Friday, September 6, 2013

इसको दबायें उसको हिलायें

इस पोस्‍ट पर राय देने के लिए उस पोस्‍ट को दबायें. दबाकर देखें ज़िंदा बचा है अभी चल रही है सांस, याकि ख़तरे की घंटी है, मुसीबत पैर पटकता दिखे तो पोस्‍ट की अम्‍मा को बुलायें. पोस्‍टों में संभलकर चलें, अम्‍माओं से भी संभलकर चलें. बहुत सारे बटन हैं, बटन बदल-बदलकर चलें. चलते रहें चलते रहें चलते चलें, पोस्‍ट पढ़ने नहीं देखने की चीज़ है, देख-देखकर खुद को हिलायें, देख लिया है बगलवाले को बतायें. देखें, पड़ोस में दिखें बाबा नागार्जुन तो बुलाकर उनको भी दिखायें, वो हंसने लगें तो हंसने की बात है जानकर आठ दांत आप भी दिखायें, एक ओर ज़रा-सा झूलकर चुटकुला हुये जायें, भूलकर भी ना लजायें, घूमकर फिर इस पीछेवाले बटन को दबायें, आगेवाले इस पोस्‍ट को हिलायें, पोस्‍ट फक़त बटन लग रहा हो तो मटन की आस में घबराकर फिर फलांगते हुए फेसबुक पर जायें. तेज़ी से आठ लाइक करें, पौने तीन को कमेंटियायें, तीन मर्तबा इस दरमियान अख़बार देखें, आठ बार टेली समाचार, तेज़ी से करते चलें विचार, फेसबुक पर क्‍या लायें, किसको जिला दें क्‍या हिला दें, चोट की चाम में क्‍या टांक दें, हुर्र-हुर्र होते हल्‍ले में खुद को कहां चांप दें. घबरायें नहीं, तीन अंगुल पीछे घूमकर फिर इस बटन को दबायें, इस पोस्‍ट की अम्‍मा को जगायें, करनी को कूट-कूटकर उसका फिर भजन गूंथकर, फेसबुक में उसकी कजरी गायें, रोना जब एकदम लाजमी हो जाये तभी अज़दक पर आयें.

11 comments:

  1. सब पोस्ट दबा के हिला के देख लिये। कुछ पढ़ीं थीं कुछ पहली बार देखी। स्केच तो अद्भुत हैं आपके बनाये। बाकी भी चकाचक। जय हो आपकी।

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  2. पुरानी पोस्ट पढ़ाने का यह तरीका लाजवाब है , पढ़ते हैं सभी बारी- बारी !!

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  3. हम तो इस और उस में ही उलझ गये, अभी सबके बटन दबाते हैं । बिना घबराये बिना फ़ेसबुक पर लाईक और कमेंटियाये बिना पढ़ेंगे :)

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    1. हाथ-गोड़ अउर आंखी संभालकर मगर, अगवा, उतरायी है, मुंह दाबेवाला, रुवाई है..

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  4. देखी जमाने की यारी,
    चटकाये लिंक सभी, बारी बारी :)

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  5. रोना जब एकदम लाजमी हो जाये तभी अज़दक पर आयें.

    जैसे कोई कह रहा हो::
    पीड़ा में आनंद जिसे हो वो आये मेरी मधुशाला...
    ***

    Thanks a lot for this post... it took me to places where I couldn't have reached on my own and when I returned back here I had moistened eyes.

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    1. मोयेस्‍टेन्‍ड आइस हियां अलाउ नहीं है. या त बोकार फाड़ के रोइये, न त फिर आंखी पर सस्‍ता वाला करियर चश्‍मा डाल के आइये गुजर जाइये, जइसे पहचाने न हो..

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    2. बोकार फाड़ के रोना धोना तो अक्सर चलता ही रहता है, सुनने वाला जो कोई नहीं होता यहाँ...
      अभी "मोयेस्‍टेन्‍ड आइ" से काम चलाना पड़ेगा हमको क्यूंकि अभी सुनने वाले घर में ही हैं, बोकार फाड़ने पर वो घबरा जायेंगे:)

      और दूसरा आप्शन भी पॉसिबल नहीं अभी क्यूँकि करियर चश्मा है ही नहीं मेरे पास,
      और जइसे पहचाने न हो.. वैसे कैसे गुजर जाएँ,
      थोड़ी बहुत पहचान हो गयी है अज़दक से, ये कहने की धृष्टता तो हम कर ही सकते हैं...

      Btw, Thanks again for this post!

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  6. आप तो हमको उस कैटेगरी में ठेल दिए. हम तो झूलकर चुटकुला होते हैं हर वाक्य पर, हर अभिव्यक्ति पर, नए शब्दऔर कथन पर. फिर आते हैं मनन पर जहां मुंह दाबे वाला रुलाई है सच्ची. दीदी, प्यारी दीदी कहां हो. गुलाबी चप्पल में कितनी अच्छी लगती हो दीदी. पर दीदी है कि मानती ही नहीं बात.

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  7. बटन दबा दबा कर उँगली दर्द देने लगी।

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