Monday, September 9, 2013

जिस ज़बान में समय होगा मेरी वह ज़बान नहीं होगी

foto: jorge henriques




















कोई एक कहानी होगी, मगर
कहानी से ज्‍यादा गाना होगा
जिसके करीब पहुंचने को खूब जोर मारूंगा
पहचानी बसों और जानी सड़कों के शॉर्टकट से उस तक पहुंचने से बचूंगा
बटुली छीपा थारी, दुआरे की धूप और धानी आसमानी साड़ी के पहचाने सहारों से
सूंघकर देखूंगा वह बजता क्‍या है जो हवा में है, सुन रहा है सुनो
ग़ौर से सुनो तो कितना-कितना कुछ सुन पड़ता है, अभी भी रह रहा है
सुन सुन सुन, मैं सुन सकूं मगर क्‍यों वैसे मेरे कान नहीं हैं, संगीत कितना-सा है
मद्धम सप्‍तक विलम्‍बि‍त का पूरा अजायबख़ाना
लेमनचूस ज्‍यूस और जै कलकत्‍तेवाली का पूरा धातिनताना है
मगर जिसे हंसते हुए बुला सके संगत में गुनगुनाते पूरे वाद्यवृंद को
घूमते हुए गा सके, क्‍यों वैसी मेरी ज़बान नहीं है
अलग-अलग ज़बानों की कहानियां हैं खानों की
पुरानों की फ़सानों की, मुरचा खाये जीवन, सात औ' सत्रह संधानों की

समय की वह जो ज़बान होगी उस गाने की क्‍या कहानी होगी
जिसके करीब पहुंचने को इतना जोर मारूंगा.

2 comments:

  1. समय के परे ,ज़बान के सिरे ,मन के चटके चीरे से निकले जो आह भी नहीं वाह भी नहीं ,ऐसे किसी गीत की तिरछी नज़र वाली लड़की की भूली भोली चितवन ,भली सी अगर पकड़ ली ?

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  2. समय से इतर शाश्वत व सूक्ष्म होगी वह जबान...
    निश्चित ही समय उस जुबान में नहीं होगा, वह तो बीत जाता है... हर क्षण बीत ही तो रहा है!
    ***
    "जिस ज़बान में समय होगा मेरी वह ज़बान नहीं होगी", जितना प्रभावशाली है भाव, यह शीर्षक, उतनी ही प्रभावशाली है देर रात के बाजे की आवाज़.

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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