Tuesday, September 3, 2013

रोशनी कहां जाती है..

मालूम नहीं फोटो में खींचनेवाला क्‍या कुछ खोज लाता है. बहुत मर्तबा तो भ्रम होता है फोटो खुदी खोज ली गयी हो. ऐसे वक्‍त में जब लगातार दृश्‍यबंध बदल रहे हों, मज़े की बात है कि अब एक अच्‍छी फोटो, हमारे भागते को क्षण भर के लिए थाम लेती है, पलटकर हम उसके मिजाज़ में अटकते, लौटते रहते हैं.. सुबह की हियां-हुआं की बेमतलब-बेमक़सद भटकन का हासिल, कुछ फोटोगारों के ठिकाने. जो यहां दिख रहा है वह कोलकतिया सैकत समाद्दार की आंख से देखी दुनिया है, उनकी अपनी, बहन, मां और घर की है.. बकिया घर से बहराये, दुनिया के छितराये रौशनीकार हैं. नाम की जगह उन्‍हें यहां नंबरों में गूंथ रहा हूं कि अपने नाम की गलत लिखाई देखकर उनके मन के साथ-साथ, मेरा भी मिजाज़, कम ही खराब हो.. एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्‍यारह, बारह, तेरह, चौदह, पंद्रह, सोलह, सत्रह, अट्ठारह, उन्‍नीस, बीस, इक्‍कीस..

1 comment:

  1. छितराये रौशनीकारों को यहाँ सहेजने के लिए आभार.
    हम शायद ही पहुँच पाते इन तक जो आपकी "हियां-हुआं की बेमतलब-बेमक़सद भटकन" ने इन्हें हम पाठकों के लिए न सहेजा होता!

    अज़दक की अलमारी का जवाब नहीं:)

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