Saturday, November 16, 2013

सुभौ-सुभौ..

कैसी घरबराहट मची रहती है लेकिन. कि नचाकर देखो उंगलियां नाच रही हैं कि नहीं, हाथ अभी यहीं तो था फिर उठ क्‍यों नहीं रहा, पैर साथ हैं, कि छूटे.. (दिमाग तो बद्तमीज़ खुद को दो हाथ की दूरी बनाकर दूर किये ही रहता है!).. बीच सुबह खड़े होकर टटोलना फिर कि सुभो, तुम कहां हो? मुंह सिये चुपके से पुकार लेना तमन्‍ना, तुमि आछो तो?.. फिर गमछी, कुरता और हवाई चप्‍पल सहेजते हुए जेसुदास को गुमसुमाये गुनगुनाने लगना, ऐ मेरे उदास मन (मुक्तिबोध को नहीं).. ओह, कैसी तो घ-र-ब-रा-ह-ट..

एक मीठे-से अमूर्तन के बीच खड़े रहकर फीके गुलाबी में भींजे, नहाये अचानक फिर महसूस करिये कि अमूर्तन ही अमूर्तन है, मीठा तो हुआ लापता.. फरार.. घर छोड़कर भागा दुष्‍ट!

बॉदेलियर की कविता की ज़रा-सी ताप बची रहे.. शर्ट के सामनेवाली जेब में नहीं तो पतलून के पिछलकी में ही सही? तनि-तनि मुस्कियाने, तसल्‍ली में गोड़ हिलाने वाली मुक्तिबोधन बीड़ि‍या, बली रहे? आत्‍मा में पामुक की फटी आंखों का कौतुक चौंकन्‍नापन, ओनोरे की तीनसौसाठ डिग्री का गर्हित, मार्मिक घुमायमान, प्रूस्‍त का घनत्‍व और मिलोराद पाविच का धीर?..

अंड़से झोले में अरमान, थके अंड़से रहते.. इतनी-सी ऐंठ भी मगर साथ अंड़सी, रहती.. छुक-छुक छूटती रेल के तंग संकरे कारीडोरों में बच्‍चा ठुनकता हुलसियाये भागे जाता, और फिर उसके पीछे-पीछे भागी आती, ओह, कैसी तो घ-र-ब-रा-ट-ट..

3 comments:

  1. मुक्तिबोध की बीड़ी का वह धुआँ शायद अब भी मंगलनाथ में उठता होगा, जहाँ अधिकतर वे घंटों बैठा करते थे, मैंने भी घंटों वहाँ बैठकर उन्हें महसूसने की कोशिश की..

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  2. हां, पर आसान नहीं है सबके लिए, सुभौ की इस घबराहट को समझ पाना.

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की इस प्रविष्टि की चर्चा रविवार, दिनांक :- 24/11/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/" चर्चा अंक - 50- पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर ....

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