Thursday, September 12, 2013

फुटनोट और मैं..

फुटनोट के बारे में क्‍या कहूं. कहता ही रहा हूं. बहुत सारी जगहों कह चुका हूं[1]. कभी-कभी लगता है जीवन में नोट का अभाव अवचेतन में आघातों का तीव्र आलोड़न जगाकर मुझसे फुटनोटों के बाबत लिखवाता रहा है[2]. इसीलिए कभी-कभी यह भी लगता है कि आसपास गिरे नोट होते और तेजी से आगे बढ़कर उसे फुट के नीचे छिपा लेने की होशियारी होती तो फुटनोट पर चिंतन करने की यह अनावश्‍यक बौद्धिक अदा छांटने की ज़रुरत न पड़ती. कम से कम मुझे तो नहीं पड़ती[3]. गहरे शोक का विषय है कि हिन्‍दी समाज के मनीषी इस पर क्‍यों नहीं चिंतन करते कि चिंता हिन्‍दी समाज की प्रकृति व परम्‍परा के कितना ही अनुकूल क्‍यों न हो, चिंतन नहीं है. परम्‍परा में है न प्रकृति में है. दिल्‍ली उत्‍तर व दिल्‍ली दक्षिण दोनों ही स्‍कूलों में नहीं है. न ही इसके पहले इलाहाबाद, बनारस या पटना स्‍कूलों की ही इस रौशनी में चिंतित देखने की बात सामने आई है. और वैसा चिंतन तो कतई नहीं है जो फुटनोटों के आसरे चिंतित दिखे[4].

देखनेवाले देख सकते हैं कि लम्‍बकाय व दीर्घकाय जितने भी कायपुरुष हुए हैं, हिन्‍दी समाज से बाहर जाकर हुए हैं. दृष्‍टव्‍य हैं बंबई में भारती, विश्‍वभारती में एचपी द्वि‍वेदी, पंजाब में सहीवा के उदाहरण, ये सारे महिषी फले, हिन्‍दी समाजों के बाहर जाकर ही फूले. इसके विपरीत श्री एएल नागर[5] की गिरती काया के ऐतिहासिक ह्रास की समीक्षा करिये, वह इसका साक्षात प्रमाण हैं कि लखनऊ पहुंचकर लेखक काया बनाता नहीं, गंवाता है. संभवत: यह भी एक प्राथमिक कारण है कि हिन्‍दी में गप्‍प लेखन व पद्य लेखन का ऐसा प्राचुर्य क्‍यों है. इसीलिए है कि लिखनेवाला ठीक से नोट पायेगा नहीं तो अपने को बहलायेगा काहे में[6]? फुटनोटीय चिंतन के लिए इसकी भी प्राथमिक आवश्‍यकता होती है कि चिंतक का एक फुट पुस्‍तकालय में हो और जेब में इतने नोट हों कि नेहरु मेमोरीयल लाइब्ररी की कैंटीन में उच्‍चमध्‍यवर्गीय[7] लंच[8] का आनंद उठा सके, और तनाव-रहितावस्‍था में उठा सके.

हिन्‍दी का नोटहारा लेखक पहले फुट को पहचानने व फुटवीयर पहनने की कला में पारंगत हो उसके तदंतर ही संभव होगा कि वह फुटनोट को अपने चिंतन में शामिल कर सके. तब तक फुटनोट पर यहां मैं और वहां भी सिर्फ़ मैं ही होऊंगा जो चिंतन कर रहा होऊंगा[9].

[1] . देखें ‘जननी-जागरण’ शरदीया अंक, 1933; ‘माखनलाल द्वि‍वेदी समग्र’ की भूमिका, परकीया प्रैस, मथुरा.
[2] . देखें मेरी ‘जीवन में नोट का अभाव किम्‍बा फुटनोटों की प्रस्‍तावना’, प्रयाग पुस्‍तक मंदिर, अल्‍लापुर, 1969.
[3] . ‘क्‍या बिना बौद्धिकता छांटे दलित उत्‍थान संभव नहीं?’, राजेंद्र यादव नंदन स्‍वागत समिति सम्‍भाषण, मथुरा, 2003. (भाषण के ठीक बाद हालांकि अच्‍छा जुत्‍तम-पैजार हो गया था. कई चोटें हैं जिनका स्‍मरण अभी भी मेरे कर्ण केशों को खड़ा कर देता है!)
[4] . मगध साहित्‍य सम्‍मेलन, 1933 से 1941 की प्रोसिडिंग्‍स के प्रोजेक्ट पेपर्स; प्रयाग साहित्‍य सम्‍मेलन के भी, वही.
[5] . ‘पराये मुलुक में क्षत-विक्षत होता सोच व शरीर’, श्री नागर से मोहनलाल सागर की निजी बातचीत के गुप्‍त टेप, परकीया विशेषांक, सीतापुर, 1981.
[6] . ‘हिन्‍दी का लेखक कहां कमा रहा है, और क्‍यों नहीं कमा रहा है’, इटावा साहित्‍य संसद की वार्षिक रिपोर्ट का प्राथमिक नोट, जून, 1991.
[7] . ‘भारत में वर्ग विश्‍लेषण’, श्रीपाद अमृत डांगे, का. मनोहर पब्लिकेशंस, 1936.
[8] . देखें रितेश बत्रा निर्देशित ‘लंच बाक्‍स‘, 2013.
[9] . ‘कितने नावों में कितनी बार: फुटनोट और मैं’, वर्धा ब्‍लागयज्ञ महासम्‍मेलन, अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य, 1996.

6 comments:

  1. "फुटनोटीय चिंतन के लिए इसकी भी प्राथमिक आवश्‍यकता होती है कि चिंतक का एक फुट पुस्‍तकालय में हो" :)
    So well put!
    Salute to the great soul that you are.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 13/09/2013 को
    आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः17 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  3. आज की विशेष बुलेटिन 625वीं बुलेटिन और एकता की मिसाल में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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  4. अच्छे नोट हैं। लेकिन लिंक में दिख न रहे हैं। :)

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    1. पैताने हैं, आप कौन ताने ढूंढ़े निकल गये?

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  5. बहुत ही अच्छा लिखा. फुटानी मारना कोई आपसे सीखे. रीतेश बत्रा का संदर्भ थोड़ा जल्दबाजी में दिया गया. परकीया प्रेस अभी चलाते हैं कि बंद कर दिया. सहीवा को पंजाब में उतना हवा पानी मिला था, इसका बखान आप अन्याय में भूले.

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