Saturday, September 7, 2013

किताब की अधूरी आत्‍मकथा

कहना मुश्किल है कि मेरी कहानी कहां शुरु हुई, मैं अस्तित्‍व में कैसे आयी. संभवत: मुझे बनानेवालों की ज़रूरतों, स्‍वार्थ, असमंजस, अकिंचन मूढ़ता वे मिले-जुले कारक रहे जिनके दबाव में होते-हवाते, लुढ़कती, प्रूफ की ग़लतियों व प्रैस की उधारियों में सींझती, अंतत: तंग गलियारे की बुझी रोशनी में, सुतलियों में बंधी, गिरी, मैं पैदा हो गयी! दुनिया में मेरे आने की कोई खुशी मनी हो, तो मुझे उसकी ख़बर नहीं है. खुशी तो मेरे स्‍वागत में मुझे मेरे लिखनेवाले को भी नहीं हुई. मुझे हाथों में लेकर तेज़ी से पलटते हुए पहली चीज़ जो उसके मुंह से निकली, वह ‘च्‍च च्‍च‘ के अनंतर अविश्‍वास, दर्द और गुस्‍से की ध्‍वनियां थीं. वह देर तक ‘ये सब कैसे हो गया, और इसके लिए मैं राजनाथ को बारह हज़ार और दूंगा? कहां से दूंगा?’ बुदबुदाता, मुझे पटककर फिर मेरे किसी हमशक्‍ल को उठाकर उसी हैरत से जांचता, और-और दर्द में नहाता रहा ओर आखिरहा, बिना मुझे साथ लिये, हाथ छिनकता उसी तेज़ी से बाहर निकल गया था!

मैं समझदार होती और दुनिया के मेरे कुछ वास्‍तविक (‍अर्थात कड़वे) अनुभव रहे होते तो उसी वक़्त मुझे अपने भविष्‍य की धुंधली, मटमैली, या ज्‍यादा स्‍पष्‍टता से कहें, गाढ़ी, सियाह तस्‍वीर दिख गयी होती. मगर मैं ज़ाहिल तो कॉफ़ी टेबल के स्‍नेह और तकियों पर गिरने के धृष्‍ठ शिशुवत सपनीली किलकारियों में सोयी हुई थी. कहां जानती थी कि जहां जाऊंगी वहां कॉफ़ी की टेबल तो क्‍या चाय की स्‍टूल तक नहीं होगी, और तकिये तो उससे भी कम होंगे जितनी घर में सोने की (असलीयत में लाख की) चूड़ि‍यां होंगी! और पहनने की नहीं देखने की होंगी, जैसे मेरे देखने को तकिया था!

क्‍यों मैं इस संसार में आयी, सचमुच, किसे मेरी ज़रूरत थी? इस देश में पहले ही प्रचूरावस्‍था में अभागी विपन्‍न कन्‍यायें नहीं? अपने जन्‍मदिवस पर जिस तरह मैंने लेखक को सन्‍न देखा था, वह अवसन्‍नता आज तक मेरी तक़दीर से बंधी हुई है. उस जघन्‍यता को स्‍वयं से छाड़कर में कहीं खड़ी हो सकती हूं? रोज़ इस उम्‍मीद में धूल झाड़कर, आह, फिर भी, खुद को खड़ी करती हूं कि शायद आज कोई चाहनेवाला सामने चला आये, उंगलियों से छू ले, हाथों में ले ले, गालों से सटाकर मेरे देह की बास ले, देखे अभी तक गंठी सटी हूं, या मेरी जवानी अतीत का क़ि‍स्‍सा हुआ!

कितने अरमान थे, कि विश्‍वविद्यालयों में यूं ही इठलाती, टहलती पहुंच जाऊंगी, पुस्‍तकालयों में लड़कियां मुझे देखकर जल मरेंगी, हिंदी के तो ख़ैर सारे अशिक्षित-अर्द्धशिक्षित हैं, तुर्की से कोई युवा आलोचक, आंखों में चमक और होंठों पर विस्मित हंसी लिये चला आयेगा और रहस्‍यभरी तनी नज़रों के हर्ष में फुसफुसाकर ऐलान करेगा, ‘यही तो वह किताब है जिसे मैं सारे जीवन खोजता रहा!’ चेहरे का पसीना पोंछती कोई मध्‍यवयी कीरगीज़स्‍तानी अध्‍यापिका कम आलोचिका खोजती आयेगी, चांदनी चौक या निज़ामुद्दीन जाकर दुष्‍टों-धृष्‍ठों से अवमानित-प्रताड़ि‍त होने की जगह, मेरे करीब आकर कहने लगेगी, ‘प्राथमिक शिक्षा के टेबल में जो हम सबसे गये-गुज़रे हैं, आप कहीं कम गुज़रे नहीं हो, हमारी नीचता में बस हमीं से ऊपर हो, मगर यह अमूल्‍य निधि ऐसी है कि हमारे यहां ही नहीं, आपके यहां भी पढ़ी जानी चाहिए!’ चीनी गुप्‍तचर एजेंसी की पोलित ब्‍युरो की केंद्रीय कार्यकारिणी का सब-सेक्‍शनिस्‍ट, अब रिवाइवलिस्‍ट, अवकाशप्राप्‍त हा द्वान हाथ बांधे आयेगा, अफ़सोस ज़ाहिर करेगा कि चीनी वामपंथ की दुर्दशा का दस्‍तावेज़ आज उतना ज़रूरी नहीं, न प्रमोद सिंह की अप्रकाशित चीन यात्रा की अप्राप्‍य पांडुलिपि है, जितनी सामने पड़ी यह किताब है, जिसे न केवल चीन में बल्कि तिब्‍बत, भूटान व नेपाल में भी उसी शिद्दत से पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिस शिद्दत से वह पढ़ी नहीं जा पा रही! मगर क्‍यों नहीं पढ़ी जा रही? ऐसी नीतियां और किताबें हम क्‍यों, किसके लिए छापते हैं जिनके छप जाने के बाद उन्‍हें तैयार करनेवाला तक उनकी ओर नहीं देखता, इस दरमियान फिर वह क्‍या देखता रहता है?

कितने अरमान थे. कि इस्‍तांबुल जाऊंगी, वहां से ठुमकती पैरिस पहुंचकर गलीमार्द की कुर्सी पर पसरकर संस्‍कृति-नागर को सन्‍न कर दूंगी, फिर वहां से भागकर लंदन को बांहों में भर लूंगी कि न्‍यू यॉर्क के सारे बुद्धि-‍रसिक-वणिक जलकर खाक़ होते, ढाक के पात होते रहेंगे! सब धरा रह गया. मैं इसी धरा पर धरी रह गयी. ऐसा क्‍योंकर हो गया. सभ्‍यता-निर्मिति के इतने गूढ़ निहितार्थ हैं हमारी संस्‍कृति में, कागज़-निर्मिति का ऐसा सघन कारोबार है, क्‍यों है, दैनिक भास्‍कर व दैनिक अरनब टाइम्‍स की आपूर्ति व उनके फ़ायदे के बास्‍ते है? घरों में किताब की जगह बने उसका रास्‍ता बनाने के लिए नहीं है?

मैं थक गयी हूं. पक गयी हूं. ताज्‍जुब होता है कि इतनी तक़लीफ़ों के बावजूद कैसे है कि अभी तक छपी हुई हूं, पन्‍नों पर छितराये अक्षरों में बची हुई हूं. जबकि मेरे लिए सस्‍ती मारकिन की कुरती और एक सस्‍ता पेटिकोट खरीदनेवाला भी यहां कोई नहीं, मुझे अपने हाथों में लेकर खुशी का तराना गाये, ऐसा तो कतई नहीं. फिर भी हूं! कैसी हूं?

2 comments:

  1. "पहली चीज़ जो उसके मुंह से निकली, वह ‘च्‍च च्‍च‘ के अनंतर अविश्‍वास, दर्द और गुस्‍से की ध्‍वनियां थीं. वह देर तक ‘ये सब कैसे हो गया, और इसके लिए मैं राजनाथ को बारह हज़ार और दूंगा?"
    हाय लेखक दुर्दशा देखी न जाए।
    आजकल किताबी नोस्ताल्जिया का दौर है, लगता है। पर ऐसी शिद्दत से लिखा गया, ऐसा सार्वजनीन अपीलक्षम पीस तो बस यही इकलौता है। सारे जमाने का दर्द इसमें है, जमाने वाले सब इसे अपना ही दर्द जानेंगे।

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  2. किताब पहले छपे तो सही तब बाकी के अरमान पूरे हों। :)

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