Saturday, September 7, 2013

ब्‍लॉग के अच्‍छे दिनों की आत्‍मकथा

ओह, कैसे अच्‍छे दिन थे. कंप्‍यूटर के की-बोर्ड पर ‘अच्‍छा‘ और ‘दिन’ लिखकर देख लेने और दंग होते रहने के दिन थे. 'दीन' और 'लीखना' से चहकते हुए उठ लेने के दिन थे. हालांकि ढेरों गिरे हुओं के मचलने के दिन भी बने रहते. मगर मोस्‍टली फिसलते रहने के दिन थे. फिसलते हुए एक ब्‍लॉग से निकलकर दूसरे में पहुंच जाइये. ठहरकर किसी नीचे हुए अथवा नीच को समझाइश देने लगिये, ये क्‍या लीख रहे हो, नीचू आमदी? हमसे सिखके निहीं लीख सकती? चैट में बहकते हुए इनसे और उनसे पूछ लीजिये, आप भी यही लिख रहे हैं, तब हम घंटा क्‍या लिखें? गये-गुजरों की कमी नहीं थी, कमेंट के साथ-साथ कभी धृष्‍ठ कंटेंट ले उड़ते, चोरियों पर सुलगते कमेंटों की झड़ी लग जाती, ओह, झड़ि‍यों के कैसे सुलगते दिन थे!

तेज़ी से दोस्तियां हो रही थीं. लोग भूतपूर्व प्रेमिकाओं व अभूतपूर्व पत्नियों को भुलाकर दोस्तियों की अर्थात ब्‍लॉग की बातें कर रहे थे. पत्‍नी घर की बात करना चाहती तो बात की बजाय उसके हाथ में उसका ब्‍लॉग धर रहे थे. प्रेमिकायें दीवानी हुईं घूम रही थीं, जहां देखतीं, हरामी (कल तक जो अपने को प्रेमी बताते थे) अब सिर्फ़ ब्‍लॉग चर रहे थे. ओह, कैसा तो ‘मन रे बहका रे लहका’ का लक्ष्‍मीकांतीय उत्‍सवी समां बंध रहा था, और ढेरों हमारी तरह ब्‍लॉग-बरबाद थे जो मंत्र-विमुग्‍ध उसी में बंधे रहते. सभी इस बरबादी में दीक्षित नहीं थे, एक अच्‍छा-खासा धड़ा विवाद-लक्षित भी था, जो कमेंट-उच्छिष्‍ट की खोज में संवाद-पुष्‍करों को बड़ी आसानी से विवाद-दुश्‍करों में बदल डालता, व साढ़े एक सौ तेईस टिप्‍पणियों का अतिरिक्‍त (मोस्‍टली तिक्‍त) मुनाफ़ा बटोरकर चैन की सीटी बजाता अगले विवाद के अन्‍वेषण में निकल जाता! ओह, कैसे विवाद-विवर्ण दिन थे. रहते-रहते अचानक हिचकियां उड़ने लगतीं. इस ब्‍लॉग से निकलकर उसमें ऐलान होने लगता कि टिप्‍पणी हटा ली है, आपकी मर्जी हो तो ब्‍लॉग भी हटा लेंगे, घबराइये नहीं, आपको दिखा देंगे! दिखा देने और चौंककर देखते रहने के ओह, कैसे तो मनोहारी दिन थे!

उठते-बैठते, उड़ते-गिरते, रोते-आंख पोंछते करनेवाले ब्‍लॉग बैठकें कर रहे थे. अ और स और द घर से सब्‍जी खरीदने निकलते, सब्‍जी धरी रह जाती, खरीदनेवाला द और स आपस में, किम्‍बा किसी ब्‍लॉग-बैठक की लसड़-फसड़ में धराये जाते!

हर ब्‍लॉगित मन कवि हो रहा था. कवि ब्‍लॉगर न हो पाने के शोक में कवितायें पटक रहे थे. चालीस का पाला छूती ढेरों ब्‍लॉगकर्त्री थीं, प्रेम-पिपासाओं को पुर्नभाषित कर रही थीं. मुझसे प्रवीण ऐसी नव्‍य-भाषाओं व अतृप्‍त-आसाओं को पढ़ने व उनकी आंच में जलकर सब भूल जानेवाले अपने ब्‍लॉग से बाहर निकल-निकल जा रहे थे. ‘कोई दूर से आवाज़ दे, चले आओ,’ के उद्घोषों से ब्‍लॉगासमान प्रेमोद्भ्रांत था. इन्‍हीं मनोहारी दिनों की उदासियों के मीठे असर में होगा कि रहते-रहते ब्‍लॉग-बैठकों से उठकर मैं ज़रा-सा जापान और इंगलिस्‍तान हो आने के ज़हीन, संगीन, रंगीन सपने कातने व बुनने लगता, भावुक होकर इलाहाबाद पहुंचने किम्‍बा वर्धा हो आने से रह-रह जाया करता था. तात्‍पर्य यह कि भारतीय प्रेमिकायें ठीक थीं, बहुत बार बड़ी ढीठ थीं, मगर कुछ भी हो लेतीं, हिन्‍दी कविताओं के हिन्‍दी-युग्‍म से कभी कहां ऊपर उठ सकती थीं, इलाहाबाद और वर्धा कितना कुछ भी हो लेता, मगर जो था जितना गिरा हुआ था, उससे स्‍वयं को अलग कहां से कर लेता? जबकि टोकियो और टैक्‍सास और तेहरान व तियाननमन अभी भी संभावना थे. मेरे प्रेमिल हो सकने के लिहाज़ से थे ही. हालांकि रोकनेवाले रोक रहे थे, उनके अंतर में दुर्भावना थी, जबकि मेरे कोमल भावों का मक़सद महज़ कोमलाकांत पदावलियों की पुर्नरचना थी. ओह, पुर्नरचित होने के कैसे उत्‍खननकारी पुर्नजागरणीय दिन थे!

किंतु ऐसा नहीं कि उन दिनों संसार कतिपय ज़ुकरबर्गों की चालों, खंगालों और जो मिले, उठा लो, खा लो, पचा लो की गहरी संकीर्ण षड्यंत्रकारी योजनाओं से दुषित नहीं था. था, चाल चली जा चुकी थी, अंधेरे खुलकर विह्वल हो रहे थे, ब्‍लॉगों को अपनी आगोश में ले लेने को चंचल हो रहे थे, मगर इतिहास का अभी वह क्षण था जब ब्‍लॉग-ब्रह्म के पराक्रम में सीधे-सीधे सामने चले आने से ज़ुकरबर्ग दहल रहा था, मचल केवल ब्‍लॉग-विदुषियां रही थीं, क्‍योंकि हमारे फीड से उनका काव्‍यमन धन्‍य हो रहा था. यह तो कतिपय किंचित बाद में, अभी-अभी हुआ कि वह सारी निर्दोष कोमलकांती भावनायें क्षत-विक्षत, विवर्ण हुईं. मैं जापान जाते-जाते अंतत: जोगेश्‍वरी पूर्व में ही रह गया. वापस लीखने के दीन लौटे. मगर ओह, तब भी वे गये कमेंट फिर कहां लौटे? विदुषियां अपने विषों के साथ ज़ुकरबर्गी विक्षिप्‍तावस्‍था में लौटीं, अतीत के वे गौरववर्णी विविधरंगी काव्‍यक्षण फिर नहीं ही लौटे.

ओह, कैसे घुरों के गिरे दिन हैं.

15 comments:

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    1. हम त अच्‍छा हैं ही, मगर ब्‍लाग कहां ले अच्‍छा है? कि आपै अननेसेसरिये में 'बिंदी' लीख रहे हैं?

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  2. aap likhtae rahey aap me kabliyaet haen jadi hi aap achchae blogger ho jayaegae aur so jayegae

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    1. ओह, रचना, सोया हुआ था जाग जाऊंगा, शायद यहां से निकलकर वहां कहां भाग जाऊंगा..

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  3. आप हिन्दी के साहित्यकार मालूम पड़ते हैं :-)
    थोडा सा अगर स्तर गिराते तो मजा ही ही आ जाता
    मामला थेर्सोल्ड तक नहीं पहुंचा .हा हा !

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    1. देखिये, आपको ख़बर हो गई है, हिंदी साहित्‍य को नहीं हो सकी है. नामवर किसी सभा में पुरस्‍कार देने के लिए मेरा नाम नहीं पुकार पा रहे, न ही गंवार प्रकाशक स्‍वयं को तैयार कर पा रहे हैं. बकिया, आप थेर्सोल्‍ड का अर्थ साफ़ करें.

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  4. इसलिए ही तो हिन्दी साहित्य तेजी से पिछड़ गया है बिचारा :-)
    थेर्सोल्ड को थेर्सोल्ड ही महसूसे इसे कोई और नाम न दें ! और हिन्दी साहित्य में इसे भी
    घुसेड़ लिया जाय !

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    1. घुसेड़ देने की आपकी निर्दोष दुष्‍टकारी इच्‍छा सिर-आंखों पर, लेकिन पहिले पता चले तो हिन्‍दी साहित्‍य का नेक-निवास है कहां, पटने में रहती है, सतने में, जबलपुर बस डिपो के पीछे ठिकाना है, या समूचे दरियागंजै, डेहली का तराना है!

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  5. वाह ! कितनी मीठी हिन्दी ... सीखे तो कोई इससे सीखे ... एक-एक शब्द धारदार ... नए विशेषण मिले- नीचू आमदी,धृष्‍ठ कंटेंट
    आशा जागी -गये कमेंट के लौटने की ...
    पढ़कर सुबह की सुखद शुरूआत हुई।

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    1. जी, अर्चना कर रहा हूं, कंटेंट धृष्‍ठ कहां था, उसे लेकर उड़ लेने वाले थे! जैसे मैं अर्द्धविराम खाता रहा हूं, दुष्‍ट (धृष्‍ठ भी) कंटेट खा जाया करते थे, ब्‍लाग के अच्‍छे दिनों में, अब तो मोस्‍टली खुद के ब्‍लागों में ही खाने को कुछ बचा नहीं रहता.

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    2. अरे! हाँ ये सही -कभी धृष्‍ठ कंटेंट ले उड़ते...
      बहुत सीखना है;भूलने के दिनों में याद करना है फिर से ...

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  6. उफ, फेसबुक ने सुखचैन लूट लिया ब्लॉग का।

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  7. क्या चकाचक दिन थे। हलचल भरे!

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  8. का चाहते हैं? हमहू आह भरें, हैं?

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