Thursday, September 5, 2013

सिच्‍छक दिवस का चिथड़ा-कतरन..

वैसे सोचनेवाली बात है, यार-दोस्‍तों से बाहर जब पढ़नेवाला बीस-बाईस, और खींच-कांखकर पौने चार सौ की संख्‍या के पार न पहुंच पाता हो, आदमी कैसी अकुलाहट के कौन खजुवाहट में घरबराकर किताब छपाये पहुंच जाये.. और धंधे के बीच बाज़ार बैठा कोई गुणग्राहियो पर-प्रकाशक उसे क्‍या खाने और पहिनने की उम्‍मीद में छापे?.. (हमारे एक अदद ब्‍लॉग पोस्‍ट पढ़ाये में पाठक जो है, हींकने लगता, नज़र बचाकर छींकने लगता है, बेचारे का मन नहीं टिकता, जाने मन बाज़ार की कवन नवकी चीज़ में जाकर टंगा रहता है, या फेसबुक की इस टीप से उछलकर उस टीप तक पहुंचने में, और फिर सुनसान की उदासियों को खोये-खंगालने में चकमकाया-फ्यूजियाया रहता है, तो किस पढ़वैये के द्रोह में किताब खुद को खड़ा करेगी, कर सकेगी? किताब की ज़रुरत भी हिसाब से हो, सीधा-सीधी लिप के स्‍टिक की तरह मुंह रंगने, व साबुन की तरह दाग़ धोने के काम आये? किताब का कोई अजाना 'पथ' और 'पांचाल' न हो, चमक और बहक के उनींदे में नशीले निकल जाने के गाढ़े 'जंजाल'? गऊ सी सीधी हो, और प्रतिरोध के लाल-सी सफ्फा चटख़, और बस इतनी ही हो?).. सोच रहा हूं, यह भी कि बनानेवाले समाज, और समाज के टीचरानों ने मन का यह दलिद्दर लोक भी अपने उन्‍हीं हाथों बनाया है.. 

(फेसबुक की दीवार पर खींचा स्‍टेटस; फोटो बाबू सुब्रत बिश्‍वास का, साभार)

1 comment:

  1. ये सारी कैटेगरी किनारे कर दें तो उसके बाहर भारत में हिंदी में किताब कोई नहीं लिखता, कोई लिख भी ले तो नहीं पढ़ता, बात चरचा नहीं करता. सिच्छक लोग जो सिखाए, किताब मे जो है उसको कॉपी करो जरूर, पर अमल कभी मत करो.
    पर ये हद तोड़ कर कोई तो लिखो भई. हम पढ़ना चाहते हैं, इस सीमा के बाहर का सोच विचार का दुनिया देखना चाहते हैं.

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