Wednesday, December 4, 2013

बकलोलपुर..

फोटो: निर्मल पोद्दार
स्‍टील की कटोरी में सरसों का तेल, तकिये के बाजू धरी चालीस वर्षों पुरनकी- काम की- हाथघड़ी और एक बेकाम नोकिया का नयका सेल (जिसको ठीक से बरतना वह अभी भी नहीं जानते थे, न ही जानने की दिलचस्‍पी रखते..), महकव्‍वा जर्दे की डिबिया, सरौता और एक पनबट्टा (जिसमें सिर्फ़ सुपाड़ी रहती), सफ़ेद अंगौछा और घिसा नीला हवाई चप्‍पल, जदुनंदन बाबू कहते सत्‍तर साल पहुंचकर अब यही है जो है, इससे बाहर का, बच्‍चा, कुच्‍छौ हमारी पहचान में नहीं आता. फिर भारी खरखराती सांस खींचकर सुस्‍ताने की तसल्‍ली के बाद जोड़ते, देखे-जाने की अऊर जरुरते क्‍या है?

टप्‍पू की अम्‍मां और जदुनंदन जी की श्रीमती जब तक थीं, टप्‍पू के बहाने दिल्‍ली तक देख लेने की ज़रुरत बनी रहती. उनके उठ जाने के बाद फिर बाबूसाहब ने जैसे मुंह सी लिया, आंखों पर बिनोद बिहारी मुकर्जी वाला अदृश्‍य काला चश्‍मा चढ़ा लिये. खटिया पर चुप्‍पा मारे पटाये रहते. एक पांत में दस-बारह गेंदे के बड़हन पौधे थे, पहले उनके बगल टहलते-टहलते हथेली में सरौता दाबे जो सुपारी कतरा करते थे, अब खटिये से उठने में संकोच मार जाते. टप्‍पू दिल्‍ली से गांव आकर दुखी होता कि माइक्रोवेब लाकर रखे थे कि आसानी हो जायेगी, उसका बाबूजी यूजो नहीं करते हैं! फ़ोन की घंटी बजती रहती है, फ़ोन तक नहीं उठाते हैं, ऐसे थोड़ी होता है, मरदे?..

भतुआ के तरकारी बनवा दें, बाउजी, खाइयेगा?..

वृजमोहन कानपुर की तरफ के हैं, वह पूछते हैं, भाई साहब, यह भतुआ क्‍या हुआ?

झिलमिल के पेड़ के नीचे लुंगी सहेजता, उकड़ूं बैठता मुन्‍ना यादव गरदन बायें फेर, निशाने पर दू मर्तबा थूक की पिचकारी गिराने के बाद उनकी जानकारी में इजाफ़ा करता है, आपके ओर उसको सफेद कोंहड़ा बोलते हैं, हमरे यहां वहीये भतुआ बोलाता है!

और यह जो डेढ़ हाथ भर लहराती सरसों दिख रही है, यह कब तक तैयार हो जायेगी?..

वृजमोहन जी के पिता आसनसोल रेलवे की नौकरी में थे, वह खुद यूपी हैण्‍डलूम में खजांची रहे हैं, खेती से उनका दूर-दूर तक वास्‍ता नहीं, लेकिन ऐसे सवालों को पूछते हुए चेहरे पर आ गई गंभीरता के भाव से उनकी पुरानी मुहब्‍बत है.

रघुवंशी की नौ साल की बिटिया अंकिता को उसके दिलीप चाचा ने सिवान बाज़ार से लाकर नया-नया ट्रैक पैंट दिया है, तीन दिन से लइकी वहीये देह पर डाटे उसकी चिंथाई कर रही है, घुटने पर दौरी में बथुआ काढ़ती आजी के पास पहुंचकर पूछती है, ई पचफोरन का होला, आजी?

विमल तिवारी ढेला फेंककर सुस्‍ताती, पेट से, कुतिया को चिंचियाने और भागने पर मजबूर करता, कहता है, एक से एक बकलोल है, साला, तुम लोग देखे हो, सुदमवा के हियां बियाह में कल रात सब का गंध मचाया सब?

2 comments:

  1. छोटे शहरों का व्यवहार समुच्चय बकलोलपुर कहलाता है।

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