Sunday, February 16, 2014

हिसाब-किताब..

लगभग महीने भर शहर, कहें जो भी मेरा घर है, से बाहर था, बहुत कुछ वह भी वजह होगी कि आपे से भी था, बाहर, लेकिन अच्‍छा इतना यही रहा कि उल्‍टे-सीधे चिंहुक में शब्‍द और ख़याल बीनता, बुनता रहा; कुछ ब्‍लॉगर की होगी, ज़्यादा मेरी थी, कि ब्‍लॉग पर उन्‍हें चढ़ाने की जगह, फेसबुक की दीवार पर ही चुनता रहा. अब समय और स्‍थान की सहूलियत बनी है तो कुछ उल्‍टा-सीधा, बिना किसी सिलसिले के, यहां ब्‍लॉग पर भी टांक रहा हूं.. किसी भटके राही की उनसे आंखें सिंकें तो अपने करम!


बही-खाता

कहीं कभी छपा हूं
ढेरों लिपियों से छिपा हूं
भागती रेल की भाषाओं में
     - सोचता अभी रुका हूं .

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