Sunday, December 15, 2013

आसपास, लिखना..

(heather murray के ब्‍लॉग से)
मैं जब नहीं लिखूंगा, तब भी खुद को चुपचाप लिखता हुआ ही मिलूंगा. वह लिखना, हो सकता है, मेरी पहचान मेरी ज़बान का न हो; ख़यालों, आकारों, चेहरों को किन्‍हीं सलीकों में व्‍यवस्थित करने की कोशिश करता, समय और स्‍मृति के बीहड़ में अपने को फैलाकर, खोकर, फिर दूर तक ढूंढ़ते फिरुंगा..

लिखने का कुछ हासिल न होगा, लिखना देर रात का चुपचाप गुनगुनाना होगा, रात के सुनसान और अकेले के अनुसंधान में, भोले कवि और अलसाये ईश्‍वर के ‘आयेंगे अच्‍छे दिन!’ की भावुकताखोर लोरियों के बाजू, टहलते दूर निकल जाने, कटहल, खीरा, झीरपानी, बोस्निया, कुर्द, लेबनॉन, मुनव्‍वर, मुज़फ्फर के तसव्‍वुर में याद करना कि दुनिया में होना, तक़लीफ़ों के किन सिलसिलों में होना है..

लिखना हमेशा मुश्किल सवाल करेगी, दिल मरोड़नेवाली ज़ि‍रह, कि बीमारियों की बुनावट जानते हो, दुनिया देखने का सुथरा चश्‍मा है तुम्‍हारे पास, भाषा बुनने का साफ़ पंचांग? पैर के नाख़ून धुले हैं, आत्‍मा में अंजोरा है, जड़ें अपनी साथ लेकर आये हो? मैं हकलाता, अ‍कबकाया कहूंगा जड़ के बाज़ार बसता हूं, उनींदे के नेट में, दुर्जड़ें बहुत दूर निकल गई हैं, हालांकि यह भी सच है कि जर्जरस्‍त हूं..

लिखना एकदम से खुद को अजनबी कर लेगा, जैसे शहर की भीड़ और यातायात में मेरी ज़बान स्‍वयं को संभालने के जतन में उछलने, घबरायी भूलने लगेगी, जैसे लंबे सफ़र के बाद रेल से उतरकर मैं फिर से खुद को ढूंढ़ने लगूंगा, लिखना हौले से नन-कमिटल मुस्‍करायेगी, जैसे पूर्व-प्रेम शौकीनी में धोखियाता है, अब मिलते नहीं, आकर मिलो न कभी? मैं उम्‍मीदबर कांपता सिहरुंगा, अंधेरों में एक कदम आगे और रखूंगा.. 

5 comments:

  1. बवाल काम है लिखना भी। :)

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    1. मगर जब तक आप हैं, पंडिजी, बवाल कहां है?

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  2. मैं हकलाता, अ‍कबकाया कहूंगा जड़ के बाज़ार बसता हूं, उनींदे के नेट में, दुर्जड़ें बहुत दूर निकल गई हैं, हालांकि यह भी सच है कि जर्जरस्‍त हूं..
    बार बार पढने के लिए अपने पास रख रहा हूँ. (आपके शब्द अचीन्हे और अजाने लगते हैं, कभी कभी, लेकिन भाव ? एक दम पास के .

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    1. भाव खिवाने का शुक्रिया, हितेंद्र..

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  3. "...कि दुनिया में होना, तक़लीफ़ों के किन सिलसिलों में होना है.."

    लिखना...
    आसपास...
    और मन की कितनी ही बातें!

    चरणस्पर्श प्रणाम!

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