Sunday, September 8, 2013

ऐसी की तैसी का भजन

स्‍त्री दु:खकातर होगी क्‍या करुं
घर के बच्‍चे मेरी सुनते नहीं
बच्‍चे गाल फुलायेंगे अरे, आप तो
देखने को इतना है खरीदने को कितना
गोद में बेमतबल किताब लिये क्‍या करें, क्‍या पायेंगे, मम्‍मी प्‍लीज़

किताब लज्‍जा में सिर झुकायेगी, बेमतलब ऐसे ही हुई हूं
बेचारे बच्‍चों का क्‍या कसूर जब सारे संस्‍कार ही मतलबी हुए हैं
संस्‍कृति मतलब की हुई है, मतलब ही संस्‍कृति हुई है

लातखायी, अपना हासिल पायी संस्‍कृति कहां खड़ी होगी
जो कुछ कहेगी, साधुजी के पिछवाड़े पड़ी होगी
झोंटा व उसकी साड़ी थामे चेलागण
अखाड़ों में खड़े होंगे, बाल व अपनी बवालों पर अड़े होंगे
साधुजी का रज व प्रसाद सचिवों, श्रीमंतों व श्रीमंत्रियों
की फुलवाड़ि‍यों में पड़ा होगा, सजता सहलता सुलगता

संस्‍कृति जब ऐसे साधुमार्ग चलेगी व ऐसी फुलवाड़ि‍यों में सजेगी
स्‍वाभाविक है समाज जुआड़ि‍ओं को व लोकहित झाड़ि‍यों को प्राप्‍त होगा
स्‍त्री होती रहे सेर भर दु:खकातर, पति उसका कट्टर संस्‍कृति भक्‍त होगा
आये अबकी चुनाव दिखा देगा कहां खड़ी है संस्‍कृति
और वह संस्‍कृति के सिर पर चढ़ा कहां खड़ा होगा.

2 comments:

  1. संस्‍कृति मतलब की हुई है, मतलब ही संस्‍कृति हुई है
    ***
    क्या लिख गयी कलम, वाह!
    मतलब से मतलब है और यही आज की संस्कृति है और ये होगी संस्कृति तो ऐसी की तैसी तो होनी ही है... वही तो हो रहा है शायद आज!
    सारे सत्य लिख जाती है, आपकी लेखनी को प्रणाम.

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  2. कहाँ बिलाई जाती संस्कृति,
    फैल रही है, अपनों की अति।

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