, मैं तो हिंदी की भी नहीं थाह पाता. जिसे कविता समझकर लिखता हूं उसे समझधनीगण कविता की तैयारी का मसौदा-पत्र पढ़ने और तदर्थ मंतव्‍य सजिस्‍टि‍याने लगते हैं. उनका क़सूर नहीं है. हाथ के बहकने का मुझमें पुराना दोष है. सातवीं कक्षा में जिम्‍मेदारी से स्‍कूल की रूल्‍ड कॉपी में देवानन्‍द का मनोहरपना आंकता था, चहककर कक्षा के साथी प्राण का अच्‍छा स्‍केच बना लेने की बधाई देने लगते थे. होता है. समय के साथ हाथ से लगा-लगा दिमाग भी बहकना सीख जाता है. कविता व अन्‍य समग्र सोचता रहता है, पुस्‍तकें छपवाने का पुणीत कृत्‍य अन्‍य न भटकेले तीक्ष्‍णप्राण किये जाते हैं.

मगर कैसे कहां से पैदा होते हैं ऐसे तीक्ष्‍णप्राण? या ऐसे किम्‍बा वैसे ब्‍लॉग ही, कैसे खड़ा कर लेते हैं, लोग? निकल लेते हैं लोग, या लड़की साइकिल लेकर निकल लेती है, जबकि मैं एक खड़ी तक नहीं कर सकता?

4 comments:

  1. आपकी पोस्ट तो पढ़ ली है, बाकी बुकमार्क समेट लिए बाकी लिंक्स के... एक अनुपमा जी का ब्लॉग है वो पढ़े भी आये... :) वैसे आपकी सभी PODCASTS कहीं एक जगह संगृहीत है क्या, और कहीं... जहाँ से एक्के बार पूरा खजाना मिल जाए... :)

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    1. ज्‍यादा नहीं हैं, जो हैं, बाबू, 'पॉडकास्‍ट' के टैग में हैं, टैग चटकाओगे, सारे, बिचारे, घबराये अपनी फटहाली में सामने नज़र आने लगेंगे.

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  2. ".....सातवीं कक्षा में जिम्‍मेदारी से स्‍कूल की रूल्‍ड कॉपी में देवानन्‍द का मनोहरपना आंकता था, चहककर कक्षा के साथी प्राण का अच्‍छा स्‍केच बना लेने की बधाई देने लगते थे. होता है..."

    हा हा हा.... अब इसमें दोस किसका है? देखने वाले की आंख का या बनाने वाले के बुरुस का?
    वैसे, रचना ऐसी ही होनी चाहिए - हर कोई अपने ज्ञान के हिसाब से परिभाषा दे सके!

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  3. :) क्या कहें? आप किताब काहे नहीं छपवाते ?

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