Saturday, November 2, 2013

फिर बैतलवा डाल पर..

photo: nirmal poddar
दिवालों[1] का नाम न पूछो. दूर से धोखा हो सकता था, पास हूं मैं अब तो पहचानो, प्‍यार से देखो, काम[2] तो पूछो. या छोड़ो, जाने दो, मत पूछो, क्‍योंकि कुछ भी पूछोगे, हमें दिवालों से सिर पटकाये रोना अच्‍छा लगता होगा. किसको कैसर पत्‍थर मारूं, कौन पराया होगा, शीश-महल में इक-इक चेहरा अपना लगता है, या होगा. जैसाकि बार में अपना जीवन शुरु करके बार-गीतों को जगत्प्रिय मचल-बहल में गूंथ देनेवाले राजकोट, गुजरात के दिवाला सिंगर पंकज उधास ने बहुत पहले धीर-गंभीर कभी कहा ही था. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना. जैसे कुत्‍ते का काम है भौंकना, स्‍टेटस का काम है फेसबुक पर दांत चियारे सकारे-सकारे चढ़ना. बेबात गंभीरली हियां-हुआं के फेंकना. जैसे दुनिया के सबसे बड़हन सहीबाज यहीये हुए. मां कसम. अल्‍ला कसम भी..

ऐसे ही नहीं है कि मीर साहेब ने चुपके से बगल बचाकर फेंका होगा, “अश्‍क आंखों में कब नहीं आता / लहू आता है जब नहीं आता।” या सरकार के पहुंचे हुए मुलाजिम बाग़-ए-बेदिल[3] की दीवारों को पढ़ने की बेसबब कवायद में गुम गये होंगे. बुढ़ौती में लता ताई फूल और तारों की फोटुएं खींचने की बजाय, जाने क्‍यों गुजरात की ओर देखते हुए इकतारा पर मोदी हमारा छेड़ रही हैं. मगर बुढ़ौती की बेचैनियां हमेशा श्रीयुत श्रीश्री रविशंकरों के भजन ही कहां गवाती हैं, कतिपय हैरतनाक कारनामे भी छेरवाती रहती ही हैं; जैसे रहते-रहते मैं घबराकर जब किसी षोडशी को प्रेम-पत्र न लिख रहा होऊं, जापानी वीर-बालाओं के फोटू देखने निकल ही लेता हूं, लता माई गुजरात के गजराज के ख़यालों में विह्वलने लगें, भला क्‍यों ताज्‍जुब हो. नहीं होता. कम से कम मुझको नहीं होता. अलबत्‍ता आशा ताई गाये लगती हैं, ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया,’ उससे बेतरह तक़लीफ़ जरूर होने लगती है. पता नहीं क्‍यों होती है. आपको पता चले तो बताइयेगा.

अदरवाइस, दिवाला मुबारक.

[1]. दिवाले: एक परिप्रेक्ष्‍य, निजी, पारिवारिक, सामाजिक, प्रादेशिक, राष्‍ट्रीय, वैश्विक; सुमति कुमार चटुपार्ध्‍या, सन्‍मार्ग प्रकाशन, कलकत्‍ता, 1918.
[2]. देखें, विकि पृष्‍ठ: http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE. विकिपीडिया देखने के ख़याल से घबराहट होती हो तो यू-ट्यूब पर सीधे ‘एन इवनिंग इन पैरिस’ की संवरायी कामोत्‍तेजनाएं भी देख सकते हैं.
[3]. कृपया एक नज़र मारें (कृपया, नज़र ही मारें, गुलेल न मारें): http://kabaadkhaana.blogspot.in/2013/10/blog-post_1831.html

3 comments:

  1. सब बांच लिये। जापानी बालाओं वाला लेख बांच के और देख के आनन्दित हुये।

    आपको दीवाली मुबारक।

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  2. आपकी यह पोस्ट आज के (०२ नवम्बर, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - ये यादें......दिवाली या दिवाला ? पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  3. बहुत सुंदर दीपोत्सव शुभ हो !

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