Friday, December 20, 2013

मुंह का स्‍वाद तुम कहां हो, या मंज़िल, ही..

“मटर-गोभी की तरकारी, कटहल व्‍यभिचारी, ये जो मुंह में गया, इसके बाद, भइया? मुंह के गड़हे के कारखाने में इनकी पोरसेसिंग सुरु होगी, पेट के लैबरेट्री में रसायनिक धूम-धड़ाका होगा, उसके अनंतर गोभी कटहल जहां ले आये रहे, हुंएं चहुंप जायेंगे, उसका अगवा का होगा, भइया?“ मोहन कुमार पुलकित और ज़रा-ज़रा सशंकित सवाल के धूप को जाड़े की अलसायी छांही पर थोड़ा आगे तक फैलाकर ह‍थेली पर खैनी पीटने की तैयारी में उत्‍साहीमदन होते बहलने लगे.

“पीछे-पीछे खैनी की पिचकारी चहुंपाये की तइयारी त कइये रहे हैं?” जसोदानंदन आंखों-आंखों मुस्कियाते लजाता हुआ व्‍यक्ति कितना लाल हो सकता है के अभिनय में खुद को सजाने लगे.

“खइनी के बीस मिनिट आगे पान का पाता है, दू घंटा आगे मुरई के पाता के पकौड़ी है, सिंघाड़ा अउर गुड़ के जलेबी है, मुंह के करखाना को कवनो रेस्टिन है, मरदे?” कहकर संकर चलित्‍तर हंसने लगे, उनकी देखादेखी दूसरों की बहक में मोहन कुमार की देह भी मचलने-हिलने लगी, हाथ की खैनी, हाथ में ही मचली अपने गंतव्‍य तक पहुंचने की राह तकती रही..

मेरा कोई गंतव्‍य नहीं था. कभी नहीं था. बहुत वर्षों पहले एक तमिल मित्र ने टेलीपैथी पर सवाल किया था सिंगापुर में कारों की सेल्‍समैनी की नौकरी में बझा हूं, ऋषिकेश टलहने जा रहा हूं, तुम आ रहे हो? मैं बहुत पीछे अतीत में रज़ाक टाकिज़ के संकरे कंपाउंड में नासिर हुसैन की ‘कारवां’ के भीमकाया पोस्‍टर-निहारन, और लगातार दूसरे ‘दिन टिकट नहीं पा पाये’ के मार्मिक दु:ख में मलिन हो रहा था, मचलकर जवाब दिया था, मुझे मेरा गंतव्‍य मालूम नहीं, राजू, आ नहीं सकता, तुम सिंगापुर, सियाटल, सोनभद्र, सावाकावी, जहां जाकर अपनी मंज़ि‍ल पानी है, पाओ, मुझे मत बहकाओ, प्‍लीज़.

यह ऐसे ही नहीं होता कि अभी भी हर तिमाहे के घनघोर असमंजस के बिमरहा घोड़े की जर्जरस्‍त पसलियों को टटोलता हुआ कंपकंपायी मं‍ज़िल की ओर निकलता हूं, रास्‍ते में ब्ल्म्पियाती कोई किताब बहकी उतरी आती है, डेढ़ और अढ़ाई अटपटायी इशारे करती है, और मंज़ि‍लोसंधान का मेरा सारा डेढ़ इंची कार्यक्रम इधर-उधर ध्‍वस्‍त संत्रस्‍त हो जाता है.

मुंह के गड़हे में स्‍वाद की नदी अपने को खोल निर्वस्‍त्र करती, उन्‍मुक्‍त सुंगंधियान करती, फिर अंततोगत्‍वा कहां निकल जाती है, मैं मंज़ि‍ल से बाहर, बहुत दूर पीछे छूटा, अपने को फिर वही पुराने आसनसोली मनोहरपु‍री रेलवे यार्डों व चाय की करियायी चूल्‍हेवाली गुमटियों पर फिर-फिर क्‍यों पाता रहता हूं? जबकि जागकर देखने को जलसाघर है, तलघर की घरघराती ख़ामोशी में सोये-सोये पहुंचने को जापान है, चिल्‍लाने और बचाने को स्‍त्री और कामरेड का अपमान है, हकलाता और अपने को बनाता, गर्विला अज्ञानी विज्ञान भी है?

जीवन तुम कहां हो, मैं मंज़ि‍ल के साथ नहीं, तुम्‍हारी गलबंहियों में कहीं पहुंचने के लिए नहीं, बस साथ टहलने के लिए आया हूं, मगर तुम हो कहां, ऊपर हरिद्वार किंबा सोमालिया, सुडान के आसमान में, या चीले की अपनी बहली, भटकी हुई पौलिन गार्सिया की ग्‍लोरिया की भड़कीली, अकेली रातों के संगी बने हो, या मेरी उंगलियों के पोर पर चमकते, गायब बैठे हुए हो, कमज़ोर आंखों से सिर्फ़ मुझे दीख भर नहीं रहे?

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