Wednesday, September 4, 2013

यहां खड़ी मत रहो..

foto: daniel berehulak
चौदह घंटों के सुनसान के बाद पंद्रहवें के धुंधलके में एक गाय की एंट्री हुई. मैं नींद में ही ब्‍लॉगर पर खौरियाया हुआ था, कि अबे, घंटा सर्विस चलाते हो, यू बकलोल डंब घेंवड़ा पीपुल, ज़रा-सा ट्रैुफिक हमारी ओर नहीं ठेल सकते? पांच साल से ब्‍लॉगिंग कर रहा हूं, गिनकर लोग ऐसे झांकने आते हैं मानो भोजपुरी में लैटिन की कबीता लिख रहा होऊं, और मुझको तो अपने पटकाये, छितराये होने की जो लज्‍जा होती हो, होतीये होगी, तू लोक को, हरमखोर मुंहजार, तनि लाज नहीं आती?.. तो मैं तो नींद का ही खौरियाया हुआ था, अब यहां जागे की रात थी, और सुनसान में जाने कब से चरने को राह तकती एक गाय का साथ था, छूटते ही लैटिन बरसाने लगा, अर्थात कविता गाने लगा-

इस रात इतना अंधेरा है यहां खड़ी मत रहो / जाओ देखो कहीं और खड़ी करो कोई और रात / इस रात का अकेलापन अड़ा है बहुतै बड़ा है / रहने दो इस रात को हम साथ कर सकते थे जैसी किसी बात को / इस रात बहुत अंधेरा है यहां खड़ी मत रहो.

ज़ाहिर है गाय अगर लैटिन जान भी रही थी तो भी अपनी जगह अड़ी, वहीं खड़ी रही. गुस्‍से में मैं पानी-पानी होता, चीख़कर फ़ेन फेंकने लगा, अबे, तुमको शरम नहीं आती, आकर अकेले में खड़ी हो जाती हो, जबकि ‘मास’ और ‘मूवमेंट’ हरमेसा प्रतिरोध की विद्रोही कविताओं के बाजू खड़ा हाथ हिलाता, मुंह बजाता, दिखता है? गाय ने भरी जवानी नथुनों के आस-पास कुपोषण और नैतिक व बौद्धिक दलिद्दर में निकल आये मूंछों को छुपाते, किंचित लजाते, कहा, जिनके पास फुड सिक्‍युरिटी होगी, भैया, मैं उनका नहीं जानती, हमारे पास तो कोई क्‍युरिटी नहीं है, हम कहां जाते के असमंजस में यहां आकर खड़े हो गये, आपको तकलीफ हो रही हो तो मुंह हटाकर कौनो और दिशा में खड़े हो जायेंगे? दशा नहीं बदलेगी, जानते हैं..

पिटे हुओं की चोटखायी का जो एक क्षीण, टूटा-टूटा-सा बिरादराना होता है, उसकी भावुकता से दबा, मैं कातरभाव गाय के नज़दीक आकर उसके कान सहलाने लगा, तुम भी, यार, मालूम नहीं समझ कैसे लेती हो कि हम तुमसे रार करेंगे, इसलिए कि नथुनों पर तुमरे मूंछ है और हमारी तिलकुट एस्‍थेटिक्स को चोट पहुंचेगी? मगर क्‍या है वह जिसको देखकर नहीं पहुंचती रहती, सच्‍चो, बताना? अफ़ग़ानिस्‍तान की एक एगो बुचकी के फटियारेपने को देखकर नहीं पहुंचती? या कैनेडा के इस ज़रा-सा भोलेपन को देखकर? पचीस करोड़ के भुक्‍खल मुंह को खियाये के पीछे जो पइसा खरच होगा, गुड़गांव में पांच हज़ार फ्लैट की कीमत के बराबर होगा, फिर भी इस मुलुक का अमीर मानस है ऐसा-ऐसा गंधाइन बोलता है मानो भुक्‍खल मुंह उसका जमीर नहीं, इस देश का कैंसर हों! हमको चोट नहीं पहुंचती?

"The question of what the Food Security Bill will cost though is indeed a highly aggravated one. Defenders of the Bill say the government is already spending Rs 90,000 crore on food subsidy: expanding the net of beneficiaries will cost an additional Rs 30,000 crore. This, they argue, is not something India cannot afford. Rs 1.2 lakh crore on securing food for one’s citizens amounts to only 1.2 percent of the country’s GDP. How can one grudge that when one compares this with other subsidies?

Development economist Reetika Khera, for instance, points out that tax exemptions given to Indian industry in 2012-13 alone amounts to a whopping Rs 5 trillion. India’s fuel subsidy — much of which is enjoyed by the rich — is approximately Rs 1.6 lakh crore. Tax breaks given to the gold and diamond industry in the last year is Rs 60,000 crore, nearly 20 percent of the revenue forgone. (For perspective: this industry employs 1.8 million people, which is less than 1 percent of the Indian workforce. The Food Bill would benefit 67 percent of the population at merely an additional cost of Rs 30,000 crore. ) The list could go on. The point is, shaving just a little from all this would help balance the books.

Or reverse the gaze. Examine the scams: just the irrigation scam in Maharashtra is worth Rs 70,000 crore. Tax evasions from private mining companies would cross many trillion. Why not urge government to fix this? Why is it that the market can withstand this waste with stoicism, but it panics at the prospect of providing food?

There are robust answers for many of the other fears the Bill triggers too. For instance, it is absurd to imagine that getting a mere fistful of rice in one’s belly every night is going to kill India’s aspiration and turn it into a lazy society. Can one really argue that India’s poor will not work towards better clothes, shoes, schooling and living standards for their children, because they have allayed the basic gnawing in their stomach?

As for India’s capacity to produce foodgrain: in good monsoon years, almost 700 lakh metric tonnes of foodgrain lie rotting in warehouses or in the open. If you laid these sacks out in a row, it would cover one million kilometres: a road to the moon and back. Often, rather than distribute this successfully to its poor, the government exports it at a loss to other countries to feed cattle and pigs.."

इसको और उसको पढ़कर, क्‍या सोचती हो, हमें तकलीफ़ नहीं पहुंचती? ऐसे ही तुम्‍हारे मोह और मुहब्‍बत में इस रात और उस रात की कबीता का खाका खेंचते रहते हैं?

गाय जाने कब की भूखी थी, मुझे क्‍या सुनती. मेरे पास भी उसे खिलाने को क्‍या खाक घास थी, हाथ में एक पतली किताब की उदासियों का बेदाना था, सो भी हरामी, फिर लैटिन में ही था, बंगाल के देहात की चंद तस्‍वीरें थीं, पता नहीं किन छूटे समयों की थीं, गाय की भूख और झरिया की तरक्‍की–नहाये से उसका कोई संबंध नहीं था. जैसे मेरे इस ब्‍लॉग से ट्रैफिक का, नहीं है.

5 comments:

  1. गाय बेचारी, खाद्य सुरक्षा,
    बचे, करे तब जीवन रक्षा

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  2. सागर के पास अथाह गहराई है और हमारे वश की बात नहीं की इस गहराई को थाहने की सोच भी सके... आसपास तट पर भीड़ होगी भी तो सागर की विशालता के समक्ष क्या ख़ाक नज़र आएगी!

    अज़दक सागर है, और सीमित है पात्र हमारा
    ग्रहण करे भी तो कितना...
    ***
    "इस रात का अकेलापन अड़ा है बहुतै बड़ा है"
    सचमुच, ये बहुते बड़ा है कोई ओर छोर नहीं रात के अकेलेपन का.

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  3. दो शेर हैं, दोनों चोरी के हैं..

    गऊ हमारी माता है
    हमके कुछ नहीं आता है

    ई कौन चुपके ले आता है
    आके चुप्‍पे बरनाल लगाता है?

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  4. हा हा ...
    अच्छा लिखत हौं आप |
    “रेखा मैडम "

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    1. हा हा, अच्‍छा लिखत हौं, कौं जाने, अजय?

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