Monday, September 2, 2013

स्‍मृति हरण: एक लघु, संदर्भित प्रबंध

फोटो: रघु राय
जायकोव्‍स्‍की ने कहा है, ‘स्‍मृति छकाने के लिए होती है[1]’, जबकि मतिराम खटिक हमें याद दिलाते हैं, ‘स्‍मरण का मूल भाव हमें बचाने, और खुद को भुलाने के लिये होता है[2]’. क्‍या होती है स्‍मृति और होकर फिर क्‍या करती है. यह प्रश्‍न हमें ही नहीं उद्बुद्ध[3] करती, याज्ञवल्‍क्‍य व वत्‍सानवल्‍क्‍य[4] के समयों में भी कितने ऋषि-वत्‍सल वल्‍क्‍य-शिशुवानर थे जो इस जिज्ञासा के कर्णभेदी बाणों व मर्मबिंधे प्राणों के संग वन, वृक्ष व वणिकाओं के बीच टहलते व मचलते रहे. तेरहवीं संदी के उत्‍तरार्द्ध में तिमासोली के तिप्‍पानोरो ने गुनगुनाते हुए घोषणा की, ‘प्रियवर, स्‍मृति और कुछ नहीं, उदासियों का वाल्‍डेनसामकेट है!’ इस पर हालांकि खुद मेरा गहरा मतभेद है, स्‍मरण के बहाने इन्वित समाजों में सुसुप्‍त संज्ञाओं की खोज के दरमियान मैंने पाया, स्‍मरण मूलत: उस इक्‍तस्‍वारपोक प्रेमिका की तरह है जिसके आने का मधुर ख़याल आता रहता है मगर जो खुद कभी आती नहीं. या उस इक्‍तस्‍वारपोक प्रेमिका की तरह है जो एक बार चली आने पर फिर ‘तुम इक गोरखधंधा हो’ का उच्‍च–स्‍तरीय विश्रृंखलित उप्‍पालाप आपसे गवाती रहती है, मगर खुद आपके जीवन से क्‍या मजाल जो कभी चली भी जाती हो!

उच्‍च–वर्णी अमृता, शेरदिल ने कहीं कोमलता की ओट में छिपे मलिनता में लिखा है ‘स्‍मृति साहिर है’, जबकि दिल्‍ली व दिल्‍ली के पड़ोस रेस कोर्स मार्ग से, व ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ की अमृता से परिचित कुछ बुजूर्ग-वय यह भी बीच-बीच में राय देते ही रहे हैं कि ‘सहर, किम्‍बा सोहर तो कतई नहीं, साहिर ही स्‍मृति है’.

बड़ा भोला, निकृष्‍ट-सा प्रश्‍न है, सचमुच, क्‍या हम स्‍मृति को कभी जान नहीं सकेंगे? स्‍मृति को जानने के लिए हमें सब भूलना होगा? इस दिशा में ‘अमृत कुंभ, किम्‍बा स्‍मृति, सांधाने’ के धृष्‍ठ र‍चयिता किसी तरह, कहीं हमारी मदद करते हैं? कर सकते हैं? ‘चैन्‍नई एक्‍सप्रैस’ पर घबराये, चोट खाये व कहीं भी नहीं पहुंचते हुए, या ‘मद्रास कैफ़े’ की सघन सत्‍याग्रही राजनीति में ऊंघते हुए, हम स्‍मृति तक पहुंच सकते हैं? या स्‍मृति हमें किसी की, किसकी कविताओं पर लेटी मिल सकती है? या स्‍मृति का हमने सचमुच विलोपन हो जाने दिया है?

पोल्‍स्‍का के वरिष्‍ठ जायकोव्‍स्‍की ने कहीं कहा है, ‘स्‍मृति हमारी गहरी उदासियों की बाल-सखा है जो आनंद-चंगुल क्षणों में हमारी उंगलियां थामे फिर-फिर हमें उदास-स्मित करने को चली आया करती है[5].’ ओह, कैसा मनोहारी शब्‍द-वृंद है. मगर जब नहीं आती तो कहां जाती है, स्‍मृति?

स्‍मृति, संसार के धृष्‍ठ, दुष्‍ट जायकोव्‍स्‍कीयों से बचो, प्रिये, तुम कहां हो? तुम्‍हारा कोई सेल नंबर, ई-मेल आई डी? प्रिये, कुछ तो कहो, पास आकर कभी तो रहो?

[1] . ‘द अफेक्‍टेड मिनिमस: थ्री एसेस ऑन मेमरी एंड लॉस, सम सोलेस’, पोल्‍स्‍का प्रेस, वॉरसा, 1979.
[2] . ‘नलिन विमोचन: किंचित क्षीण व क्षुद्र आयाम’, खंड-खंड प्रकाशन, खड़गपुर, 2003.
[3] . इसका अर्थ कृपया रामजस कालेज, दिल्‍ली के प्रो. रामजस तिवारी से पता करें.
[4] . इस नाम का कोई इतिहास-धनी हुआ है इस पर गहरा संदेह है.
[5] . वही, ‘द अफेक्‍टेड मिनिमस: थ्री एसेस ऑन मेमरी एंड लॉस, सम सोलेस’, पोल्‍स्‍का प्रेस, वॉरसा, 1979.

4 comments:

  1. वाह, आपकी इतिहास-द़ष्टि और शब्द शक्ति को आत्मसात करने की स्पीड बहुत तेज है। मान गए 9कोई नई बात नहीं, पहले से माने हुए हैं)

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    1. शर्त बदती हो? दसवीं के इतिहास और ग्रामर दोनों में दुबारा फेल होकर दिखा दूं?

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  2. जिसके कारण जान सका हूँ, उसको कैसे जान सकूँ मैं

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  3. मन होता है यहीं कहीं बैठ कर अज़दक की अलमारी खंगालते रहे!
    ***
    Interesting and wonderful post!
    अभी कुछ एक घंटे तो इस पोस्ट के आसपास ही गुजरने वाले हैं...

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