मां कैंसर से मरी. सब एकदम
अचानक से हुआ. मैंने पैरों से स्कूल का जूता अभी निकाला भी नहीं था जब नीलू आंटी
भागी मेरी ओर आई और अपने में भींचकर मुझे कुछ भी देखने से छिपा लिया. जेना अंकल की
छोटी साली बरामदे वाले दरवाज़े के पास खड़ी रो रही थी. राजू और दिलीप भी वहीं थे
और अभी भी स्कूल के कपड़ों में ही थे. बीस किस्म के लोगों से घर ऐसा अंटा पड़ा
था कि मुझे किसी पराये घर में होने का अहसास हुआ. ऐसा नहीं कि बात मेरी समझ में
नहीं आई, लेकिन मैं डर नहीं रहा था.
अभी ज़्यादा समय कहां हुआ
जब मां ने छेड़ते हुए मुझसे मुस्कराकर पूछा था कि मैं अपने लिये घर में मुन्ना
भाई चाहता हूं या एक मुन्नी बहन, और मैंने तमककर नाराज़गी में मां को बताया था कि
यहां मैं स्पोर्ट्स वाले नये जूतों के लिये मरा जा रहा हूं, उसके पीछे परेशान
होने की जगह मां मेरे लिए भाई और बहन खोज रही है!
मां मुस्कराती रही थी. भरोसा
दिलाया था कि नये जूते भी आयेंगे. मगर कहां आये. मैं अभी भी वही गेरु रंगवाले
कपड़े के जूते से काम चला रहा हूं. लेकिन फिर, कोई भाई या बहन भी कहां आया. अब कोई
नहीं आयेगा. मुझे कुछ चाहिये भी नहीं.
सिर्फ़ पापा पर गुस्सा आ
रहा है. कि पापा के पास पैसे क्यों नहीं थे. पैसे होते तो मां मरती नहीं. दिलीप
की मम्मी ने भी कहा था पैसे से आजकल सबका इलाज है. मगर पापा से पैसा नहीं हुआ. कुछ
नहीं हुआ. पापा खाली साइकिल लेकर इधर-उधर भागते रहे. एक दिन मुझको भी कैंसर होगा
और पापा कुछ नहीं कर सकेंगे. मैं मर रहा होऊंगा और पापा साइकिल पर इधर-उधर भाग रहे
होंगे. सोचकर मेरा दिल बैठ गया लेकिन मैंने किसी को अपने मन की बात बतायी नहीं. न
रोया. एक बार भी.
जबकि नीलू आंटी और जायसवाल
सर मेरी चिंता में थे, लेकिन हाफ पैंट की जेब में हाथ डाले मैं ज़मीन पर बना रहा.
चिंतावाली हालत पापा की हुई. कहीं भी, किसी भी बात पर रोने लगते. जब कोई कुछ नहीं
कहता तब भी रोते. कूकर में दाल भिगोते हुए, रस्सी पर गमछा डालते हुए, अमरुद के
पेड़ के नीचे साइकिल खड़ी करते, कहीं भी उन्हें रोना चला आता. थोड़ी देर पर,
आंख-वांख पोंछकर, किसी काम में अपने को बझाने के बाद भी, ऊपरी तौर पर उनका रोना
बंद भले दिखता रहे, भीतर वह चुप नहीं हो पाते थे. रहते-रहते अचानक मुंह से अजीब
आवाज़ निकलती. या रसोई में हाथ का कलछुल छूट जाता. फिर वही रुलाई!
तीन साल पहले दुर्गा पूजा
में पसंद का पैंट न सिलवाये जाने पर भी मैं इतना नहीं रोया होऊंगा, जितना पापा इन
दिनों रो रहे थे. इससे पहले कोई मुझसे कहता तो मुझे विश्वास भी नहीं होता कि पापा
के भीतर इतनी रुलाई है. पापा अंदर वाले कमरे में मुड़े-तुड़े बिछौने पर निढाल रोते
रहते और मैं बरामदे की सीढ़ी पर गुमसुम बैठा सोच-सोचकर डरता कि इस तरह रो-रोकर
पापा कहीं पागल हो गये फिर?
इसके बारे में मौसमी दीदी
या नीलू आंटी में से ही जाने किसने कहा था कि ऐसे मौके पर आदमी रोता रहता है, रोता
रहता है जब तक कि दिमाग पूरी तरह सुन्न न हो जाये. दिमाग सुन्न न हो जाये तब तक
चैन नहीं मिलता!
और दिमाग सुन्न होने के
बाद मिल जाता है? इतना रोने के बाद पापा अब चैन से हो गये?..
औरतें भी क्या-क्या बोलती
रहती हैं! खास तौर पर नीलू आंटी. मैं ही बुद्धू हूं कि उनके आने और आकर बगल में बैठने पर
भागकर कहीं और चला नहीं जाता. मगर भागकर कहां जाऊं. भागकर जहां जाओ सब मुझे देखकर
या तो एकदम-से चुप हो जाते हैं, या फिर नीलू आंटी जैसी ही बेमलतब की बातें करने
लगते हैं. लेकिन सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे पापा पर आ रहा था. या तो एक बार अपनी
मर्जी भर का पूरा रोकर चैन पा लेते कि दूसरे लड़कों की तरह वापस मैं सामान्य
तरीके से शाम को मैदान में खेलने जा सकता, या फिर बाद में जाने कब होने की बजाय
अभी ही रो-रोकर पागल हो लेते कि मुझे भी पता चल जाता कि आगे मुझे स्कूल नहीं जाना
और मामा के पास जाकर रहना है!
मामा बहुत दूर इंफाल या ऐसी
ही किसी जगह में दुकान चलाकर रहते हैं जहां स्कूल नहीं है. हो भी तो दिलीप कहता
है मेरे काम की नहीं है. वहां रहनेवाले कोई दूसरी भाषा बोलते हैं और मामा भी उन्हीं
की भाषा बोलते हैं और मैं वहां गया तो मुझे भी वही बोलना होगा नहीं तो दिलीप कहता
है सब मुझे गूंगा समझेंगे और बिना कैंसर पाये और बिना पापा की तरह रोये पागल होने
में मुझे समय नहीं लगेगा!
मैं इतनी दूर मामा के पास
नहीं जाना चाहता. बरामदे की सीढ़ी पर गुमसुम बैठा मैं कहीं नहीं जाना चाहता. पापा
कभी चुप दिखें तो मैं उनके पास जाकर उन्हें बता देना चाहता हूं कि आप पागल मत
होओ, पापा, बहुत गड़बड़ हो जायेगी. मगर यह बात पापा भी जानते हैं कि गड़बड़ हो रही
है फिर भी उनका रोना नहीं थमता. वह शायद बिना पागल हुए मानने नहीं वाले. शायद इसी
तरह अपने पास पैसा नहीं होने का वह बदला चुकाना चाहते हैं.
नीलू आंटी कहती है कि मुझे
कहीं नहीं जाना होगा. मगर नीलू आंटी क्या जानती है? वह तो बीच-बीच में मुझसे फुसफुसाकर यह भी कहती
है कि मां कहीं नहीं गई, मैं आंखें मूंदकर सच्चे मन से मां को याद करुं तो मां
मेरे सामने होगी!
नीलू आंटी की सब बातें
फालतू की बातें हैं. मैं आंखें मूंद-मूंदकर मां को याद करते-करते थक गया हूं, मां
का एक बार भी पता नहीं चला. मौसमी दीदी कहती है मैं सच्चे मन से नहीं याद कर रहा
होऊंगा! लेकिन मौसमी दीदी मेरे मन के बारे में क्या जानती है? दुबारा कहा तो मैं उसे थप्पड़
मार दूंगा..
मुझे अब घबराहट हो रही है.
सच्चे मन वाली घबराहट! क्या अब मां सचमुच कभी मेरे सामने नहीं आयेगी? कभी नहीं? धीरे-धीरे एक दिन मैं मां
को भूल जाऊंगा? लोग पूछेंगे तुम्हारी मां कैसी थी और मुझे कुछ भी याद नहीं रहेगा? सोचकर मुझे लगा पापा से
पहले कहीं मैं ही नहीं पागल हो जाऊं!
मैं भागकर भीतर वाले कमरे
में गया. तकिये के ऊपर दोनों हाथ बांधे पापा बिछौने पर निढाल छत घूर रहे थे. लोहे
की काली पेटी के ऊपर पड़ी मां की पुरानी फ़ोटो के नज़दीक जाकर मैं मां को गौर से
देखता रहा कि उसे सच्चे मन से इतना देख लूं कि उसे फिर भूलना असम्भव हो जाये.
बीच में कभी पापा की नज़र
गई होगी, उन्होंने गुमसुम सवाल किया मैं क्या कर रहा हूं. मैंने बिना पापा की ओर
देखे जवाब दिया मां को देख रहा हूं. मैं अभी देख ही रहा था कि वापस ज़ोर-ज़ोर से
हिचकियां लेकर पापा का रोना शुरु हो गया!

पसंद आया.
ReplyDelete"...कि उसे सच्चे मन से इतना देख लूं कि उसे फिर भूलना असम्भव हो जाये."
ReplyDeleteमार्मिक कहानी...
interesting kahani hai ...
ReplyDeleteprasannata hui padhkar...dhanywaad
ReplyDeleteयह कहानी पढ़कर मेरे घर का एक दृश्य याद आ रहा है। मार्मिक है। क्या कहें। इसमें सारी बातें कही जा चुकी हैं।
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