Thursday, August 15, 2013

ओ मेरे सलम हो मेरे सनम..

पचीसों पॉडकास्टियां जाने वर्चुअल संसार के किन कोने टहलने निकल गईं.. हार्ड ड्राइव पर कहीं सहेजकर रख सकता था, मगर फिर देखता हूं खुद को भी नहीं रख सका हूं. सहेजकर. ढेरों जीवन शायद ऐसे ही बीतता है. कही बातें सब भूल-भूल जाती हैं, भाईजी का कबीता-पाठ, रुपाली घोष का चुप पटाये रहना, फिर कुछ भी याद नहीं रहता.

चौंकिये मत, यहां और यहां सुनियेगा तो स्‍वयं जानियेगा. और हां, पढ़ने की नहीं, सुनने की कह रहा हूं..

और इसको पढ़ने की नहीं, इसको कह रहा था. हद है. 

(2008 और 2009 की अलमारियों से है)

1 comment:

  1. पार्श्व में संगीत चल रहा है, जीवन क्या है, अपना स्पष्टीकरण और कितना कुछ..रोचक।

    ReplyDelete