Tuesday, August 6, 2013

एइ रात तोमार-आमार..

‘एइ रात तोमार-आमार, ओई चांद तोमार-आमार, सुधु दु जने, ये नयन डरे-डरे,’ कैसी-कैसी गलतफहमियों का जाल पसरा होता है, जबकि ‘परबतों के पीछे चांद का अंधेरा’ पहचानने वाले खूब जानते हैं कि रात तुम्‍हारी-हमारी नहीं होती (मोस्‍टली गुंडों की होती है), चांद गड्ढों का संसार होता है, और सिर्फ़ दो जने अकेले कभी होते नहीं, सपनों में भी नहीं, और नयन डर नहीं शिकायतों और दुश्‍वारियों का लैंडस्‍केप होते हैं. कल्‍पना का मधुर रोमान कितना हमारी लाचारियों, जीवन की हारे पर अपनी दुकान चलाता है? ‘तुम जो मिल गए हो, ये जहां मिल गया,’ मिला, सचमुच? चार हफ्ते भर बाद जाकर पता कीजिए उनके मिलने के बाद जहां मिला है, या जहां को नेगोशियेट करने की नई शिद्दत से जुंबिश शुरु हुई है!

मगर यह देर दोपहर मेलंकलिया की मैलडी गाने की जगह मैं कड़वाइयां क्‍यों गुनगुना रहा हूं? जानने की सचमुच जिज्ञासा रखता हूं तो बहुत पहले यह समझ में क्‍यों नहीं आ जाना चाहिए था कि वस्‍तुगत सच जैसा कोई सच होता नहीं? समय और समाज अपने सेक्‍टेरियन स्‍वार्थ में सच की नित नयी-नयी मनोहर कथाएं गढ़ता रहता है, कि समाज और शासन का कारोबार निर्बाध चलता रहे; लोग, मेरी ही तरह, मुंह बाये उसे तोमार-आमार की सच्‍ची कथा के मनोभावों में गुनगुनाते, बस से उतरकर बैठक की टेली-कथाओं में समय औ’ समाज को भूल जाने पहुंच जाते रहें.

बुद्ध के गए सौ वर्ष भी नहीं बीतते कि उनकी फ्रैंचाइसी और मर्चेंडाइसिंग शुरु हो जाती है, ऐसा कैसे होता है कि कोई क्रांतिकारी विचार, धारणा अभी ठीक से समाज में दुरुस्‍त भी नहीं होती कि समाज के चंपक तत्‍व उसे अगवा कर ‘फिर बैतलवा डाल पर’ के पेड़ पर चढ़ा आते हैं? आदिवासी देवताओं को ब्राह्मण अपने रॉटरी और लायंस क्‍लब में शिफ्ट कर लेते हैं, ढेरों मातृ-देवियों को अपने भगवानों की बीवियों में बदलकर अपना सब्‍सक्रिप्‍शन लिस्‍ट बढ़ाते चलते, चीन की तर्ज पर अमरीका की नकल करते कांग्रेसी साहित्‍य-निधि कैलेंडर में एमएस गुप्‍त के बाजू जीएम मुक्तिबोध को मुस्‍कराता दीखाने लगते हैं, नियमगिरी की नींव हिलने लगती है, तवलीन सिंह जैसी समाज-ज्ञान-प्राण-विदुषी चीखती हकलाने लगती हैं, कि यह आदिवासी एइ रात तोमार-आमार क्‍यों नहीं गा रहा? जबकि आदिवासी ही क्‍यों, हम सभी सारे ओई चांद तोमार-आमार ही गा रहे होते हैं.

इधर ज़रा मुलाहिजा फरमाइये: “ऐसे तपस्‍वी भिक्षु अब भी थे जो नंगे पैर यात्रा करते, खुले में सोते, बचे-खुचे अन्‍न की भिक्षा ग्रहण करके उदर-निर्वाह करते और लोकभाषा में ग्रामवासियों या आटविकों को उपदेश देते; पर उनकी संख्‍या व प्रतिष्‍ठा निरंतर घटती जा रही थी. भिक्षु के लिए निर्धारित चीथड़ों से सिले हुए वस्‍त्रों के स्‍थान पर अब कीमती केसरिया रंग में रंगे बढ़ि‍या सूती कपड़े, उत्‍तम ऊन अथवा विदेशी रेशम के सुरुचिसंपन्‍न वस्‍त्रों का इस्‍तेमाल होता था. लगता है यदि स्‍वयं बुद्ध उस भव्‍य संस्‍थान में, जो उनके नाम पर चलता था, पहुंचते तो उनकी खिल्‍ली उड़ाई जाती और उन्‍हें निकाल दिया जाता, बर्शते कि संयोगवश वह कोई अलौकिक चमत्‍कार दिखाकर अपने को साबित कर पाते. बुद्ध ने ऐसे चमत्‍कारों की हंसी उड़ाई थी, पर अब ये उस धर्म के अभिन्‍न अंग बन गए थे और अनेकानेक बुद्धों के अलौकिक चमत्‍कारों की कथाएं फैल चुकी थीं. अतिप्राचीन प्रजनन-अनुष्‍ठान, कुछ परिष्‍कृत होकर, तंत्रविद्या के रुप में पुन: प्रचलित हुए; इन्‍होंने न केवल नए संप्रदायों को जन्‍म दिया, बल्कि ये बौद्ध, जैन व ब्राह्मण धर्म-कर्म में भी प्रविष्‍ट हुए. जिस प्रकार अपरिग्रह व सादगी भिक्षु-संघ के पूर्वकालीन नियम त्‍याग दिए गए थे, उसी प्रकार पद-प्रतिष्‍ठा के बोलबाले के कारण पुरातन सिद्धांत भी धुधले पड़ गए थे.. प्रत्‍येक विहार का संचालन एक ही परिवार के अधिकार में रहने लगा; आवश्‍यकतानुसार, विहाराध्‍यक्ष का पद अधिकार में रखने के लिए, उस परिवार का कोई तरुण प्रव्रज्‍या भी ग्रहण कर लेता था. संघ और राज्‍य के बीच समझौता हो गया था. परिणामत: नागरिक जीवन में जो स्‍थान चक्रवर्तिन का था, उसी के अनुरूप धर्म के क्षेत्र में बुद्ध को दर्जा दिया गया.”[1]

पता नहीं कोसंबी यह सब लिखकर हमें क्‍या बताना चाहते रहे, या सहोटा ही क्‍या बता जायेंगे. संजीव सहोटा की नयी किताब खामख्‍वाह ‘साड्डा हक्‍क‘ का ढोलक बजाती आई है, जबकि सब जानते हैं कि सड़कों के गड्ढे हमारे हो सकते हैं, सड़कें हमारी नहीं, कार-मैनुफैक्‍चरिंग कंपनियों की सहूलियत के लिए बनाई गई हैं, जैसे नदियों के गिर्द का रेत रेत-माफिया के मुनाफे की सहूलियत के लिए जिंदा रहता या बेदम की मौत मरता है. सच नहीं मैं मनोहर कथाएं बोल रहा हूं, वैसे ही जैसे कोई आवारा लड़की है मेरी ओर पीठ किये जाने किसको याद करती गुनगुना रही है ‘एइ रात तोमार-आमार, ओई चांद तोमार-आमार, सुधु दु जने’..


[1]. ‘प्राचीन भारत की संस्‍कृति और सभ्‍यता’, डीडी कोसंबी.

1 comment:

  1. सड़कें हमारी नहीं, कार-मैनुफैक्‍चरिंग कंपनियों की सहूलियत के लिए बनाई गई हैं, जैसे नदियों के गिर्द का रेत रेत-माफिया के मुनाफे की सहूलियत के लिए जिंदा रहता या बेदम की मौत मरता है.
    behtareen.

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