Wednesday, September 11, 2013

भूख: एक लघुव्‍यथा

हमेशा भूख लगी रहती है. बच्‍चा मां से पूछता है, मां, हमेशा भूख क्‍यों लगी रहती है? भूख से धुंधलायी (कुम्‍हलायी, संवरायी, लजायी, तो पहिले से ही) मां बिना सोचे कहती है, बाबू, हम नंगे लोग हैं भूखे लोग हैं, भगवान ने अइसही गढ़ा है हमको, अच्‍छा है भूख लगी रहती है, भूख नहीं लगती तो पाला मारता. सरदी में कठुआये तुम कुड़कते रहते, आग और कोयला खोजने मैं किधर जाती!

बच्‍चे ने जोर डालकर अपने लिए दिमाग में भूख की एक आरामदेह तस्‍वीर बनाई. दुनिया में जाड़ा है बरसात है गरमी में सन्‍न करनेवाली हवायें हैं, बीसियों और जाने क्‍या-क्‍या आपदायें हैं, लेकिन बिलबिलाती भूख कितनाहूं आंखों में अंधेरा भरती हो, है उनसे कम बड़ी विपदा है.

बोरे के नीचे से और खड़ंजी साइकिल के पीछे से भागती खजुआइन, बिमरीआइन बिल्‍ली की बच्‍ची पर नज़र जाते ही बच्‍चे ने उसे लपककर गोद में ले लिया और उसे दुलराने लगा. बिल्‍ली की बुचकी, मुंह ऊंचा किये उम्‍मीदबर नज़रों से बच्‍चे को ताकती, अलग-अलग स्‍वरों में ‘म्‍याऊं’ बोलकर उस तक अपनी गुहार पहुंचाती रही. बच्‍चे ने बुचकी को समझाया कि वह समझ रहा है किस हूक के दबाव में वह कूक रही है, लेकिन भली पुचकी, यह भी समझ ले कि अल्‍ले अल्‍ले अल्‍ले, रे बल्‍ले, भूख सबसे बड़ी बला नहीं है, दुनिया में और भी ग़म हैं भूख के सिवा..

कुत्‍ता खुद से और अपनी भूख से चिढ़ा हुआ था. बच्‍चे की पुरानी पैंट चबाने के बाद उसने उसकी कम पुरानी इकलौती चप्‍पल चबाने की कोशिश की और जवाब में उछलकर आते एक जूते की चोट का शिकार हुआ. बाद में मुंह पर और घाव पर जीभ फिराता सोचता रहा भूख की चोट फिर भी जूते की चोट से कहीं ज्‍यादा थी.

दायें-बायें ढुलुक-बुलुक होते और कभी-कभी तो खड़े-खड़े यूं ही गिर पड़ते अपने पिल्‍लों को संभालती सूअर तो भूख से इस कदर बेजान थी कि कभी सोचती कि मैं कुछ सोच पा भी रही? छै के छै ये सभी मेरे हैं? क्‍या सोच रही थी जो मैं इन्‍हें गर्भ में ले आयी, और अब दुनिया में चले आये हैं तो कहां जा रहे हैं? भगवान तूने कैसी दुनिया बनाई कि हमें सूअर बनाया, हमारी तक़दीर पर गरम पानी उंड़ेलने के बाद ऊपर से अलग से हमको भुक्‍खल भी बनाया, रे नीच? मंदिर में घुसकर तेरा प्रसाद खाऊं, पाजी, क्‍या खाऊं?

बच्‍चे ने बकरी के मुंह से खींचकर उन पत्‍तों को चबाने की कोशिश की जिन्‍हें वह मुंह में भूख का मुंह चिढ़ाने को सजायी थी, मुंह में पत्‍तों का ज़रा-सा रस चला आया लेकिन फिर झट कड़वाहट से उसे ऊबकाई-सी भी आई. उसकी देखा-देखी बिल्‍ली की बुचकी ने भी ज़मीन पर तीन लोटे लिये, और आह का मन ही मन लम्‍बा विलम्बित आलाप लेने लगी. कुत्‍ता भूंकने की कोशिश में किंकियाता रहा, फिर भिन्‍नाने लगा. देह पर आकर बैठती मक्खियों को झटककर हटाने की ताकत भी न रही. बच्‍चे की मां ने आठवीं मर्तबा सूखे हलक और उबलते पेट को मटके के पानी से ठंडा करने की कोशिश की और गश खाकर गिरती-गिरती बची.

गोद में बिल्‍ली की पुचकी को संभाले बच्‍चा मां के करीब आकर फुसफुसाकर बोला, दुनिया में बीस बड़े आपदा हैं, भूख तो सबसे छुटकी पुचकी विपदा है, न मां?

8 comments:

  1. "बच्‍चे ने एक बकरी के मुंह से खींचकर उन पत्‍तों को चबाने की कोशिश की, मुंह में पत्‍तों का ज़रा-सा रस चला आया लेकिन फिर झट कड़वाहट से उसे ऊबकाई-सी भी आई"

    ???

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  2. दुनिया में बीस बड़े आपदा हैं, भूख सबसे छोटी विपदा है, न मां?

    इस मार्मिक प्रश्न का जाने क्या उत्तर दिया होगा माँ ने!

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  3. फिर-
    जब भी

    भूख से लड़ने

    कोई खड़ा हो जाता है

    सुन्दर दीखने लगता है।

    झपटता बाज

    फन उठाए सांप

    दो पैरों पर खड़ी

    कांटों से नन्ही पत्तियां खाती बकरी

    दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता

    डाल पर उलटा लटक

    फल कुतरता तोता

    या इन सबकी जगह

    आदमी होता।
    - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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  4. भूख जाने क्या क्या करा देती है इंसान से ...
    मार्मिक कहानी ...अपने आस पास की ...

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  5. सर्वाधिक कचोटती, सब कुछ उधेड़ती भूख।

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  6. दुनिया में बीस बड़े आपदा हैं, भूख सबसे छोटी विपदा है, न मां?
    ओह्ह !!!मार्मिक कथा
    आंचलिक शब्दों के प्रयोग से कथा वास्तविक चरित्रों के बेहद करीब आ गयी है !!
    आपकी रचनाओं को पढना सुखकर होता है
    सादर !!

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  7. bda dukh hai mujhe yahan yeh likhte hue ki hmara desh aaj aise rajnetaaon k haath me hai, jo votes rijhaane k liye FDI jaise bills toh pass kr skte hain, lekin bhukh ki is vastvik peeda se anjaan hain...

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  8. संवेदनशील! मार्मिक!

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