Sunday, September 1, 2013

भूगोल: एक संस्‍मरण

अपने दोस्‍तों में बैठे भैया को जब चुटकुलाबाजी सूझता तो मनोज को बुलाकर सबके आगे उससे उसकी प्राकृतिक संपदा पूछते। मनोज इतमीनान से भौं पर लगी चोट का निशान और सामने के डेढ़ टेढ़े, टूटे दांतों का भूखंड दिखाता। पीठ पर दोस्‍तों की मुस्‍कराहट ताड़कर भैया कहते, ठीक है, आगे बढ़ो, अब भौतिक संपदा साफ़ करो। मनोज अपने हाफ पैंट की जेब से चवन्‍नी, एक खोटे बीस पैसे का सिक्‍का, हनुमान जी का स्टिकर (और भैया से मांगकर धन्‍य हुए ‘सावन-भादो’ और ‘फिर कब मिलोगी’ का) सिनेमा टिकट बाहर करके उसे सबके आगे पेश करता।

मतलब यह कि घर में मुन्‍नी, मनोज, मुझको या दीदी को तो क्‍या, भैया तक का भूगोल 'गोले-गोल' था। किसी को भूगोल की हवा नहीं थी। जब जैसी जिसको जरुरत बनती प्राकृतिक संपदा, भौतिक संपदा, अक्षांश और विषुवत को टो-टटोलकर लोग दूसरे विषय की किताब खोल कर (और भूगोल की पटककर) चैन की सांस लेते। किसी बात पर बाबूजी के नाक के बाल पर अगर गुस्‍सा चढ़ रहा हो तो वह चीखकर बोले बिना नहीं ही रहते थे कि छुटा दें तुम्‍हारा सब भूगोल?

किसी ने कभी बाबूजी को सही नहीं किया कि बाबूजी के छुटाने की बाते नहीं थी, भूगोल सबसे वइसही छुटा हुआ था!

मुन्‍नी का गुड़ि‍या का खेल खराब करना हो, या उसकी आंख से भल्‍ल–भल्‍ल लोर बहलवाना हो तो सबसे आसान और आजमाया रास्‍ता यही था कि उसे अक्षांश और विषुवत में उलझाकर ऊष्‍ण कटिबंधीय प्रदेश के बीचों-बीच पहुंचा दिया जाये।

मैं अलबत्‍ता छुट्टी के दिनों, दोपहर में जब सब तरफ सुनसान हो, भैया की साइकिल उड़ाकर भूगोल के अन्‍वेषण में निकल जाता; और कोयल नदी, या उससे लगी छोटी पहाड़ि‍यों की पहचान में समय खराब करने की जगह, हॉकी स्‍टेडियम से लगे ट्रेनीज़ हॉस्‍टल के पीछे की अफसरों वाले ए ब्‍लॉक में अपने क्‍लास की प्रीति खरे के फ्लैट के पांच चक्‍कर लगाकर, दम भर सांस लेकर फिर से तैयार होने को, इमली के पेड़ के नीचे साइकिल रोककर खड़ा होता, दु:खी मन ही मन प्रार्थना करता कि भगवान, प्‍लीज़, कभी तो प्रीति मुझसे भी प्राकृतिक और भौतिक संपदा पूछकर, जानकर शिक्षित बने!

स्‍कूल और क्‍लास में प्रीति रोज़ दिखती, लेकिन अपने घर के बाहर मैं उसको कभी खोज नहीं सका। शायद वह समय ही ऐसा था, कि लड़कियां क्‍लास में दिख जातीं, घर देखने जाओ तो गायब मिलतीं!

साफ़-सुथरे लॉन में बेंत की दो कुर्सियां पड़ी रहतीं, हेज़ से लगा एक लंब्रेटा स्‍कूटर हमेशा वहां खड़ा मिलता, प्रीति मिलकर मुझसे भूगोल समझ सकती थी, मगर मिलती नहीं। शायद भूगोल उसका कमज़ोर विषय था ही नहीं। या मेरे भूगोल को उसने अपने काम का समझा नहीं। शेखर और मैं कभी देर सांझ कोणार्क टाकीज़ से फि‍ल्‍म देखकर, पंचर साइकिल के साथ उसके घर के सामने वाली सड़क से लौट रहे थे; खुले दरवाज़े और खिड़कियों के परदे से छनकर आती ट्यूब लाइट की रोशनी और भीनी आवाज़ों के जादू में सबकुछ भूला, भारी तनाव से भरा, मैं खिंचा-खिंचा लंब्रेटा के करीब चला गया था और उसकी नम सीट को छूकर एक राहत-सी महसूस की थी, जबकि शेखर ने तब भी मुझे सावधान किया था कि तुम लोग का भूगोल बहुत डिफरैंट है, दिलीप, तुम कहां खरे के चक्‍कर में टाइम खराब कर रहे हो, यार!

हमारे गेट के बाहर कभी लंब्रेटा खड़ी नहीं रही। सजावटी बाड़ की शक्‍ल में ऐसा कोई हेज़ भी नहीं था जिसकी लंब्रेटा शोभा बनता। फिर न ही भीतर ऐसा कोई लॉन था जिसके बचाव के लिए ही हेज़ की दरकार होती। पड़ोस के साहु अंकल के गेट पर ज़रूर कभी-कभी ऑफिस के काम से एक हरे रंग की जीप आकर ठहरा करती। मनोज मूर्खों की तरह मचलने लगता कि देखना, इस बार हमारे गेट पर आकर रुकेगी। अबकी बार साहु अंकल के आफिस से नहीं, बाबूजी के फैक्‍टरी से आयी होगी, जीप से टोपा उतारते हुए बाबूजी निकलेंगे, देखना! दीदी मन मारकर मनोज को सही करती कि कब्‍बो देखे हो, बाउजी के हाथ में टोपा? साहु अंकल जो जूता पहनते हैं वो जूता भी बाउजी वाले जूता से अलग है। एक ऑफिस वाला जूता होता है, दुसरका फैक्‍टरी वाला, फैक्‍टरी वाला जूता पहनकर आफिस वाले जीप में चढ़ना अलाऊ नहीं है। बाउजी ज्‍यादा से ज्‍यादा नारंगी रंग वाले बस में चढ़ सकते हैं, ब्‍लू कलर वाला भी उनके अलाऊ नहीं है!

दीदी का इतना कहना अभी पूरा होता भी नहीं कि मनोज गुस्‍से में फनफनाया तेज़ी से दौड़ा आता, दीदी को एक ज़ोर की चिकोटी काटते हुए, उसी तेज़ी से भागता आगे निकल जाता, दीदी की पहुंच से दूर पहुंचने की तसल्‍ली में फिर पलटकर मन का ज़हर उगलता- तुम कुच्‍छो नहीं जानती हो, भूगोल में तुमको बाईस नंबर आया था, हमको सब पता है!

दौरी में सहजन या भिंडी लिये बिक्री को बोरा सजातीं आदिवासी औरतों को निरखता मनोज कभी गुमसुम थोड़ी देर सोचता, फिर सवाल करता- अच्‍छा, एक बात बोलोगे, ई आदिवासी लोक का भी प्राकृतिक और भौतिक संपदा होता है?

रात के खाने के बाद कभी पीली फीकी रोशनी में तेजिंदर या शेखर के साथ किसी बात पर बात करते हुए अचानक जो कभी प्रीति का ख़याल मन में आकर चमक, और गायब हो जाता तो मन में देर तक खलबल मची रहती। तेजिंदर कहता क्‍या हुआ, तुम कुछ बोल नहीं रहे। मैं चिढ़कर जवाब देता, चूल्‍हे में जाओ यार तू लोक, मेरा साला यहां कोई भुगोले नहीं है!

किसी घर से लोगों के बात करने की आवाज़ें धीमी छनकर बाहर आती, कहीं सिर्फ़ पीली, साठ वॉट वाली बत्‍ती के जलने का सुनसान छाया रहता। किसी घर के बाहर रात में भी तार पर टंगी सूखने को साड़ी दिखती, कोई आदमी गेट खोलकर किसी घर में भीतर जाता दिखता, लेकिन जहां तक उस दुनिया की इन तस्‍वीरों को साफ़-साफ़ समझ लेने का सवाल है, अक्षांश और विषुवत हमेशा गड्ड-मड्ड बने रहते। जैसे शहर के बाज़ार में आदिवासी औरतों का सहजन और भिंडी लेकर बेचने चला आना। उनके वहां आकर उस तरह खड़े हो जाने में कुछ कमाकर घर ले जायेंगे की उतनी ही समझ होती जितनी हम सभी भाई-बहनों की भूगोल की हमेशा रही।

3 comments:

  1. तो, आप ही थे दिलीप, मेरी प्रीति खरे के घर के कंपाउंड तक चले जाने वाले! (पूर्णविराम काफी नहीं प्रतीत होता)

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    1. एक फ़िल्‍म आई थी, 'मैं वो नहीं', प्रीति खरे के साथ देखने किसने किसको भेजा था? मगर फिर मैं क्‍या-क्‍या बताऊंगा, आह, यह भी कि सोशल साइंस तो क्‍या होम साइंस में भी किसको बाईस नंबर मिला था? कम से कम 'मैं चुप रहूंगी' ही देख लिया होता, AM?

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    2. बड़े मार्मिक हैं आपके जीवन प्रसंग। कोई चाहे तो हंस ले, चाहे तो रोने का मन बना ले।

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