Tuesday, September 3, 2013

कवि के रोज़गार..

फोटो: सैकत समाद्दार
धूप का पेट और चश्‍मे पर अभावों की कजरी लगाये
अधिक से अधिक डेढ़ और अढ़ाई पुरस्‍कार पायेगा
नहीं पायेगा तो दु:ख-दहलता पुरस्‍कारों की दुरव्‍यवस्‍था पर
तीन कालम लिखेगा, चार पर अपनी राय उगलेगा
कैसा समय है क्‍या कोई काम नहीं आयेगा की सोचता
उस पर नहीं, किसी और विषय की कविता खड़ी करेगा
टटोलता, टोहता, हिलता-हिलाता, हाथ जोड़ता
ई-मेलों की मृदुता और फ़ोंनों की मधुरता में, खिलता
वर्ष में तीन विश्‍वविद्यालयी विमर्शों का आतिथ्‍य
चार साहित्यिक संभाषणों के सेकेंड एसी का किराया, खायेगा
डेढ़ सौ की ऊंघती सभा में कविता की पुरची लिए नहीं, लजायेगा
मगर इससे ज़्यादा, और आगे फिर हिन्‍दी का कवि कहां जायेगा
हाथ कंगन को आरसी क्‍या का मन ही मन जाप करता
प्रार्थना के शिल्‍प में अपना प्रार्थीपना, इनसे और उनसे, ठेलता
बेटी की अंग्रेजी से प्रभावित, 'खिल्लित', अगले पुरस्‍कार की राह तकेगा
संस्‍कृति चूड़ि‍यों के तीन और बाटा के डेढ़ मेहराये डब्‍बों में होगी
उसको देख-देखकर चकित होता, कवि हिन्‍दी कविता का भविष्‍य रचेगा.

3 comments:

  1. Replies
    1. धूप, पेट, अभाव, चश्‍मा, कजरी (गाये वाला नहीं, चढ़ाये वाला), पुरस्‍कार, फूंफकार, उद्गार, अंग्रेजी का बरियर संसार, हिन्‍नी के हिनहिनाइन सित्‍कार, सबके सन्‍नर्भ-सहित हमहीं ब्‍याख्‍यो करें, त कबी हिंदी के मंच पर कवन बात के दांत चियारेगा, आर.ए.?

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    2. "I might enjoy being an albatross, being able to glide for days and daydream for hundreds of miles along the thermals. And then being able to hang like an affliction round some people’s necks." सैमस हीनी की लाइनें हैं, भासा के अनजाने में कब्‍बो हमहूं चुप्‍पे गुनगुना लेते हैं, विदाउट सन्‍दर्भ, आफ कोर्स..

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