Monday, September 9, 2013

अपने से पहले सपने से में जो क्षण दिखा होगा ओह, कितनी बड़ी संगत होगा..

इस मुनिया को, धनिया को, बहेलकी को, खेलकी को, पुचकी को, बुचकी को अपने बाजू खड़ा करना चाहता था, कि देर तक देखता रहूं कि वह दूर तक कैसे देखती रही है.. कि उसकी उतरायी की पीठ पर, मानो किसी मध्‍ययुग से खींचकर जो गदह-वृंद की ढुलुर-ढुलुर लयकारी है, उसे बजता, व प्‍यात्‍ज़ा के हौले-हौले के बहल जाते तारों का खिंच जाना सुन सकूं; पत्‍थरगली की पसराहट व पुराने किस ज़माने के मकानों की चोटखायी दुलराहट गुन सकूं; दिखे कि एक क्षण में जो दिखता है वह अनंत में जाकर वापस स्‍वयं को किन नज़रों पलटकर देख लेता है, बुचकी मुनिया उस अनंत को किन नज़रों देखती है.. सेर्जो लारेंन की आंख पर चढ़े, खुद मैं उन्‍नीस सौ उनसठ की अपनी बहेलकी की संगत में, अपने को अपने जन्‍म से पहले कैसे देख ले रहा हूं!

2 comments:

  1. मुझे लगा, खोजा नसरुद्दीन के समय की कोई मुनिया खड़ंजे की शाही सड़क का कुछ देर आनंद पाने की कोशिश कर रही है कि याद रख पाए, एक ऐसी भी दुनिया इसी दुनिया में है और उस दुनिया को देखती एक मुनिया को देखता सोचता व्यक्ति भी.

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  2. ये तो सपने के सपने देखती बबुनी हैं , और बबुनी के सपने देखते सेरजो जी महाराज हैं और उस सारे तिलिस्म का जादू दिखाते आप हैं ,हम हैं ,नहीं ? ज़रा से देखने की नज़र का जादू है ,कहीं बिला गया होगा अब उन्नीस सौउनसठ में ,लेकिन देखिये,अब भी बचा है ,कितना मनभावन दिलतोड़ इस तस्वीर में

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