Friday, February 28, 2014

चलो हटो फटो कविता













कवितायें खूब होंगी
बेसंभाल जन्‍मती
सब कतार में होंगी
कवि होंगे सतना, सीवान, सांवलपुर
में रेल पकड़कर दिल्‍ली की बस उतरते
मेट्रो में ताड़ते चेहरे कि यहां कौन पढ़ता है कविता
अरे पढ़ो भले लोगों अपना उद्धार करो
मुरझायी कविता का हे ईश्‍वर बाबू मालिक
सरकार कइसहूं हुजूर बेड़ा पार करो

कपड़ों की संभाल और फोन की खंगाल के सफरी
इस वीडियो से निकल उस वीडियो की टहल करते
मन उचट जाये तो फिर झूलती दीवार पर
दिल्‍ली प्रशासन का वही पिटा विज्ञापन पढ़ते
कविता में और वह भी मुई हिंदी में भला कब बहलते हैं
पढ़ना ही होगा नई नौकरियों की अर्जी पढ़ेंगे
तेजी से हाथ चलाते अर्जियों में फर्जी भाषा भरेंगे
एकदम से मुंह उठाये सामने हिंदी चली ही आये
तो फीकी मुस्‍कान की आड़ में लो चला आया डाउनमार्केट
के ख़्याल में उसी तत्‍परता से बहुधा डरेंगे भी

हिंदी - सिनेमा के काम आयेगी
और टीवी पर अदा सजानेवालों के
या ठेलों पर सब्‍जी घुमानेवालों और
रिक्‍शे में सवारियां पहुंचानेवालों के
कविता के मुंह में जाते ही वह जाने किस जनसाहित्‍य की
सेवा में लगी नवेली पतोह हो जायेगी
जिससे चिमटा नहीं उठेगा छनौटा नहीं चलेगा
सूप फटकने में हाथ पिरायेंगे गोईंठा बालने में बड़ा गंधाइन गमकेगा
लब्‍बोलुआब यह कि अढ़ाई पुरस्‍कार का इक ज़रा संसार पाकर
जनसाहित्‍य की चौहद्दी में घूमती कविता उसी में जन जन का मुर्दा मंत्र पढ़ेगी
मंच पर चढ़कर जन का होने में उसके हाथ पैर फूलेंगे कलेजा झूलेगा
जन जो होंगे समाज की ही तरह कविता के निर्धन होंगे
कोई आवारा होगा मजमा सजाकर मंच पर चीखेगा कविता कविता
कविता बेचारी फुदककर किसी लघु पत्रिका में छिप जायेगी
या अल्‍ला मियां की किरपा हुई तो चोंच चटकारती दिल्‍ली के
किसी प्रकाशक की हथेली पर पचहत्‍तर वॉट की टिल्‍ली रोशनी पायेगी
अंधेरी पगडंडियों पर बिजली नहीं बनेगी कहीं बल्‍ब नहीं जलायेगी
यहां से निकलकर ससुरी हिंदी कविता आगे कब कहां जायेगी.

Thursday, February 27, 2014

कितने नावों में कितनी बार : एक पुनर्परीक्षा, लघु

यहां पुन: स्‍मरण करना कवि के स्‍मरण की तौहीन, उसे स्‍तुतिहीन करना होगा कि किन प्राथमिक परिस्थितियों में, कितनी सारी ज्‍योतियों की कैसी डगमग सवारियों के आतुर प्रेमालोड़नों का कवि चित्र खींच रहा है (बावजूद इस भव्‍य तथ्‍य के सामने आ-आकर लगातार मुंह मारते रहने के, कि चित्र खींचना, व असभ्‍य जनसंकुल में खोयी जातीं सभ्‍य स्त्रियां, व भारतीय सभ्‍यता के ज्‍योतिपुंजों की निर्मिति कवि का मुख्‍य शगल रहा है, खास तौर पर जब वह बर्कले और कसौनी के हरितवनों में ‘ओ नि:संग ममेतर’‘तुम्‍हें नहीं तो किसे और’ के मार्मिक अकुलाहटों के संधान में नंगे पांव चुपचाप टहलता रहा हो). ख़ैर, हम कितनी नावों में कितनी बार के अपने मुख्‍य विमर्श पर ही लौटें. जिसमें विविधरूपा ज्‍योति के अन्‍वेषण में डगमग कविमना की महीन विवेचना तो है ही, एकनिष्‍ठ एकाग्र पुरोहितप्रधान अन्‍य धर्म-पंथों की महीन लताड़ व अनुपमेय भव्‍य भारतीयता का प्रच्‍छन्‍न गौरवगान भी है!

कवि यहां मात्र ज्‍योति की ही नहीं, विराटा, प्रवीणा, बुद्ध-वीणा, कृष्‍णवंसी (और पावस दिन महाशिवरात्रि की पवित्र दुपहर-सांध्‍य बेला हो, तो) महादेव की धुनि व धुएं की वंदना भी गाये ले रहा है!

संताप, व आत्‍मा की अकुलाई ताप का कैसा विराट, उदात्‍त चित्र कवि खेंचता है जब हथेलियों से छूटकर उसकी प्रेमातुर पंक्तियां विलग हुई कांपती, बुदबुदाती, आत्‍मीय आक्रोश जताती पाठक को (साथ ही ज्‍योति, व ज्‍योतियों को भी) सूचित करती हैं : “और कितनी बार कितने जगमग जहाज़ / मुझे खींच कर ले गये हैं कितनी दूर / किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में / जहां नंगे अंधेरों को / और भी उघाड़ता रहता है / एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश - / जिसमें कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते / केचन चौंधियाते हैं तथ्‍य, तथ्‍य– तथ्‍य-- / सत्‍य नहीं, अंतहीन सच्‍चाइयां... / कितनी बार मुझे / खिन्‍न, विकल, संत्रस्‍त-- / कितनी बार!”

बर्कले व हावर्ड के हरित कदंब, कचनारों के नीचे टहलते, मचलते हुए, ओह, आतताती पश्चिमी सभ्‍यता के प्रति भारतीय व्रती मन का यह कैसा प्रचंड भारतीय सीत्‍कार, व विविध बहुआयामी बेमतलब परायेपनों का नकार, व भारतीयता के ज्‍योतिपुंजों का स्‍वीकारपत्र व अंगीकार-ज्ञापन है. और कितनी रातों में और कितने दिवसहस्राब्दियों में कितनी-कितनी नावों में चढ़कर, कहां-कहां के पासपोर्टों से, ‘हरी घास पर क्षण भर’ से होता हुआ कवि ‘एक बूंद सहसा उछली’ उछालता, पुन: पुन: अपनी ज्‍योतिपुंजल वत्‍सल्‍ताओं पर लौटा आता है, हमारी महान भारतीयता पर अपने काव्‍य का अर्घ्‍य चढ़ाता है. यह विरल देशज काव्‍य-चेतना जनसाहित्‍य के पटे पन्‍नों में ही नहीं, निरुद्देश्‍य साहित्‍य के निश्‍छल निरुत्‍पादित पृष्‍ठों में भी दुलर्भ है.

हरिओम कुंवर और सुमेधा तिवारी की रचनाशीलताओं में खोये हुए ‘कितनी नावों में कितनी बार’ के मेधा-पाठ से आप छूटे रह गये हों, तो कृपया अभी लौटकर इस दुर्लभ निधि में स्‍वयं को भूल जाने का मौका दें, जैसे मैं तो रहता ही हूं लौटता, भूल और भुलाये रखने की त्‍वराभूमियों के तरल तरंगों में आंदोलित होता, जितनी पता नहीं कितनी नावों में कितनी-कितनी तो बार..?

कुत्‍ता : एक निर्बन्‍ध

(street dog by mahesh verma)
कुत्‍ता एक लोकप्रिय जानवर है. जहां-जहां मनुष्‍य रूपी जानवर ने लोक में अपनी स्‍थापना के लिए प्रिय का वरण किया है, प्रोटेक्‍शन की मर्यादा का उल्‍लंघन करते हुए, कातर कामनाओं के भटकाव में बेलगाम शिुशुओं को जना है, वहां पीछे-पीछे बेसंभाल कुत्‍ते भी चले आये हैं, और स्‍वभावत: सभी प्रोटेक्‍शनों को धता बताते हुए उन्‍होंने अपनी प्रजाति को विशेष घना किया है. ऐसे ही नहीं है कि हमारे समय के लोकप्रिय राजनीतिज्ञ मां.की.गोदी मनुष्‍य, और प्रजाति विशेष की चिंता में घायल, उन्‍मत्‍त जब चीखकर मंच से बोलने लगते हैं, फर्क़ करना मुश्किल हो जाता है कि प्रीतिकर संभाषण की मां को याद कर रहे हैं, या उदात्‍त कुत्‍ते की छवि को जीवंत करने में मार्मिक भौंक से योगदान कर रहे हैं.[1] भौंकते राजश्री जनज्‍वारानी भी हैं, लेकिन वह राजनीति नहीं साहित्‍य में हैं.[2]

जनसाहित्‍य की प्राथमिक शर्त है कि कवि (किंबा लेखक) भौंकता हुआ लिखे भले नहीं, मगर दिखे जब भी, भौंकता हुआ ही दीखे. जैसे कुत्‍ता होने की प्राथमिक शर्त है कि जानवर भौंकने व अपनी दुम हिलाने की काबिलियत में स्‍वयं की पहचान हासिल करे. दीगर बात है कि इस बिगड़े हालातों वाले वक़्त में यह सिर्फ़ राजनीति और साहित्‍य की क्रांतिकारी धारा ही नहीं है जिसने कुत्‍ते की भौंक का एकाधिकार उससे अगवा कर लिया है, ढेरों गुणरत्‍न प्रतिभाधनी हैं जो दुम हिलाने की विविधरंगी शैलियों में निष्‍णात कुत्‍ते को मीलों पीछे छोड़कर यहां वहां जाने कहां-कहां 'दुम हिलाऊ शिरोमणि सम्‍मान' प्राप्‍त कर रहे हैं. जबकि कुत्‍ता कुछ नहीं कर पा रहा. ज्‍यादा से ज्‍यादा घबराकर फिर दुम हिला रहा है.

फिर भी जाने कैसा विलक्षण संयोग है कि मनुष्‍यरूपी जानवर के मनुष्‍यरूपी बच्‍चे जानवररूपी राजनीतिज्ञों व जनसाहित्‍यकारों की उपस्थिति में आमतौर पर शांत रहते, दिखते हुए भी, रह-रहकर भड़कने, खड़कने भले लगते हों, असल भय का एकाधिकार अभी भी उन्‍होंने जानवररूपी जानवर कुत्‍ते को ही दे रखा है.

गली में चुपचाप खड़ा एकटक तुम्‍हें (बच्‍चे को) चुपचाप घूरते रहने के बाद जानवर (कुत्‍ता) बायें पंजे को चुपचाप आगे करके अभी चुपचाप मुंह खोलता भी नहीं कि तुम (बच्‍चा) जानवर (कुत्‍ते) से भी कहीं ज्‍यादा मर्मांतक कर्णछेदी स्‍वरों में भां-भां (भौं-भौं नहीं) की चीत्‍कार ठेलने लगते हो! और यह विशेष कौतुक व केलि का प्रसंग ही समझा जाना चाहिये कि सिर्फ़ बच्‍चे ही नहीं हैं, अपने को बड़ा समझने वाले ढेरों छोटे मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य भी हुए, हैं, होते रहेंगे जो कुत्‍ते का मुंह खुलने के पहले ही भय में गुर्राने, अपनी नानी की याद और अपनी अजन्‍मी सारी मौसियों को बुलाने लगते हैं.[3]

इन ललित पंक्तियों के लेखक के साथ इसीलिए अक्‍सर ऐसा घटित हुआ है कि वह गली में जाते-जाते आखिरी क्षण में पलटकर हाईवे की ओर स्‍थानंतरित हो गया है. हाईवे न केवल कुत्‍तामुक्‍त प्रांतर है, ज्‍यादा सिनेमैटिक भी है, जहां अंधेरों में भले मोटर-गाड़ि‍यों के नीचे आकर चिपटा हो जाने के लुभावने आकर्षण बहुतों को अपने मोहपाश में न बांध पाते हों, कुत्‍तों की भौंक और दूर तक भागने की मजबुरियों से तो मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य अछूता रह ही सकता है? फिर गली में प्रेम व नफ़रत जैसे गहन मानवीय भावों की अनुभूति के लिए गरदन से लटकने व गाल चूमने के लिए मुहैय्या सिर्फ़ कुत्‍ते ही हो सकते, होते हैं, जबकि हाईवे पर इस सबका फ़ायदा आलिया भट्ट की चमकदार त्‍वचा की संगत में उठाया जा सकता है, उसे अपने पीछे दौड़ाते हुए ए.आर.रहमान के संगीत में गवाया भी जा सकता है. उसके आगे भी गुत्‍थी लूज़ एंड पर छोड़ी जा ही सकती है कि आलिया के इशारों व निज अनुभूतियों के मार्मिक आलिंगन में आदमी मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य ही बना रहे, या लपककर, झपटकर कुत्‍तारूपी मनुष्‍यत्‍व की अल्‍लंघ्‍य ऊंचाइयों को जाकर छूने लगे!

अंत में, कुत्‍ते वाले ढेरों गुण (भौंकने व दुम हिलाने की उदात्‍तता से इतर) इन पंक्तियों के लेखक में भी हैं, मगर जाने क्‍या वज़ह है कि लोक का प्रिय तो क्‍या, वह अभी कुत्‍तों के मध्‍य भी प्रियावस्‍था प्राप्‍त करने में असफल रहा है. आपके पास इसका कोई जवाब हो तो कृपया अगली भौंक से मुझे इसकी खबर करें.

[1]. यू-ट्यूब पर देखें, और हालिया अखबारों के फाईलों में पढ़ लें, श्रीयुत मां.की.गोदी के बमौरी, अविरामपुर, बागपत व लाजपत नगर में दिये विविध भौंकाऊ भाषण.
[2]. देखें, राजश्री जनज्‍वारानी का अभी हाल के गये मेले में लोकार्पित काव्‍य-मधुर संचयन, ‘छिन्‍न-छिन्‍न इस समय में भिन्‍न मैं’, व राज्‍यसभा टीवी के लिए दिया गया उनका अभी तक अनरिलीज्‍ड इंटरव्यू.
[3]. देखें, ध.भारती का अंतिम प्रबंध, 'धर्मयुग व अंधायुग का कुहरीला, दर्दीला स्‍मरण', बेनेट कोलमैन एकाग्र प्रकाशन, 1988. 

Sunday, February 23, 2014

कितना अच्‍छा होता..













कितना अच्‍छा होता, ओह, कितना अच्‍छा
कि जीभ पर कभी पिये बेल की शरबत का स्वाद और
तलुओं में नदी की अभी ताज़ा जलती रेत का ताप होता
नंग-धड़ंग ढहे चिनचिनाते देह में कोई अनसुना संगीत लरजता
पड़ोस में चुप चली नदी पल भर को ठिठककर फुसफुसाती, धत्‍त्
कितना अच्‍छा होता

जामुन के बड़हन पेड़ से छूटकर गिरा-गिरा, ले अब्‍ब गिरा
और फिर नहीं गिरा मैं वही होता और वही नहीं होता
सब सो चुकते तब अस्‍पताल की सबसे ऊंची खिड़की
पर रो रहा बच्‍चा अभी का बुढ़ा रहा मैं ही होता
टपकती स्‍कूल के छत के नीचे दोने में खत्‍म होती जलेबी, घर्रायी सांसों में
फिर कब आयेगी जीभ पर दुबारा की टिक-टिक-टिक गिनता
कितना अच्‍छा होता

चुमकी छूट जाती, फिर हंसीनहायी, लजायी पास आती
भर्राये दीवानेपन में मैं भागा समूचे घर खुद को खोजता, कहीं नहीं पाता
पीली मुरझायी रौशनियों में पट-पट फूटते फतिंगों-सा खुशियां जोर मारती
वक़्त लगता अनन्‍त तक कोई अचीन्‍हीं खिंची लकीर है जिसके उस छोर
मोहम्‍मद रफ़ी बैठे दुलार में गाते, दिल पुकारे, आ रे आ रे
देखकर दूर से हाय करता कि सब कितना अवास्तविक है, खुद हमारा अपना बचपन भी
अदृश्‍य नीले रंगों में घुला स्‍वयं एक और अपरिभाषित रंग हुआ जाता
कितना अच्‍छा होता, ओह, कितना अच्‍छा.

तुम्‍हारा, तुम्‍हारा, तुम्‍हारा ही नाम..

कितनी भाषाओं की कितनी वंचनाओं में कोई प्रेम, या पुस्‍तकीय फेम, या न पाई प्रसिद्धि‍ का, स्‍मरण कर सकता है? जबकि विश्‍वपुस्‍तकमेले की बहार एकदम अपने अंत की कगार पर हो, लेखकीय मलिन मन में हाहाकार हो और उसे ज़ाहिर करने को कोई जगह न हो, तो ऐसे तुर्श छटपटाये मन के तीर उड़कर कहां जायेंगे? जनसत्‍ता जिसे नहीं छापेगा, नभाटा जिसे छापने के ख़याल तक में कांपेगा, हिंदुस्‍तान हंसकर बगलियेयागा, लेखकीय मनोलोक के ये मार्मिक इंप्रेशंस यानी फिर कहीं जगह नहीं पायेंगे?..

मेले के आखिरी दिन के चंद ‘भटकेले’ रैंडम इंप्रेशंस, उन्‍हीं की डायरियों से..

मार्मिक फाजिल (अपनी पत्‍नी के लिए, अभी भी, मुन्‍नू) : गया था मेले. या शायद नहीं भी गया था. क्‍योंकि अखबार या टीवी में तो मैं मेले पर अपनी राय देता कहीं दिखा नहीं. न ही तीन सुंदर (अधेड़) बालाओं ने FB पर किन्‍हीं अतिसुंदर चित्रों में मेरे मेला-विचरण को टैग करके विश्‍व को दिखाने का कोई ऐसा कोई मनोहारी फोटोजनिक रमणीक उपक्रम किया है, या चिन्‍नी (मेरी जीवनसंगिनी) ने मेरा जीवन हराम करना शुरु किया है कि ये तीन कलमुंहियां (सुंदर, अधेड़) कौन हैं, और मेरा (चिन्‍नी का) जीवन ऐसे अन्‍यतम प्रेमपूर्ण, भटकावजन्‍य यातनाओं से कब मुक्‍त होगा? सारी? हलो?

शारदा सुरभि (सुरुचिपूर्ण प्रेम कविताओं वाली) : अभी भी यहीं हूं, हां, हाल नं 18, हालांकि ‘वो’ (हरीश) कह रहे हैं बच्‍चों को कुछ अंग्रेजी-शंग्रेजी दिखायें, या पूरा दिन तुम इन हिंदी के बेवकूफों के बीच ही खराब करनेवाली हो? सचमुच कभी इन (हरीश) पर ऐसा गुस्‍सा आता है न, अबे, अरे, ठीक है, सारी, आपको जाना है आप जाओ न, अंग्रेजी असमी अरुणाचल-खरुणाचल, जहां जाकर मरना है, मरो, सारी, फिर से, मगर मैं यहां प्रेम व कविताओं में बंधी हुई हूं, रहूंगी हमेशा, आपको नहीं दिखता?

मुन्‍नू (वास्‍तविक, मेरठ वाले. मनोहर कहानियां और सरस सलिल की ऐजेंसी इन्‍हीं के परिवार में है) : फिर मेरा मोबाइल गया! मेले में यह तीसरा मोबाइल है जिसे लुटा रहा हूं! ऐसे-ऐसे तो चोर भरे पड़े हैं यहां, इनने कुत्‍तों ने जैसे कभी अच्‍छा (माइक्रोमैक्‍स का) स्‍मार्टफोन नहीं देखा हो जैसे.. इससे तो अच्‍छा मैं यहां आने की जगह महेश ताऊ को बोलकर ‘झंकार’ में ‘हसी तो फसी’ देखने निकल गया होता?

नलिनी (सुकेश के लिए क‍मलिनी) : सुकेश डियर, तुम आये हो? फिर कहां हो जो मैं तुम्‍हें ढूंढ़ नहीं पा रही? मैं कहां होऊंगी, हां हां, हाल नं 18 में ही हूं, तुम्‍हारे हृदय में तो हूं ही!

राजनाथ सरुप (गंभीर प्रकाशक के अजस्र प्रतिरुप) : ‘सहस्र स्‍मरणों में लौटना’, ‘सप्‍तपदी थी अभी यहीं’, ‘धूप के मिठाये दिन’, ‘लगभग अनियंत्रित’ सब शीर्षक हैं काव्‍य-पुस्‍तकों के जो इस वर्ष मेरे प्रकाशन ने छापा है. मगर क्‍यों छापा है? इनको मैं कहीं, कहां निकाल पाऊंगा? तीन सौ कापियां भी? जब नहीं निकाल पाऊंगा तो किस घबराहट में प्रैस से ढो-ढोकर इन्‍हें मेले तक लिये आता हूं? तन्‍ना जी सही ही कहते थे कि मुझे प्रकाशन नहीं रोडवेज़ वाली लाईन में होना चाहिये था! पचपन की उम्र हो रही है, क्‍या करुं, अब भी निकल जाऊं, हो जाऊं शिफ्ट? विल रोडवेज़ बी लकी फोर मी? 'पलकों के पीछे से, जनज्‍वार के भीते से' राजकुमार प्रीत का यह संग्रह भी मैंने ही छापा है? और फिर भी रोडवेज़ से मुंह चुरा रहा हूं, किस हिम्‍मत से चुरा रहा हूं?

श्रीराम तिवारी : टीके जी कह रहे हैं मेले में मेरी पुस्‍तक की सिर्फ़ सात प्रतियां बिकी हैं? और उसमें भी जब नीलू भैया ने पांच प्रतियां अपने कालेज की लाइब्ररी के नाम पर खरीदी है? यह कैसे संभव है, जबकि मैं ‘गवाक्ष’ और ‘ज्ञानोदय’ (नयी वाली) का लेखक हूं? क्‍या मित्र सिर्फ़ उन्‍हीं के काम आते हैं जो 'प्रतिपक्ष' और 'विध्‍वंस' से जुड़े हों, या रामनयन जी के 'राजहंस' से? रामनयन जी, आप जहां कहीं भी हों (मतलब जिस किसी हाल और हॉल में हों, 18 में तो अभी तक आप कहीं दिखे नहीं, आपके चरणस्‍पर्श करता हूं! डायबटीज ने कहीं फिर से तंग करना तो नहीं शुरु किया? आप डाक्‍टर यादव से एक बार जाकर मिलते क्‍यों नहीं, 'गवाक्ष' के तोमर जी को वही वापस चेतनावस्‍था में लौटाले आये, जीनियस इलाजकर्ता है, सर? एक बार मिल तो लें, हां?)

मुन्‍नू (वास्‍तविक, मेरठ वाले) : मेरा मोबाइल मिल गया है! महेश ताऊ ने ही दबा रखा था! खतम हो जाये मेला तो 'हसी तो फसी' और 'हाईवे' दोनों एक ही दिन निपटाता हूं? हां, ताऊ, यहीं हूं! कितने का आर्डर है?

Saturday, February 22, 2014

रात में मॉडम

टिमटिमाती झिल-मिल हवाओं में तैरी आतीं
रौशनियां लाल नीली हरी पीली
एयरपोर्ट के बाहर के अंधेरों में
तीखी गर्जना में एकदम-से चमककर तेज़ होतीं
दीखता रौशन आसमान कुछ देर दूर तक
फिर लाल नीले सियाह में घुमा गुमा जाता
कहीं और किधर और किसी टैक्‍सी की पीठ पर सवार
सड़कों पर भागी भागी भागी जाती
सोये दुकानों का सिर नहलातीं, पीछे पीछे
पीछे छूटी जातीं, जैसे साथ की रात थी
कोई राज़ की बात, वक़्त हुआ और अब सब पीछे गया
दूर तक पसरे अंधेरों के बाद फिर एक लाल उतरा आता
चुप्‍प चुप्‍प चुप्‍प
तसल्‍ली से सबके चुप बने रहने का मसौदा सजाता
एक धड़धड़ाता ट्रक गुजरता, शहर की नींद की धज्जियां उड़ाता

बहुत दूर, इस सबसे बहुत दूर
किसी घर के सूने पंखे की संगत में अलसाया मॉडम रह-रहकर
रौशनी के फांक बुनता बनाता, न सुनता हो कोई
दुनिया के सुर में चुप्‍पे रात की बेआवाज़ लोरी गाता.

Friday, February 21, 2014

यहां से वहां, कहां-कहां.. (विपुमे में विमर्श जी)..

विमर्श जी की डायरी.. 

मेले में (चमड़े का, नया वाला) अपने कागज़-पत्‍तर दुरुस्‍त करता पहुंच गया हूं (हॉल नं 18), ग्‍यारह बजे तीन अंडों का आमलेट और दो चाय के बाद मन अब कुछ स्थिर लग रहा है, वर्ना गई संध्‍या वाचनजी की कृपा से जो मद्य उदर में अवस्थित हुआ था, वह पूरी रात भयानक उत्‍पात मचाये रहा! कसूर मेरा ही है. हर बार तय करता हूं कि अबकी मेले में मद्य और महिला-माधुर्य से दूरी बनाकर रखूंगा और हर बार होता है कि मेरा पराक्रमी उपक्रम टूट-टूट कर बिखर-बिखर सा जाता है! कसूर नवनीता (पचौरी) और सीता (सान्‍याल) का भी है. न ये दोनों दुष्‍टायें गरिष्‍ठ दैहिक भंगिमाओं में वाचनजी के पृष्‍ठ में डोलती, तैरती मुझमें अतृप्ति का मार्मिक बोध करातीं, न मैं मद्य-अधरों के अंधेरों में गिरता!

मगर अब उठ गया हूं. लगभग. कुछ देर पहले तक माथे में डोलती छायायें थीं, अब नहीं हैं. विविध विमर्श दृष्टि के मध्‍यप्रांत तैरते दिख रहे हैं, और हाथ बढ़ाकर किसी को भी स्‍पर्श कर सकता हूं. कुछ वर्षों पहले तक कैसी त्रासदायी अवसादी हवा थी, यही पथ थे यही हॉल नं 18 की दुनिया थी, उदासियों में नहायी फरवरी की धूप थी, इतने विमर्श नहीं थे, किसी को मेरी ज़रुरत नहीं थी, आह, कैसे दुर्दिन थे, मगर अब चीज़ें धीरे-धीरे सरक रही हैं, दुनिया बदल रही है, विमर्शों के पीछे-पीछे मैं भी कहीं पहुंच रहा हूं. थी, कभी रही होगी, अब हॉल नं 18 अवसादी अंधेरों में नहायी दुनिया नहीं है. जब तक मैं इस और उस मंच पर आगे बढ़कर कुछ बोलता दीख रहा हूं, तब तक तो कतई नहीं है.

सुखहर्षिल दिनों में कचोट बस सिर्फ़ इसी बात का है कि पिछले आठ महीनों से अल्‍सर-पीडि़त हूं (प्रोस्‍ट्रेट तो पिछले दो वर्षों से पीछे लगा ही हुआ है). यही वज़ह होगी शिमला की नवोदिता कवियत्री मंजु गैरियाल ने इतने अनूठे, मीठे शब्‍दों में कहा है, ‘ईश्‍वर तुम्‍हारे सुख भी मुझतक आकर होते हैं मलिन,’ लगता है मेरे मन की बात छीन ली हो, या मुझे मेरे चंचल शब्‍दों से विच्छिन्‍न कर दिया हो, ओह, मंजु, आप कैसे इतना अच्‍छा लिख लेती हो? (आज संध्‍या इन विमर्शों का टंटा निपट जाये तो मैं रात ग्‍यारह के बाद फोन पर मंजु, तुम शिमलावाली को समझता हूं?)

आज बड़ी दिक्‍कत मगर यह होनेवाली है कि मुझे मधुलिकाश्री की नारीवादी काव्‍यमयी नव्‍यशीर्षों वाली उनकी नयी कविताओं पर बोलना है, और मुझे भय है कि मैं पुन: किंचित अस्‍थि‍र होने जा रहा हूं! पहली बात तो यही कि मधुलिकाश्री के चेहरे, या अदरवाइस भी, उनमें ऐसा कुछ है नहीं कि किन्‍हीं भी ऊंचाइयों पर एक विस्‍मय के बाद, कुछ और देर तक बोला जा सके. दूसरे, कविताओं पर बोलने से ज्‍यादा आसान, खुद कवितायें रच लेना है. ख़ास तौर पर जब वह हिन्‍दी की कवितायें हों. और शायद मैं यही करूं भी. बिना मधुलिकाश्री की ओर देखे (समक्ष सीता सान्‍याल हों तो फिर क्‍या कहने), धीमे-धीमे आप्‍त काव्‍य-पंक्तियां अनुश्रूत, उद्भूत करता जाऊं? (अब कृपया मुझसे ‘अनुश्रूत’ व ‘उद्भूत’ का अर्थ न पूछें. मुझे क्‍या मेरे साहित्यिक पिताश्री तक को न ज्ञात होगा. और आज वैसे भी मातृभाषा दिवस है, और विमर्शों में लुप्‍त मैं अब भले न जान पाता होऊं कि मराठी, सिंधी, बंबई की हिंदी, गाजियाबादी बरबादी, सहारनपुरिया, त्रिपुरारी बंगाली क्‍या है मेरी मातृभाषा, मगर वह अनुश्रूत व उद्भूत वाली हिन्‍दी तो नहीं ही है!)..

मधुलिकाश्री की काव्‍य-ऊंचाइयों वाले नारी-विमर्श से निपट लूं तो फिर शमशेर (या शेर सिंह?) के महीन प्रगतिशील संस्‍पर्श को छूता पहुंचूंगा. फिर घिल्डियाल जी की नव्‍य दलित आख्‍यान पर भी अपनी मार्मिक मीमांसा टांकने पहुंचना ही है. नहीं पहुंचता तो दलित मित्र बुरा मान जायेंगे, मैं तो मानूंगा ही. अब इन विविध विमर्शों में एक साथ उड़ते हुए एक दिक्‍कत यह इतनी ज़रूर होती रहती है कि एक उधड़े विमर्श की पंक्तियां आप दूसरे विमर्श में सीते दिखते हैं. जैसे परसों वाचाल जी वाले विमोचन में एक लड़की ने बीच वाक्‍य मुझे सहसा टोककर स्‍तब्‍ध कर ही दिया था, पलटकर सन्‍नभाव मैंने भी उसे मुंहतोड़ जवाब दिया, मगर यह भी सत्‍य है कि मैं स्‍तब्‍ध बना भी रहा. लड़की की चितवन ही ऐसी थी. मुग्‍धभाव अभी तक हूं. मन में एक काव्‍य-पंक्ति आकर डोल गई है, आप भी सुनिये :

अभी-अभी तुम आई हो, और अभी-अभी हुआ हूं मैं..

अहा, कैसी मोहक पंक्तियां हैं, पता नहीं किसकी हैं. मेरी नहीं हैं.

विपुमे से बाहर एक लेखिका (सफल) कहां है?

म श्री की डायरी..

अब तक बारह मर्तबा विपुमे (हॉल नं 18) हो आई हूं, फिर भी मन है कि रीता-रीता सा बना रहता है! मानो अपनी कोई अन्‍यतम सखी, प्रेम, अंतरंग अनुभूति का दुलार अपने पीछे मेले में छोड़े आई हूं, और दुबारा चटपट भागकर वापस उसे अपने गहरे अंकवार में भर लेना है! विपिन भी कहते हैं हुआ मेला-सेला, तुम्‍हारी तीन किताबों का लोकार्पण हुआ, अच्‍छे से ही हुआ, मगर अब जाकर वहीं थोड़ी रहने लगोगी? कौन-सी जो तुमने कोई वहां दुकान लगा रखी है? मैं मुस्‍कराकर विपिन की आंखों में झांककर फिर दु:खकातर अपनी नज़रें गिरा लेती हैं, हृदयसंगी के आगे हमेशा अनावृत्‍त रही, फिर भी एक स्‍त्री का, और खासतौर पर मेरी तरह लगातार हर जगह, हर कहीं छप रही एक सफल स्‍त्री का अकेलापन, उसकी असहायता कभी समझ सकेंगे विपिन? इस वृहत् ब्रह्माण्‍ड में अफ्रीका से अमरीका (इस वर्ष जून में फिर अफ्रीका जा रही हूं, रियो द जनेरो अफ्रीका में ही है न? Wow!) तक पूरी दुनिया में कोई पुरुष समझ सकेगा? Though I love Vipin and all and he is the gentlest of male pigs I have known in all my life (but what about Arun ji? Can I ever forget him? Ever?) बट एक लेखिका का अकेलापन, खुद उसके अपने घर के स्‍नेह-संसार में भी, इज़ ए थिंग विपिन विल नेवर अंडरस्‍टैंड, एंड दैट आई कैन शेयर ओनली विद् माई अदर रेस्‍पेक्‍टेड फिमेल राइटर्स! मधुलिका जी आप सुन रही हैं? और श्‍वेतालिकाश्री?

विपिन से क्‍या कहूं कि विपुमे (हॉल नं 18) में अट्ठारह मर्तबा जा-जाकर फिर रीते मन घर लौटती हूं तो वहां पीछे क्‍या छूटा रहता है मेरा? मेरा समूचा स्‍वत्‍व वहीं छूटा रहता है, विपिन, माई लाईफ़ इज़ एल्‍सवेयर (म ब्रोदोस्‍की ने कहीं कितने अच्‍छे से यह बात कही है, या श्‍लोतोस्‍की ने? एनीवेज़, मालूम नहीं मैं रूस या पौलेण्‍ड कब जाऊंगी, हालांकि चाण्‍क्‍यपुरी में बालसीकर सर मिले थे तो उनके सोफे की बांहों पर धंसी, अपने गहरे केश उनके चश्‍मे पर गिराते अपने मन की कचोट का मैंने इतने अच्‍छे से जिक्र किया तो था? (I just hope बालसीकर सर संस्‍कृति मंत्रालय में ही हैं, मगर वह लुच्‍ची मधुलिका जिस तरह मुझसे जलती है कोई भरोसा नहीं कि उसने मुझे पार्टी में भेजा ही गलत आदमी के पास हो? यह सारी जो बुढ़ा रही महिला लेखिकायें हैं, मुझसे ईश्‍वर जाने इतना जलती क्‍यों हैं, क्‍या कर सकती हूं अगर मैं इतना अच्‍छा लिखती हूं? ओह, विपुमे के अंधेरे पृष्‍ठों में जाने अभी क्‍या-क्‍या कुछ चल रहा होगा, और मैं यहां होपलेस पारिवारिक कोडैक मोमेंट्स जी रही हूं, ऐसा क्‍यों कर रही हूं?). सोफे पर धंसी मुझ अबला की देह पर मेरी दोनों लल्लियां आकर चढ़ जाती हैं (वैसे कहां की लल्लियां, एक अट्ठारह की हुई, दूसरी इक्‍कीस की), मेरी देह चरमराती है, मगर आत्‍मा स्‍नेह की पुलक में भर-भर जाता है, आंखों से स्‍नेह की अश्रुधारा बहने लगती है! विपिन भावुक होकर जल्‍दी से मोबाइल निकालकर हम तीनों के तीन स्‍नैप लेते हैं, जिसे अभी कपड़ा बदलकर मुझे FB पर अपलोड करना होगा, I hope it gets me at least 400 likes!

संकल्‍प प्रकाशन के नवीन जी कहते रहते हैं कि क्‍या फैन फोलोइंग है आपकी म श्री, इतनी चिट्ठि‍यां तो हजारी जी के लिखे को भी नहीं प्राप्‍त होती थी? मैं नवीन बुड्ढे को किंचित लजाकर, देह की अकुलाहट में सजाकर, इंफोर्म करती हूं कौन हजारी जी, और हजारी जी के पास वो आंखें थीं जिनसे मैं आपको अपलक तकती रहती हूं, हमेशा आपके बारे में सोच-सोचकर अस्थिर होती रहती हूं? और नवीन जी, आप म श्री की जगह मुझे मिश्री नहीं बुला सकते (ओह, अरुण जी, आप कहां हो?)?

अभी आंखें मुंदी नहीं कि प्रत्‍युष जी का फोन आ रहा है (प्रत्‍युष जी ने छापा है मेरा कोई टाईटल? छापा ही होगा, या कौन जाने एडवांस में बधाई देने के लिए फोन कर रहे हों? किसी नये पुरस्‍कार के लिए मेरे नाम का अनुमोदन हुआ हो? ज्‍योतिर्मय सर ने कोई टांका भिड़ाया हो! ओह, ज्‍योतिर्मय सर, यू आर ए ट्रू अनकरेजिबल बास्‍टर्ड! वेन आर वी मिटिंग नेक्‍स्‍ट?). मगर मैं विपुमे (हॉल नं 18) कल क्‍या पहनकर जानेवाली हूं? ओह, एक अकेली स्‍त्री (लेखिका, सफल) को कितना-कितना कुछ सोचना होता है! सीखो, लड़कियो, मुझसे सीखो, सीखो!

Thursday, February 20, 2014

हिन्‍दी रुदन..

कोई ज़िम्‍मेदार और संवेदनशील समाज होता तो हिन्‍दी का प्रकाशन संसार शर्मिंदगी में यह तथ्‍य आज नहीं, वर्षों पहले सार्वजनिक कर चुका होता कि हिन्‍दी में बहुत लोकप्रिय समझी जानेवाली किताबें, 'मैला आंचल', 'आधा गांव', 'गुनाहों का देवता', 'राग दरबारी' की लोकप्रियता, व उनकी बिक्री का तथ्‍यात्‍मक ठीक-ठीक व्‍यौरा क्‍या है. मगर गुटफ़रेबियों और घपलों की पीठ पर रोटी तोड़ता हिन्‍दी का प्रकाशन-संसार सार्वजनिक नैतिकताओं के ऐसे आग्रहों और मोह में नहीं अटकता, 'धंधा चालू आहे' की पीठ पर अपना रजिस्‍टर छुपाये अपनी दुकान चलाता है. दुकान चलाने से ज्‍यादा के संभवत: उसके अरमान व महत्‍वाकांक्षा भी नहीं.

जैसे खुद हिन्‍दी लेखक तक के नहीं. वह एक पिटे इंटर कॉलेज के स्‍टाफ रुम साईज़ के साहित्यिक समाज में ज़रा-सा नाम और यश में मुदित बना रहता है, हिन्‍दी से बाहर के बड़े संसार में आंखे खोलकर देखने और सबक लेने का उसे सुझाव दीजिये, वह विशुद्ध बकलोली बकने लगता है, या ज्‍यादा हुआ तो आपको गालियां बकने लगेगा..

हिन्‍दी के लेखक को आप सुखी देखना चाहते हों तो उसे एक मंच दे दें और हाथ में माइक. इतने मात्र में बेचारे का चेहरा चमकने लगता है. सुख के नशे में उसे दीवाना करना हो तो लगे हाथ तिलकुट ज्ञानेश्‍वरी के डेढ़ और श्रद्धेश्‍वरी के ढाई घेलाटाइप सम्‍मान भी उसकी झोली में गिरा दें, पैरों के बीच पूंछ दबाये वह आजीवन आपका आभारी बना फिरेगा. डेढ़ अखबारी सम्‍पादक और तीन कॉलेजों के हिन्‍दी मास्‍टर उसकी लिखाई पर साहित्यिक भाषा में ऊल-जुलूल गदहपचीसी लिख मारें, इसके अनंतर फिर उसे संसार से अन्‍य और कामना नहीं होगी. वह दूर-दूर तक इसकी चिंता नहीं करेगा कि उसकी किताब की प्रतियों की बिक्री छह सौ पर अटकी हैं, कि वर्ष के अंत तक आठ सौ की सीमा पार पायेंगी. इसकी तो वह कतई चिंता नहीं करता दिखेगा कि किताब कभी दस, बीस, अस्‍सी हज़ार की बिक्री वाला आंकड़ा छूयेंगी, और नहीं छू रहीं तो रास्‍ते में क्‍या है जो उनकी बिक्री के आड़े आ रहा है.

हिन्‍दी का लेखक (व प्रकाशक, दोनों ही) इसकी कभी चिंता नहीं करता कि बेस्‍टसेलर क्‍या बला हैं, और वो कैसे, क्‍या मुल्‍क हैं जहां किताबें हाथों-हाथ दस, बीस और तीस लाख की संख्‍या में बिक जाती हैं. और उसके पश्‍चात भी अन्‍य भाषाओं में अनुवादों वाली बिक्री का एक नया जीवन शुरु करती हैं.

हिन्‍दी का लेखक (व प्रकाशक) इसके फेरे में भी नहीं पड़ता कि क्‍या वज़ह है कि हिन्‍दी प्रदेशों में पाठ्य-पुस्‍तकों से इतर, चमक-दमक वाले नये मॉल्‍स तक खुलना शुरु हो गये हैं, लेकिन साहित्यिक पुस्‍तकों की दुकानें हैं कि कहीं नज़र नहीं आतीं. राज्‍यों की राजधानियों में 'लिटररी फेस्टिवल' के नये चोंचलों की एक सजावट और मेलों वाली सेलिब्रेशन की लहक सजना शुरु हुई है, लेकिन साहित्यिक लोकप्रियता के वास्‍तविक ज़मीनी ठीये बनें, वह लगभग लुप्‍तप्राय है. लेखक इसकी चिंता करता है? क्‍या कितनी कहां चिंता करता है?

या यही खोजने कहां कितना निकलता है कि उन समाजों में ऐसा क्‍या है जिससे हिन्‍दी समाज अछूता, वंचित है कि किताबें छप-छपकर कहीं पहुंचती नहीं? ऐसा क्‍या है कि अमरीका, योरप नहीं, किसी इंडोनेशियाई समाज का लिखवैया अपने पहले उपन्‍यास में ही ऐसा कुछ कह जाता है कि आठ और अट्ठाइस हज़ार नहीं, उसकी पचासेक लाख प्रतियां बिक जाती हैं, जबकि हिन्‍दी का सम्‍मानित लेखक अपनी किताब की पांच हज़ार प्रतियां तक लोगों के बीच नहीं पहुंचा पाता?


वसुधा तुम कहां हो.. (अ ब त्‍यागी जी की डायरी से)

पुस्‍तक मेले में पहुंच गया हूं. उम्‍मीद है मेरी नवीनतम पुस्‍तक ‘अन्‍य और अन्‍य कहानियां’ पहले ही पहुंच गई होगी (अत्‍यल्‍प प्रकाशन को टैग कर रहा हूं, अत्‍यलप, मिहिर, तुम सब का शुक्रिया, भई)! पिछले मेले में ‘शून्‍य व अन्‍य कहानियां’ चली आई थी, इसी तरह आत्‍मा में हर्षरौरव का क्षण टंकित हुआ था (तब खुशी हुई थी, अब नहीं हो रही. दुष्‍ट और नष्‍ट है विकल्‍प प्रकाशन, खा गये मेरी रचनाशील पाठाग्रता को, उन्‍हें टैग नहीं कर रहा!). मेरे विशेष व किंचित चर्चित रहे काव्‍य-संकलन ‘क्‍या है उस नदी का नाम’‘वसुधा तुम कहां हो’ का प्रकाशन भी उत्‍साह-प्रदर्शन के साथ विकल्‍प ने ही किया था, और किताबें जमालपुर से जौनपुर तक की साहित्‍य-सभाओं में विस्‍मयजन्‍य आश्‍चर्य के साथ निहारी, सराही गई थी, और इसका समस्‍त श्रेय विकल्‍प के गौरव जी की मेधा और चतुराई को जाता है, मगर फिर क्‍या हुआ कि जाने अब किताबें कहीं दिखती नहीं! पिछले वर्ष सुश्री सुनन्‍दा के मधुर-साहचर्य में मैं मध्‍यप्रांत के तीन शहरों के तीन महत्‍वपूर्ण नारी-विमर्शों में उपस्थित था, और ढेरों ऐसे मौके उपस्थित हुए कि महिला संबंधी अपने प्रियकातर विचार शुष्‍क गद्य में प्रेषित करने की जगह अपनी कविताओं का प्रवाहमयी पाठ कर लूं, मगर क्‍या मजाल कि बीसियों कानाफुसियों व उत्‍साही युवा कार्यकर्ताओं के अन्‍वेषणों के बावजूद पूरे शहर में मुझे अपनी काव्‍य-पुस्‍तकों की एक भी प्रति हासिल हुई हो?

सब उसी दुष्‍ट व धृष्‍ट गौरव जी का ही किया-धरा है! जबसे मैंने उनके साले जी की नौकरी में सेवायें झोंक सकने में अपनी असमर्थता व्‍यक्‍त की, उन्‍हीं क्षणों से वह पाजी मेरी कविताओं को लापता बनाये रखने पर तुला हुआ है! जैसे काव्‍य-विरोध के लिए घर में नीरजा ( मेरी सहधर्मिणी) का होना काफी नहीं हो. रात के अंधेरे के किन्‍हीं कमजोर क्षणों में दुष्‍टा अभी तक मुझसे पूछते रहने से बाज नहीं आती कि नहीं, तुम बताओ यह वसुधा कौन है?

मेरी कवितायें जहां कहीं हों, ईश्‍वर और राधेश्‍याम जी (संकल्‍प प्रकाशन वाले – उन्‍हें टैग करूं?) उनकी रक्षा करेंगे, सबसे ज्‍यादा भय तो मुझे पुस्‍तक मेले में अपने पीछे-पीछे नीरजा के पहुंच जाने का है! और पुस्‍तक मेले में पुस्‍तक-प्रेम के दबाव व पीड़़ा में नहीं, बेहया निष्‍ठुर स्‍त्री मेरी जासूसी के फेर में आई होगी? और उसके साथ, हत्हृदय उसके दो वो नालायक संतान होंगे जो मेरा साहित्‍य तो क्‍या, आज तक मेरी पुस्‍तकों का शीर्षक तक नहीं कंठस्‍थ कर सके! पैसों व बालपुस्‍तक सदन की कात्‍यायानी जी के मोह में कभी मैंने एक बाल पुस्तिका भी लिखा था, उस पुस्तिका तक को इन नालायकों का स्‍नेह व संबल नहीं प्राप्‍त हो सका है. मैं एक समूचा दिन एक गंवार स्‍त्री और दो नालायक बच्‍चों की एनबीटी के मंडप में बकवास आवारागर्दी के पीछे नहीं खराब कर सकता. कतई नहीं!

घोड़े की आंखों पर चढ़ी पट्टी के मानिंद सीधे हॉल नं 18 में अभी दाखिल हुआ भी नहीं हूं कि दांत चियारे एकदम सामने नलिन जी टकरा जाते हैं. मैं गंभीर मुद्रा में चेहरा गिराये, बिना एकनॉलेजमेंट में हाथ उठाये बगल से निकल लेना चाहता हूं, मगर निर्लज्‍ज साहित्यिक लपककर मेरे पैर छूने से बाज नहीं आता! जवाब में मैं भी आशीर्वचन देने से बच नहीं पाता. थोड़े समय तक हिलते हुए हम साहित्यिक चर्चा में न्‍यस्‍त होने का अभिनय करते हैं, मूलत: मैं अपनी ‘अन्‍य और अन्‍य कहानियां’ पर नलिन जी के बधाई की राह तकता हूं, मगर दुष्‍ट उसकी चर्चा तक नहीं करता, मजबूरी में मेरे ही मुंह खोलने पर सहर्ष अवाक् होने का धृष्‍ठ अभिनय करने लगता है!

नलिन जी – अत्‍यल्‍प के स्‍टाल से तो अभी-अभी चला आ रहा हूं, वहां तो आपकी कोई पुस्‍तक नज़र नहीं आई? होती तो मिहिर जी निश्चित सूचित करते. अत्‍यल्‍प के इस वर्ष जो नये टाइटल्‍स हैं, कविताओं के हैं, और कवितायें तो इधर बहुत अवधि से आपने लिखा नहीं? कहीं अन्‍य में अन्‍य कहानियों की जगह कवितायें तो नहीं?

तात्‍कालीक आंतरिक तनाव व दबाव के वशीभूत तीन क्षणों के लिए मुझे भी बोध होता है कि कदाचित कवितायें ही हों, नीरजा और अपने नालायक संतानों व साहित्‍येतर अन्‍य तनावों में मैं उनकी कहानियां होने की कल्‍पना करने लगा हूं, ‘अन्‍य और अन्‍य कवितायें’ ही शीर्षक है जिसके स्‍नेह में मैं इतनी दूर की यात्रा करता अपने प्रेमस्‍थली तक खिंचा चला आया हूं? मगर फिर मेरे होश लौटते हैं, चोटखायी नज़रों के ताप को नये चढ़ाये काले चश्‍मों से ढंकता, नलिन जी को निरुद्देश्‍य तकता में इंकार में सिर हिलाता हूं. नलिन जी मुस्‍कराने लगते हैं.

नलिन जी – हो सकता है कहानियां न हों, नाटक हों? गौरव जी के विकल्‍प प्रकाशन ने छापा हो, याद कीजिये?

हॉल नं 18 के मुख्‍य दरवाजे पर खड़े मेरे गाल कांपते हैं, मेरे बाल हिलते हैं, मैं नाक पर चश्‍मा दुरुस्‍त करता नलिन जी से नहीं, स्‍वयं को बताता, बुदबुदाता हूं, वसुधा तुम कहां हो?

Sunday, February 16, 2014

स्‍टिल लाईफ़..

एक

घर 

कुछ दूर आगे जाकर लड़की मुड़कर देखी तो दीखा घर की हंसी में वह साथ नहीं थी. लौटकर पीछे आती तो खुशी का सहज अभिनय दुहराती, घरवालों के साथ सहज हो जाती, लेकिन थोड़ा आगे निकलते ही घर उससे छूट जाता. घरवाले दुश्मन नहीं थे, लेकिन लड़की की खुशी से पहले घर की खुशीवाले थे. लड़की भी घर की खुशीवाली थी, मगर बेचारी, अपने मन के आसमान में फिर एक लड़की भी तो थी..

लड़की, घर, खुशी सबसे छूटा हुआ, लड़के ने हंसते भाई को देखकर उसमें भाई की हंसी पहचानकर इस पहचानी की खुशी में खुश हुआ; मगर उस हंसी से बाहर वह भाई को उतना ही पहचानता था जितना अलग-अलग लोगों से भरा वह घर अब उसे नहीं जानता था..

घर में बेल, सीताफल, अमरूद और आम के पेड़ थे, आंगन और अहाता था, टीवी पर गाना बजता और साल के पेड़ के नीचे खड़ी बाइक को ताड़ता कुत्ता आकर उसे गीला कर जाता, भागती बच्ची के सिर पर साथ-साथ मच्छड़ भागते, दरवाज़े के पीछे औरत संझा गाती, एक बूढ़ा कराहता, इतनी आवाज़ों में छनकर धीमे-धीमे दिन खुद को खाली करता, सब जतन होते, मगर जो घर होता उसमें घर नहीं होता..

दो

बाहर

बच्चे ने उलटकर हाथ पोंछी नाक
बस्ते पर ठिठका बेंग बढ़ा आया
सविता कूकर का दाल सहेजकर रोने लगी
संवरण सम्मान से छूटा कवि, कविता धोने
कस्बाई कुत्ता चौंककर भूंकने, कि अहंमन्य
नैतिकता में किसी महानगरीय कुत्ते से भला किसी तरह
मैं कम कैसे हुआ, और जो हुआ तो फिर कैसा कुत्ता हुआ
पुनिया हाथ छिटककर चिनकने, कि देखो, मुंहजार मेहरारु
आज फिर नहीं की है रांधना, पिंटू होता मन-विवर्ण, कि अब
गुपचुप के धंधा में भइया सच्चो बरक्कत नहीं है, राधेमोहन
गोड़ का बिवाई रगड़ते झौंकते कि पंडिताइयो में नै है हो!
मैं चदरी में मुंह लुकाये बुदबुदाकर किसी से नहीं कहता
कि मनभावन साहित्य के जीवन में भी फिर सुबह होगी.

पांच

फिर गिरुँगा

फिर गिरुँगा मुँह के बल
सन्-सनाक् बगल से गुज़रेगी रेल, धम्म्-धड़ाक्
ज़रा दूरी पर लूले लंगड़े बारात का शोर होगा
शायद या संस्कृति के किसी अन्य व्यभिचार का
उठूँगा हाथ झाड़ता नज़रें चुराये लजाये, घबराकर हँसता
सन्न् निर्वाक, चहलती हँसी के खखोर मे़ आ मिला, थेथरई
में खिला, टहलता तुम तक चलूँ तुमको मिलूँगा, नई सजावटों में
वही पुरानी शिकायतें करुँगा, मुँह के बल, किस अदा में आह, फिर गिरुँगा.

छह

तुम और मैं

पाठ और पाठकों से झुंझलाई, थकी चोटखाई कुम्हलाई
छूटी किसी कविता की तरह मिली होंगी तुम
आँखों और उँगलियों में ख़ून लिए, मुँह सिये
दबी नज़रों के ख़ौफ औ' खोये में डूबी, समय जिये
हाथ झटकता, डपटता, कुछ घबराया मिला हूँगा मैं
तीन और तेरह सपनों की लाल झोली अँड़साये
आवारा अदृश्य, लापता घर का बिना किसी को बताये
अजाने ज़ुबानों की गुफ़्तगू बुनता, लजाकर
चुप्पियों में फिर सिर धुनता, कुछ का कुछ गुनगुनाने लगता
किन्हीं और नामों से तुम्हें बुलाने, देखने की तरतीब
कोई और और समय औ' ज़माने की, ख़तरनाक़ बताने लगता

तुम होतीं पास पास, खुश और उदास
छूटी कविता-सी भुलाई, टूटी
मैं दीखता ठिठका अटका उजाड़, हिचकियों में छूटता
भागती रेल से जैसे छूटे पेड़ दिखते हैं दौड़ते पहाड़.

न पाई, लोरी..













मौत के ठीक पहले चिड़िया कौन गीत गाती
घायल पँखों की तितली फूल को क़िस्से सुनाती क्या
फटी तल्ली के जूते खींचता सजाता स्कूल का बच्चा
अपने बेस्टफ्रेंड की पीठ पर नये झूठ कौन सुलाता

सब जतन करके, ओहो, दूर तुमसे निकल आता
खुद को सुतला सकूँ मगर कहीं
ऐसी लोरी कब्बो फिर मैं कहाँ पाता..

हिसाब-किताब..

लगभग महीने भर शहर, कहें जो भी मेरा घर है, से बाहर था, बहुत कुछ वह भी वजह होगी कि आपे से भी था, बाहर, लेकिन अच्‍छा इतना यही रहा कि उल्‍टे-सीधे चिंहुक में शब्‍द और ख़याल बीनता, बुनता रहा; कुछ ब्‍लॉगर की होगी, ज़्यादा मेरी थी, कि ब्‍लॉग पर उन्‍हें चढ़ाने की जगह, फेसबुक की दीवार पर ही चुनता रहा. अब समय और स्‍थान की सहूलियत बनी है तो कुछ उल्‍टा-सीधा, बिना किसी सिलसिले के, यहां ब्‍लॉग पर भी टांक रहा हूं.. किसी भटके राही की उनसे आंखें सिंकें तो अपने करम!


बही-खाता

कहीं कभी छपा हूं
ढेरों लिपियों से छिपा हूं
भागती रेल की भाषाओं में
     - सोचता अभी रुका हूं .

लिखना कविता

एक सनसनाती गुज़र जाती
अरे कैसे हो गया हिन्दी में अच्छा एक अनुवाद की तरह
एक अटकी भटकती भाँवर फिरती
मोह की मारी, भीड़-अकेली की दुलारी
हटिया दिलहारपुर के भँवर में 
सँवरकर निकली हो जयंतियों बैजंतियों के मद्ध
कौनो जुलियेट बिनोश की तरह
एक उँगलियां कुतरती कान काटा खाती
हँसी के भेद में आह भरे, बुलका बहवायी जाती
- हाय - एक

कि दिन हो लाल हो न नीली रात
फटी आँखों दुनिया तकती चलती एक
दूजी गड़बड़ायी दुनिया के दु:ख गिनती
अड़हुल, अपराजिता, धनसार, कसार
खड़िया, खखोर, खवनई, खोयों के हिसाब सहेजती
पटनहिया लिट्ट शिट्ट दरकिनरियाती
चार कदम बाजू सैकिल के घंटी बजाती
लजाई फिर, क्लैरीनेट का नया कोई तान छेड़े आती
- आह, एक

मुस्कियाई तुम्हारे कलेजे में आती, अँड़सी गड़ी जाती
कि तुम हो तो दुनिया है, बुदबुदाती
मन लुट्टल जाता
औ' सगरे सब सुन्न किये जाती
- प्रिये, एक!