पुस्तक मेले में पहुंच गया हूं. उम्मीद है मेरी नवीनतम पुस्तक ‘अन्य और अन्य कहानियां’ पहले ही पहुंच गई होगी (अत्यल्प प्रकाशन को टैग कर रहा हूं, अत्यलप, मिहिर, तुम सब का शुक्रिया, भई)! पिछले मेले में ‘शून्य व अन्य कहानियां’ चली आई थी, इसी तरह आत्मा में हर्षरौरव का क्षण टंकित हुआ था (तब खुशी हुई थी, अब नहीं हो रही. दुष्ट और नष्ट है विकल्प प्रकाशन, खा गये मेरी रचनाशील पाठाग्रता को, उन्हें टैग नहीं कर रहा!). मेरे विशेष व किंचित चर्चित रहे काव्य-संकलन ‘क्या है उस नदी का नाम’ व ‘वसुधा तुम कहां हो’ का प्रकाशन भी उत्साह-प्रदर्शन के साथ विकल्प ने ही किया था, और किताबें जमालपुर से जौनपुर तक की साहित्य-सभाओं में विस्मयजन्य आश्चर्य के साथ निहारी, सराही गई थी, और इसका समस्त श्रेय विकल्प के गौरव जी की मेधा और चतुराई को जाता है, मगर फिर क्या हुआ कि जाने अब किताबें कहीं दिखती नहीं! पिछले वर्ष सुश्री सुनन्दा के मधुर-साहचर्य में मैं मध्यप्रांत के तीन शहरों के तीन महत्वपूर्ण नारी-विमर्शों में उपस्थित था, और ढेरों ऐसे मौके उपस्थित हुए कि महिला संबंधी अपने प्रियकातर विचार शुष्क गद्य में प्रेषित करने की जगह अपनी कविताओं का प्रवाहमयी पाठ कर लूं, मगर क्या मजाल कि बीसियों कानाफुसियों व उत्साही युवा कार्यकर्ताओं के अन्वेषणों के बावजूद पूरे शहर में मुझे अपनी काव्य-पुस्तकों की एक भी प्रति हासिल हुई हो?
सब उसी दुष्ट व धृष्ट गौरव जी का ही किया-धरा है! जबसे मैंने उनके साले जी की नौकरी में सेवायें झोंक सकने में अपनी असमर्थता व्यक्त की, उन्हीं क्षणों से वह पाजी मेरी कविताओं को लापता बनाये रखने पर तुला हुआ है! जैसे काव्य-विरोध के लिए घर में नीरजा ( मेरी सहधर्मिणी) का होना काफी नहीं हो. रात के अंधेरे के किन्हीं कमजोर क्षणों में दुष्टा अभी तक मुझसे पूछते रहने से बाज नहीं आती कि नहीं, तुम बताओ यह वसुधा कौन है?
मेरी कवितायें जहां कहीं हों, ईश्वर और राधेश्याम जी (संकल्प प्रकाशन वाले – उन्हें टैग करूं?) उनकी रक्षा करेंगे, सबसे ज्यादा भय तो मुझे पुस्तक मेले में अपने पीछे-पीछे नीरजा के पहुंच जाने का है! और पुस्तक मेले में पुस्तक-प्रेम के दबाव व पीड़़ा में नहीं, बेहया निष्ठुर स्त्री मेरी जासूसी के फेर में आई होगी? और उसके साथ, हत्हृदय उसके दो वो नालायक संतान होंगे जो मेरा साहित्य तो क्या, आज तक मेरी पुस्तकों का शीर्षक तक नहीं कंठस्थ कर सके! पैसों व बालपुस्तक सदन की कात्यायानी जी के मोह में कभी मैंने एक बाल पुस्तिका भी लिखा था, उस पुस्तिका तक को इन नालायकों का स्नेह व संबल नहीं प्राप्त हो सका है. मैं एक समूचा दिन एक गंवार स्त्री और दो नालायक बच्चों की एनबीटी के मंडप में बकवास आवारागर्दी के पीछे नहीं खराब कर सकता. कतई नहीं!
घोड़े की आंखों पर चढ़ी पट्टी के मानिंद सीधे हॉल नं 18 में अभी दाखिल हुआ भी नहीं हूं कि दांत चियारे एकदम सामने नलिन जी टकरा जाते हैं. मैं गंभीर मुद्रा में चेहरा गिराये, बिना एकनॉलेजमेंट में हाथ उठाये बगल से निकल लेना चाहता हूं, मगर निर्लज्ज साहित्यिक लपककर मेरे पैर छूने से बाज नहीं आता! जवाब में मैं भी आशीर्वचन देने से बच नहीं पाता. थोड़े समय तक हिलते हुए हम साहित्यिक चर्चा में न्यस्त होने का अभिनय करते हैं, मूलत: मैं अपनी ‘अन्य और अन्य कहानियां’ पर नलिन जी के बधाई की राह तकता हूं, मगर दुष्ट उसकी चर्चा तक नहीं करता, मजबूरी में मेरे ही मुंह खोलने पर सहर्ष अवाक् होने का धृष्ठ अभिनय करने लगता है!
नलिन जी – अत्यल्प के स्टाल से तो अभी-अभी चला आ रहा हूं, वहां तो आपकी कोई पुस्तक नज़र नहीं आई? होती तो मिहिर जी निश्चित सूचित करते. अत्यल्प के इस वर्ष जो नये टाइटल्स हैं, कविताओं के हैं, और कवितायें तो इधर बहुत अवधि से आपने लिखा नहीं? कहीं अन्य में अन्य कहानियों की जगह कवितायें तो नहीं?
तात्कालीक आंतरिक तनाव व दबाव के वशीभूत तीन क्षणों के लिए मुझे भी बोध होता है कि कदाचित कवितायें ही हों, नीरजा और अपने नालायक संतानों व साहित्येतर अन्य तनावों में मैं उनकी कहानियां होने की कल्पना करने लगा हूं, ‘अन्य और अन्य कवितायें’ ही शीर्षक है जिसके स्नेह में मैं इतनी दूर की यात्रा करता अपने प्रेमस्थली तक खिंचा चला आया हूं? मगर फिर मेरे होश लौटते हैं, चोटखायी नज़रों के ताप को नये चढ़ाये काले चश्मों से ढंकता, नलिन जी को निरुद्देश्य तकता में इंकार में सिर हिलाता हूं. नलिन जी मुस्कराने लगते हैं.
नलिन जी – हो सकता है कहानियां न हों, नाटक हों? गौरव जी के विकल्प प्रकाशन ने छापा हो, याद कीजिये?
हॉल नं 18 के मुख्य दरवाजे पर खड़े मेरे गाल कांपते हैं, मेरे बाल हिलते हैं, मैं नाक पर चश्मा दुरुस्त करता नलिन जी से नहीं, स्वयं को बताता, बुदबुदाता हूं, वसुधा तुम कहां हो?

अपनी किताबों के सस्ते संस्करणों के कवर पर भी 'पतनशील साहित्य' जैसा कुछ जरूर लिखवाया कीजिए। खूब चलेंगी, खूब बिकेंगी और बेची जाएंगी।
ReplyDelete'किताबों'? कहां हो अभागो?
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