Monday, September 9, 2013

जो कभी करीब आता नहीं..

औरत कहती है जब खोजती हूं दिखता नहीं, जब चाहती हूं मिलता नहीं.. मैं कहता हूं आवाज़.. सिर्फ़ आवाज़ जिसे पकड़कर, जिसके सहारे मैं कूद आऊं अंधेरे से रौशनी में.. किसी दिलदारनगर के चोटखाये बाशिंदें अपनी शर्म और तक़लीफ़ में बजते फुसफुसाते हैं निजाम के खेलों में यहां सिर्फ़ हमारे बेमतलबी की आवाज़ें हैं.. मुल्‍क और उसके चोटिल वक़्तों के भरभराते मकान की गर्द में गुमी सुख की तलाश हमको, आपको अपनी खोजों में कुछ पलों को, भूले दिनों में, दीवाना बनाती रहे, सुखी कैसे बनायेगी.. तैरता-सा कोई सुर आयेगा, और कुछेक समय के लिए गूंजता भले रहे, मगर फिर जल्‍दी ही छूट-छूट भी उसी, उतनी ही आसानी से जायेगा.. 

एक पुरानी कहानी थी कभी की.. उसी की गांठ जोड़ रहा हूं.. 





5 comments:

  1. क्यों ना पॉडकास्ट का एक पेज ही बना दिया जाए जिससे हमें खोजने, सुनने में आसानी रहे... आपका सबसे पहले वाला ब्लॉग टेम्पलेट बेजोड़ था... करीने से की हुई बागवानी लगती थी... कोलोमों की क्यारियों में बंटा था सबकुछ...

    ReplyDelete
  2. beech ke paragraph mein to baha le gaye sir... thank you.

    ReplyDelete
  3. सार्थक लेखन |आज हिन्दुस्तान में भी पिछला एक लेख आया था ,आपका |
    -डॉ अजय
    “ हर संडे....., डॉ.सिन्हा के संग !"

    ReplyDelete
  4. अहा, बड़ी ही रोचक कहानी सुख की, हर ओर बिखरा है सुख, बस आने का माध्यम ढूँढ़ता है..

    ReplyDelete
  5. जो कभी करीब आता नहीं उसकी कहानी फिर फिर सुनते रहेंगे अब...
    आवाज़ जिसे पकड़ कर कूदा जा सकता है अँधेरे से रौशनी में!

    कभी की पुरानी कहानी की गांठे जोड़ने का शुक्रिया.

    ReplyDelete