Friday, December 27, 2013

गर्म हवायें
















ले-देकर कुछ यही आया है अपने हिस्‍से
जबान, ज़मीन, और दुनिया में होने की धकियायी तमीज़
मालूम नहीं कैसी जबान है, और कितनी, किसकी ज़मीन
तमीज़ तो नहीं ही है, अंड़सायी रेल में बैठने को जगह खोजती है

होगी हरियाली, इन्‍हीं ज़मीनों पर कहीं होगी
सावन के आंखवाले देखते होंगे
जैसे इतना सारा मतवालापन बोलते होंगे
जंगले पर और अपनी सीढ़ि‍यों में मुझे तो बस धुआं दिखता है

रोज़ आंखें खोलकर जाने कैसा जहां दिखता है

हालांकि यह भी सच है कि मुज़फ़्फ़रनगर में हमारा कोई सगा खदेड़ा नहीं गया
हमारे सब सगे जहां हैं चैन के दड़बों में गुटर-गूं गाते औंधे पड़े हैं
हम भी पांच लोगों के समाज में दिल का हाल सुना, खुद को बहला आते हैं
और किसी ज़ाफरी परिवार को हुई होगी, हमारा परिवार ऐसे किसी तक़लीफ़ में नहीं है
यह और बात है बहुत वर्षों पहले हमने किसी सलीम मिर्जा का तक़लीफ़ में मुस्‍कराना देख लिया था
और अमिना, सिकंदर, बाकर मियां का हंसना, बतियाना, सांसत में आना सब अपने घर की बात लगी थी
दादी जान का पस्‍तहाल घर छोड़ते की कोठरी में खुद को छुपा जाना भी अपनी दादी-सी पुरानी

दिल को मरोड़नेवाले कुछ किस्‍से जाने किधर से घुसे आते हैं
जबकि खुद को बचा लेने का इतना पुख्‍ता इंतज़ाम हमने कर रखा है
ज़ाकिया ज़ाफरी, ओ जी, आप चुपचाप हल्‍ला नहीं कर सकतीं
कुछ नहीं सूझता तो चुपके चचा ग़ालिब को एक पुरची पठाइये
हमें तो अपने रोने-गाने में खिंची मत लाइये, ले-देकर आपके हिस्‍से
जो आया है, उसी धुयें में चलाइये, गर्म हवाओं में ज़माने को मत जलाइये. 

Friday, December 20, 2013

मुंह का स्‍वाद तुम कहां हो, या मंज़िल, ही..

“मटर-गोभी की तरकारी, कटहल व्‍यभिचारी, ये जो मुंह में गया, इसके बाद, भइया? मुंह के गड़हे के कारखाने में इनकी पोरसेसिंग सुरु होगी, पेट के लैबरेट्री में रसायनिक धूम-धड़ाका होगा, उसके अनंतर गोभी कटहल जहां ले आये रहे, हुंएं चहुंप जायेंगे, उसका अगवा का होगा, भइया?“ मोहन कुमार पुलकित और ज़रा-ज़रा सशंकित सवाल के धूप को जाड़े की अलसायी छांही पर थोड़ा आगे तक फैलाकर ह‍थेली पर खैनी पीटने की तैयारी में उत्‍साहीमदन होते बहलने लगे.

“पीछे-पीछे खैनी की पिचकारी चहुंपाये की तइयारी त कइये रहे हैं?” जसोदानंदन आंखों-आंखों मुस्कियाते लजाता हुआ व्‍यक्ति कितना लाल हो सकता है के अभिनय में खुद को सजाने लगे.

“खइनी के बीस मिनिट आगे पान का पाता है, दू घंटा आगे मुरई के पाता के पकौड़ी है, सिंघाड़ा अउर गुड़ के जलेबी है, मुंह के करखाना को कवनो रेस्टिन है, मरदे?” कहकर संकर चलित्‍तर हंसने लगे, उनकी देखादेखी दूसरों की बहक में मोहन कुमार की देह भी मचलने-हिलने लगी, हाथ की खैनी, हाथ में ही मचली अपने गंतव्‍य तक पहुंचने की राह तकती रही..

मेरा कोई गंतव्‍य नहीं था. कभी नहीं था. बहुत वर्षों पहले एक तमिल मित्र ने टेलीपैथी पर सवाल किया था सिंगापुर में कारों की सेल्‍समैनी की नौकरी में बझा हूं, ऋषिकेश टलहने जा रहा हूं, तुम आ रहे हो? मैं बहुत पीछे अतीत में रज़ाक टाकिज़ के संकरे कंपाउंड में नासिर हुसैन की ‘कारवां’ के भीमकाया पोस्‍टर-निहारन, और लगातार दूसरे ‘दिन टिकट नहीं पा पाये’ के मार्मिक दु:ख में मलिन हो रहा था, मचलकर जवाब दिया था, मुझे मेरा गंतव्‍य मालूम नहीं, राजू, आ नहीं सकता, तुम सिंगापुर, सियाटल, सोनभद्र, सावाकावी, जहां जाकर अपनी मंज़ि‍ल पानी है, पाओ, मुझे मत बहकाओ, प्‍लीज़.

यह ऐसे ही नहीं होता कि अभी भी हर तिमाहे के घनघोर असमंजस के बिमरहा घोड़े की जर्जरस्‍त पसलियों को टटोलता हुआ कंपकंपायी मं‍ज़िल की ओर निकलता हूं, रास्‍ते में ब्ल्म्पियाती कोई किताब बहकी उतरी आती है, डेढ़ और अढ़ाई अटपटायी इशारे करती है, और मंज़ि‍लोसंधान का मेरा सारा डेढ़ इंची कार्यक्रम इधर-उधर ध्‍वस्‍त संत्रस्‍त हो जाता है.

मुंह के गड़हे में स्‍वाद की नदी अपने को खोल निर्वस्‍त्र करती, उन्‍मुक्‍त सुंगंधियान करती, फिर अंततोगत्‍वा कहां निकल जाती है, मैं मंज़ि‍ल से बाहर, बहुत दूर पीछे छूटा, अपने को फिर वही पुराने आसनसोली मनोहरपु‍री रेलवे यार्डों व चाय की करियायी चूल्‍हेवाली गुमटियों पर फिर-फिर क्‍यों पाता रहता हूं? जबकि जागकर देखने को जलसाघर है, तलघर की घरघराती ख़ामोशी में सोये-सोये पहुंचने को जापान है, चिल्‍लाने और बचाने को स्‍त्री और कामरेड का अपमान है, हकलाता और अपने को बनाता, गर्विला अज्ञानी विज्ञान भी है?

जीवन तुम कहां हो, मैं मंज़ि‍ल के साथ नहीं, तुम्‍हारी गलबंहियों में कहीं पहुंचने के लिए नहीं, बस साथ टहलने के लिए आया हूं, मगर तुम हो कहां, ऊपर हरिद्वार किंबा सोमालिया, सुडान के आसमान में, या चीले की अपनी बहली, भटकी हुई पौलिन गार्सिया की ग्‍लोरिया की भड़कीली, अकेली रातों के संगी बने हो, या मेरी उंगलियों के पोर पर चमकते, गायब बैठे हुए हो, कमज़ोर आंखों से सिर्फ़ मुझे दीख भर नहीं रहे?

Sunday, December 15, 2013

आसपास, लिखना..

(heather murray के ब्‍लॉग से)
मैं जब नहीं लिखूंगा, तब भी खुद को चुपचाप लिखता हुआ ही मिलूंगा. वह लिखना, हो सकता है, मेरी पहचान मेरी ज़बान का न हो; ख़यालों, आकारों, चेहरों को किन्‍हीं सलीकों में व्‍यवस्थित करने की कोशिश करता, समय और स्‍मृति के बीहड़ में अपने को फैलाकर, खोकर, फिर दूर तक ढूंढ़ते फिरुंगा..

लिखने का कुछ हासिल न होगा, लिखना देर रात का चुपचाप गुनगुनाना होगा, रात के सुनसान और अकेले के अनुसंधान में, भोले कवि और अलसाये ईश्‍वर के ‘आयेंगे अच्‍छे दिन!’ की भावुकताखोर लोरियों के बाजू, टहलते दूर निकल जाने, कटहल, खीरा, झीरपानी, बोस्निया, कुर्द, लेबनॉन, मुनव्‍वर, मुज़फ्फर के तसव्‍वुर में याद करना कि दुनिया में होना, तक़लीफ़ों के किन सिलसिलों में होना है..

लिखना हमेशा मुश्किल सवाल करेगी, दिल मरोड़नेवाली ज़ि‍रह, कि बीमारियों की बुनावट जानते हो, दुनिया देखने का सुथरा चश्‍मा है तुम्‍हारे पास, भाषा बुनने का साफ़ पंचांग? पैर के नाख़ून धुले हैं, आत्‍मा में अंजोरा है, जड़ें अपनी साथ लेकर आये हो? मैं हकलाता, अ‍कबकाया कहूंगा जड़ के बाज़ार बसता हूं, उनींदे के नेट में, दुर्जड़ें बहुत दूर निकल गई हैं, हालांकि यह भी सच है कि जर्जरस्‍त हूं..

लिखना एकदम से खुद को अजनबी कर लेगा, जैसे शहर की भीड़ और यातायात में मेरी ज़बान स्‍वयं को संभालने के जतन में उछलने, घबरायी भूलने लगेगी, जैसे लंबे सफ़र के बाद रेल से उतरकर मैं फिर से खुद को ढूंढ़ने लगूंगा, लिखना हौले से नन-कमिटल मुस्‍करायेगी, जैसे पूर्व-प्रेम शौकीनी में धोखियाता है, अब मिलते नहीं, आकर मिलो न कभी? मैं उम्‍मीदबर कांपता सिहरुंगा, अंधेरों में एक कदम आगे और रखूंगा.. 

Thursday, December 12, 2013

शिद्दत वाली यादें..

भूपिंदर का 'रुत जवां, रुत जवां' इसी फ़िल्‍म में था
यादें दवाई की वे पुड़ि‍यां हैं जो ज़रुरत के वक़्त नहीं मिलतीं, और किसी उस पेंसिल की तरह तब मिलती हैं जब उससे लिखने की आदत छूट गई हो. रंजीता दी हंसते हुए कहती, शिद्दत से यादें क्‍या होती हैं, शिद्दत से तो हमने बस बलराम के फुचके खाये हैं, या रज़ाक टाकीज़ के पीछे जयराम की कुल्‍फी; उस शिद्दत से तो फिर हमने शादी भी नहीं की..

मौसी से मनुहार करता हूं, मौसी, तुम बताओ. आंचल से सूखा मुंह पोंछकर मौसी कहती है, शिद्दत से, बच्‍चा, हम सीवटर और बड़ी बनावत रहीं, गोड़ में आलतो लगवाइल करीं, शिवरात के समय ऊहे जतन से उपासो करत रहीं, मगर जब से इनके एक्‍सीडेंट हुआ, अउर कार्तिक के पढ़ाई गड़बड़ाइल, हमरे सब जतन पे जइसे पाला पड़ गईल, बच्‍चा..

दीवानापन भी प्रेम की एक टेक है, सबके हिस्‍से नहीं आती. और जिनके आती भी है, उनके यहां भी गोद में हाथ डाले बैठी नहीं रहती, चुपचाप किसी दिन निकल जाती है, फिर आप उसे बस की अगली सीट पर बैठे किसी चेहरे में खोजते रहते, और किसी दीवाने फिल्‍म में देखकर भावुक होने लगते हैं. मैं शिद्दत से याद करने की कोशिश करता हूं बचपने के नंगे पैरों में हवाई चप्‍पल कब आया था, रेकार्ड प्‍लेयर पर अपने हाथों संभालकर एहतियातत से प्‍लेयर की सुई कब चढ़ाई थी और उस शुरुआती घिस-घिस की आवाज़ के तनावी इंतज़ार के बाद स्‍वरों की एंट्री से कैसा चमत्‍कारी आह्लाद हुआ था, कब हुआ था, जेब के अपने पैसों से पहली मर्तबा रंग कब खरीदा था, टुकुल को कैसे कहते सुना था कि मुझसे प्‍यार नहीं कर सकती, उसे दुर्गापूजा में ममेरी बहनों के पास मनोहरपुर जाना है.. और देखता हूं, मुझे कुछ भी याद नहीं!

रज़ाक टाकीज़ की तंग गलियों के पार जालीदार टिकट खिड़की, सिनेमा तक जाने के लिए ऊपर की ओर संकरी सीढ़ि‍यां, बच्‍चों के नंगे पैरों और औरतों की रंगीन साड़ि‍यों वाला चिल्‍ल-पिल्‍ल मचाये समूचा बिहराती कुनबा, ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ और ‘अमर प्रेम’ में मां का मुंह पर साड़ी दाबे भल्‍ल-भल्‍ल रोना, सेक्‍टर चौदह में सिंघड़ा-बड़ा-जिलेपी की एक अस्‍बेस्‍ट्स के छत वाली घिसी, करियाये चूल्‍हे की दुकान थी, जिसका उम्रदराज़ बौना मालिक हमेशा पुरानी एक काठ की कुर्सी पर बांहवाली गंजी और नीले चारखाने की लुंगी में मंद-मंद मुस्‍कराता, अख़बार पढ़ता मिलता, और उसके यहां की सिंघड़ा और जिलेपी खाकर मुंह पर उल्‍टे हाथों से स्‍वाद पोंछते, हम बाहर स्‍टैंड की साइकिल निकालकर हवाओं को अपनी आंखों पर लेकर सोचते दुनिया इतनी, कितनी अच्‍छी है न टुकुल, और फिर वह सब गुज़रती हवाओं, बीसियों चोटों और पचासों यात्राओं की बहसबाजियों में कहीं लुप्‍त हो जाता और शिद्दत से फिर यही याद रहता कि शिद्दत से कहां कुछ याद है!

लिली कहती है बाहर जा रहे हो, लौटते में दवाई लेना मत भूलना. मैं कहता हूं, शिद्दत से याद रखूंगा.

(उपरोक्‍त गिनाये सभी नाम व किस्‍से, शिद्दत के हों, मगर पूरी तरह गल्‍प हैं)

Tuesday, December 10, 2013

एक मानवोचित, ललित क्षुद्र निबंध..

मनुष्‍य ने देह खुजाना कब शुरु किया? क्‍या यह उसके नागर होने के बाद की व्‍यथा है, या पेड़ों और जंगलों के निवास में ही उसे खबर हो गई थी कि ये सारे जंगल एक दिन डेवलपर्स की आस्‍तीन में घुस जायेंगे, खुजली, हरामख़ोर, कहीं नहीं घुसेगी, हमेशा उसके साथ रहनेवाली है? खुज-खुज-खुज का प्राचीन, चिरकालिक, परिचित खरखराता राग, ओह, मगर शुरु कब हुआ? और मैं नाक और कान व अन्‍य रंध्रप्रज्ञ गवेषणाओं की यहां नहीं कह रहा, वह प्रज्ञा शुद्ध सांस्‍कृतिक भारतीय विशिष्‍टता है और इस सभ्‍यतायी उठान व उड़ान में अल्‍बानिया किंबा अमरीका कहीं हमारे आगे नहीं ठहरते. जैसे श्‍यामवर्णी शिकाकाईयुक्‍त लंबे केशधारण में. मनोहारी कृष्‍ण हों या व्‍यभिचारविमुक्‍त राम, भेड़-बकरियों के बीच स्‍वयं को विवर्ण कर रहे जीसु (या मोहम्‍मद ही) क्‍या खाकर (निश्चित ही भेड़ व बकरियों के भक्षण से नहीं) उन केशों को मुकाबला करेंगे? बिलासपुर से लेकर त्रिचूर तक छपे सभी रंगदार पोस्‍टर्स इसका साक्षात जीवंत प्रमाण हैं. इन निर्कलंककारी केशों का मगर प्रसाधन कब शुरु हुआ? मालवायी मिट्टी, हैदराबादी मेंहदी या गुरुवल्‍ली के निलंबुरस धन की निश्चित आश्‍वस्ति थी, मगर राम (किंबा कृष्‍ण) को शैम्‍पू-संज्ञान ठीक-ठीक कब हुआ? या नहीं ही हुआ? श्‍वेतवर्णी शकुंतलाओं को जान लिये, श्‍यामवर्णी रहस्‍याचूड़ शैम्‍पू जानने से रह गये?

मनुष्‍यप्रिय ईश्‍वर ही क्‍यों, मनुष्‍य तक कितना कुछ जानने से रह जाता है. बहुत बार तो यह तक जानने से रह जाता है कि मनुष्‍य है. डेंटिस्‍ट की कुर्सी चित्‍त लेटे, मुंह बाये, मन ही मन भीषण घबराये वह नाजी भूखंडों की उर्वरा यहूदी खाद बना अकुलाया, मचलन में विह्वलता है, मनुष्‍यता में कहां रहता है? यहीं फिर इसकी जिज्ञासा लौटी आती है कि डेंटिस्‍ट्री का ही महक़मा कब अपने प्रापर रंग में आया, एनेस्‍थेसाइज़र कब शांति का पैग़ाम लेकर आये? उससे पहले की भयकामी दुनिया का मिज़ाज कैसा था, लोग दांत के डाक्‍टर के पास गरदन जिबह कराने के किस, कैसे उत्‍साह से जाते थे? या रबर से खिंचवाकर दांत उखड़वाने के मार्मिक ख़याल से खेलते हुए, खेलते-खेलते मानवीय भोलेपन में, बजाय डाक्‍टर से मिलने के, कमरे में रस्‍सी लटकाकर उससे झूल जाते थे?

मगर मनुष्‍य ने (जिलेबी खाना नहीं) देह खुजाना कब शुरु किया? या सिर ही..?

Wednesday, December 4, 2013

बकलोलपुर..

फोटो: निर्मल पोद्दार
स्‍टील की कटोरी में सरसों का तेल, तकिये के बाजू धरी चालीस वर्षों पुरनकी- काम की- हाथघड़ी और एक बेकाम नोकिया का नयका सेल (जिसको ठीक से बरतना वह अभी भी नहीं जानते थे, न ही जानने की दिलचस्‍पी रखते..), महकव्‍वा जर्दे की डिबिया, सरौता और एक पनबट्टा (जिसमें सिर्फ़ सुपाड़ी रहती), सफ़ेद अंगौछा और घिसा नीला हवाई चप्‍पल, जदुनंदन बाबू कहते सत्‍तर साल पहुंचकर अब यही है जो है, इससे बाहर का, बच्‍चा, कुच्‍छौ हमारी पहचान में नहीं आता. फिर भारी खरखराती सांस खींचकर सुस्‍ताने की तसल्‍ली के बाद जोड़ते, देखे-जाने की अऊर जरुरते क्‍या है?

टप्‍पू की अम्‍मां और जदुनंदन जी की श्रीमती जब तक थीं, टप्‍पू के बहाने दिल्‍ली तक देख लेने की ज़रुरत बनी रहती. उनके उठ जाने के बाद फिर बाबूसाहब ने जैसे मुंह सी लिया, आंखों पर बिनोद बिहारी मुकर्जी वाला अदृश्‍य काला चश्‍मा चढ़ा लिये. खटिया पर चुप्‍पा मारे पटाये रहते. एक पांत में दस-बारह गेंदे के बड़हन पौधे थे, पहले उनके बगल टहलते-टहलते हथेली में सरौता दाबे जो सुपारी कतरा करते थे, अब खटिये से उठने में संकोच मार जाते. टप्‍पू दिल्‍ली से गांव आकर दुखी होता कि माइक्रोवेब लाकर रखे थे कि आसानी हो जायेगी, उसका बाबूजी यूजो नहीं करते हैं! फ़ोन की घंटी बजती रहती है, फ़ोन तक नहीं उठाते हैं, ऐसे थोड़ी होता है, मरदे?..

भतुआ के तरकारी बनवा दें, बाउजी, खाइयेगा?..

वृजमोहन कानपुर की तरफ के हैं, वह पूछते हैं, भाई साहब, यह भतुआ क्‍या हुआ?

झिलमिल के पेड़ के नीचे लुंगी सहेजता, उकड़ूं बैठता मुन्‍ना यादव गरदन बायें फेर, निशाने पर दू मर्तबा थूक की पिचकारी गिराने के बाद उनकी जानकारी में इजाफ़ा करता है, आपके ओर उसको सफेद कोंहड़ा बोलते हैं, हमरे यहां वहीये भतुआ बोलाता है!

और यह जो डेढ़ हाथ भर लहराती सरसों दिख रही है, यह कब तक तैयार हो जायेगी?..

वृजमोहन जी के पिता आसनसोल रेलवे की नौकरी में थे, वह खुद यूपी हैण्‍डलूम में खजांची रहे हैं, खेती से उनका दूर-दूर तक वास्‍ता नहीं, लेकिन ऐसे सवालों को पूछते हुए चेहरे पर आ गई गंभीरता के भाव से उनकी पुरानी मुहब्‍बत है.

रघुवंशी की नौ साल की बिटिया अंकिता को उसके दिलीप चाचा ने सिवान बाज़ार से लाकर नया-नया ट्रैक पैंट दिया है, तीन दिन से लइकी वहीये देह पर डाटे उसकी चिंथाई कर रही है, घुटने पर दौरी में बथुआ काढ़ती आजी के पास पहुंचकर पूछती है, ई पचफोरन का होला, आजी?

विमल तिवारी ढेला फेंककर सुस्‍ताती, पेट से, कुतिया को चिंचियाने और भागने पर मजबूर करता, कहता है, एक से एक बकलोल है, साला, तुम लोग देखे हो, सुदमवा के हियां बियाह में कल रात सब का गंध मचाया सब?