Tuesday, December 10, 2013

एक मानवोचित, ललित क्षुद्र निबंध..

मनुष्‍य ने देह खुजाना कब शुरु किया? क्‍या यह उसके नागर होने के बाद की व्‍यथा है, या पेड़ों और जंगलों के निवास में ही उसे खबर हो गई थी कि ये सारे जंगल एक दिन डेवलपर्स की आस्‍तीन में घुस जायेंगे, खुजली, हरामख़ोर, कहीं नहीं घुसेगी, हमेशा उसके साथ रहनेवाली है? खुज-खुज-खुज का प्राचीन, चिरकालिक, परिचित खरखराता राग, ओह, मगर शुरु कब हुआ? और मैं नाक और कान व अन्‍य रंध्रप्रज्ञ गवेषणाओं की यहां नहीं कह रहा, वह प्रज्ञा शुद्ध सांस्‍कृतिक भारतीय विशिष्‍टता है और इस सभ्‍यतायी उठान व उड़ान में अल्‍बानिया किंबा अमरीका कहीं हमारे आगे नहीं ठहरते. जैसे श्‍यामवर्णी शिकाकाईयुक्‍त लंबे केशधारण में. मनोहारी कृष्‍ण हों या व्‍यभिचारविमुक्‍त राम, भेड़-बकरियों के बीच स्‍वयं को विवर्ण कर रहे जीसु (या मोहम्‍मद ही) क्‍या खाकर (निश्चित ही भेड़ व बकरियों के भक्षण से नहीं) उन केशों को मुकाबला करेंगे? बिलासपुर से लेकर त्रिचूर तक छपे सभी रंगदार पोस्‍टर्स इसका साक्षात जीवंत प्रमाण हैं. इन निर्कलंककारी केशों का मगर प्रसाधन कब शुरु हुआ? मालवायी मिट्टी, हैदराबादी मेंहदी या गुरुवल्‍ली के निलंबुरस धन की निश्चित आश्‍वस्ति थी, मगर राम (किंबा कृष्‍ण) को शैम्‍पू-संज्ञान ठीक-ठीक कब हुआ? या नहीं ही हुआ? श्‍वेतवर्णी शकुंतलाओं को जान लिये, श्‍यामवर्णी रहस्‍याचूड़ शैम्‍पू जानने से रह गये?

मनुष्‍यप्रिय ईश्‍वर ही क्‍यों, मनुष्‍य तक कितना कुछ जानने से रह जाता है. बहुत बार तो यह तक जानने से रह जाता है कि मनुष्‍य है. डेंटिस्‍ट की कुर्सी चित्‍त लेटे, मुंह बाये, मन ही मन भीषण घबराये वह नाजी भूखंडों की उर्वरा यहूदी खाद बना अकुलाया, मचलन में विह्वलता है, मनुष्‍यता में कहां रहता है? यहीं फिर इसकी जिज्ञासा लौटी आती है कि डेंटिस्‍ट्री का ही महक़मा कब अपने प्रापर रंग में आया, एनेस्‍थेसाइज़र कब शांति का पैग़ाम लेकर आये? उससे पहले की भयकामी दुनिया का मिज़ाज कैसा था, लोग दांत के डाक्‍टर के पास गरदन जिबह कराने के किस, कैसे उत्‍साह से जाते थे? या रबर से खिंचवाकर दांत उखड़वाने के मार्मिक ख़याल से खेलते हुए, खेलते-खेलते मानवीय भोलेपन में, बजाय डाक्‍टर से मिलने के, कमरे में रस्‍सी लटकाकर उससे झूल जाते थे?

मगर मनुष्‍य ने (जिलेबी खाना नहीं) देह खुजाना कब शुरु किया? या सिर ही..?

1 comment:

  1. जलेबी संधान ज्यादा रोचक विषय प्रतीत होता है. कौनपुर का वह सबसे रौनक भरा युवा मनों की
    मिलीजुली भनभनाहट से गुंजायमान चौराहे का चाय गुमटी वाला जलेबी विहीन पड़ोस को सह पाता होगा, इसमें शक है.

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