Thursday, December 12, 2013

शिद्दत वाली यादें..

भूपिंदर का 'रुत जवां, रुत जवां' इसी फ़िल्‍म में था
यादें दवाई की वे पुड़ि‍यां हैं जो ज़रुरत के वक़्त नहीं मिलतीं, और किसी उस पेंसिल की तरह तब मिलती हैं जब उससे लिखने की आदत छूट गई हो. रंजीता दी हंसते हुए कहती, शिद्दत से यादें क्‍या होती हैं, शिद्दत से तो हमने बस बलराम के फुचके खाये हैं, या रज़ाक टाकीज़ के पीछे जयराम की कुल्‍फी; उस शिद्दत से तो फिर हमने शादी भी नहीं की..

मौसी से मनुहार करता हूं, मौसी, तुम बताओ. आंचल से सूखा मुंह पोंछकर मौसी कहती है, शिद्दत से, बच्‍चा, हम सीवटर और बड़ी बनावत रहीं, गोड़ में आलतो लगवाइल करीं, शिवरात के समय ऊहे जतन से उपासो करत रहीं, मगर जब से इनके एक्‍सीडेंट हुआ, अउर कार्तिक के पढ़ाई गड़बड़ाइल, हमरे सब जतन पे जइसे पाला पड़ गईल, बच्‍चा..

दीवानापन भी प्रेम की एक टेक है, सबके हिस्‍से नहीं आती. और जिनके आती भी है, उनके यहां भी गोद में हाथ डाले बैठी नहीं रहती, चुपचाप किसी दिन निकल जाती है, फिर आप उसे बस की अगली सीट पर बैठे किसी चेहरे में खोजते रहते, और किसी दीवाने फिल्‍म में देखकर भावुक होने लगते हैं. मैं शिद्दत से याद करने की कोशिश करता हूं बचपने के नंगे पैरों में हवाई चप्‍पल कब आया था, रेकार्ड प्‍लेयर पर अपने हाथों संभालकर एहतियातत से प्‍लेयर की सुई कब चढ़ाई थी और उस शुरुआती घिस-घिस की आवाज़ के तनावी इंतज़ार के बाद स्‍वरों की एंट्री से कैसा चमत्‍कारी आह्लाद हुआ था, कब हुआ था, जेब के अपने पैसों से पहली मर्तबा रंग कब खरीदा था, टुकुल को कैसे कहते सुना था कि मुझसे प्‍यार नहीं कर सकती, उसे दुर्गापूजा में ममेरी बहनों के पास मनोहरपुर जाना है.. और देखता हूं, मुझे कुछ भी याद नहीं!

रज़ाक टाकीज़ की तंग गलियों के पार जालीदार टिकट खिड़की, सिनेमा तक जाने के लिए ऊपर की ओर संकरी सीढ़ि‍यां, बच्‍चों के नंगे पैरों और औरतों की रंगीन साड़ि‍यों वाला चिल्‍ल-पिल्‍ल मचाये समूचा बिहराती कुनबा, ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ और ‘अमर प्रेम’ में मां का मुंह पर साड़ी दाबे भल्‍ल-भल्‍ल रोना, सेक्‍टर चौदह में सिंघड़ा-बड़ा-जिलेपी की एक अस्‍बेस्‍ट्स के छत वाली घिसी, करियाये चूल्‍हे की दुकान थी, जिसका उम्रदराज़ बौना मालिक हमेशा पुरानी एक काठ की कुर्सी पर बांहवाली गंजी और नीले चारखाने की लुंगी में मंद-मंद मुस्‍कराता, अख़बार पढ़ता मिलता, और उसके यहां की सिंघड़ा और जिलेपी खाकर मुंह पर उल्‍टे हाथों से स्‍वाद पोंछते, हम बाहर स्‍टैंड की साइकिल निकालकर हवाओं को अपनी आंखों पर लेकर सोचते दुनिया इतनी, कितनी अच्‍छी है न टुकुल, और फिर वह सब गुज़रती हवाओं, बीसियों चोटों और पचासों यात्राओं की बहसबाजियों में कहीं लुप्‍त हो जाता और शिद्दत से फिर यही याद रहता कि शिद्दत से कहां कुछ याद है!

लिली कहती है बाहर जा रहे हो, लौटते में दवाई लेना मत भूलना. मैं कहता हूं, शिद्दत से याद रखूंगा.

(उपरोक्‍त गिनाये सभी नाम व किस्‍से, शिद्दत के हों, मगर पूरी तरह गल्‍प हैं)

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