Wednesday, August 14, 2013

हैलो सुकेशजी, हैलो मुकेशजी, हैलो पंद्रह अगस्‍तजी!

नॉलेज मैप: न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स से
व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़! एक पुराना मन-उजियारन सवालिया पोस्‍ट है, 2009 जुलाई का है, मगर जुलाई के पीछे-पीछे अगस्‍त पहुंचता ही है, जैसे दो दिनों से ब्‍लॉगर पर नये-नये टैंप्‍लेट्स की चीर-फाड़ोपरांत हम फिर-फिर पुरनके, क्‍लासिक टैप्‍पलेटों के पास ही पहुंचते हैं. आईटी के होशियार बच्‍चे हमें उबार सकते होते, मगर पाजियों को खुद से कबारते रहने से फ़ुरसत निकले तब न? फ़ुरसत नहीं निकलती. भागते-भागते अज़ीज़ और करीब का हाथ दबाते हैं, जिसका नहीं दबा पाते, उसे फेसबुक की खिड़की से दूर से हाथ हिलाकर चिढ़ाते हैं, क्‍योंकि घर से निकलते ही फिर फेसबुक में ही उलझना होता है(यह दिव्‍य-दर्शन केरल के एक मित्र का है), हंसने की फ़ुरसत में हकबकाये मुंह से 'हैलो, सुकेश जी' निकलता है (कभी होश में 'हैलो, हुकेश जी' भी निकलता है!). जैसे कल दिन-भर 'हैलो, पंद्रह अगस्‍त' निकलता रहेगा.. मैं वह वाला 'हैलो' दोहराने की जगह एक यह वाला पुराना पोस्‍ट हिला रहा हूं, खुद को फिर से एक झूठे लालीपाप में बहलाता कि..

व्‍हाट् इज़ द मैप ऑव ह्यूमन नॉलेज़!..

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