Friday, February 21, 2014

विपुमे से बाहर एक लेखिका (सफल) कहां है?

म श्री की डायरी..

अब तक बारह मर्तबा विपुमे (हॉल नं 18) हो आई हूं, फिर भी मन है कि रीता-रीता सा बना रहता है! मानो अपनी कोई अन्‍यतम सखी, प्रेम, अंतरंग अनुभूति का दुलार अपने पीछे मेले में छोड़े आई हूं, और दुबारा चटपट भागकर वापस उसे अपने गहरे अंकवार में भर लेना है! विपिन भी कहते हैं हुआ मेला-सेला, तुम्‍हारी तीन किताबों का लोकार्पण हुआ, अच्‍छे से ही हुआ, मगर अब जाकर वहीं थोड़ी रहने लगोगी? कौन-सी जो तुमने कोई वहां दुकान लगा रखी है? मैं मुस्‍कराकर विपिन की आंखों में झांककर फिर दु:खकातर अपनी नज़रें गिरा लेती हैं, हृदयसंगी के आगे हमेशा अनावृत्‍त रही, फिर भी एक स्‍त्री का, और खासतौर पर मेरी तरह लगातार हर जगह, हर कहीं छप रही एक सफल स्‍त्री का अकेलापन, उसकी असहायता कभी समझ सकेंगे विपिन? इस वृहत् ब्रह्माण्‍ड में अफ्रीका से अमरीका (इस वर्ष जून में फिर अफ्रीका जा रही हूं, रियो द जनेरो अफ्रीका में ही है न? Wow!) तक पूरी दुनिया में कोई पुरुष समझ सकेगा? Though I love Vipin and all and he is the gentlest of male pigs I have known in all my life (but what about Arun ji? Can I ever forget him? Ever?) बट एक लेखिका का अकेलापन, खुद उसके अपने घर के स्‍नेह-संसार में भी, इज़ ए थिंग विपिन विल नेवर अंडरस्‍टैंड, एंड दैट आई कैन शेयर ओनली विद् माई अदर रेस्‍पेक्‍टेड फिमेल राइटर्स! मधुलिका जी आप सुन रही हैं? और श्‍वेतालिकाश्री?

विपिन से क्‍या कहूं कि विपुमे (हॉल नं 18) में अट्ठारह मर्तबा जा-जाकर फिर रीते मन घर लौटती हूं तो वहां पीछे क्‍या छूटा रहता है मेरा? मेरा समूचा स्‍वत्‍व वहीं छूटा रहता है, विपिन, माई लाईफ़ इज़ एल्‍सवेयर (म ब्रोदोस्‍की ने कहीं कितने अच्‍छे से यह बात कही है, या श्‍लोतोस्‍की ने? एनीवेज़, मालूम नहीं मैं रूस या पौलेण्‍ड कब जाऊंगी, हालांकि चाण्‍क्‍यपुरी में बालसीकर सर मिले थे तो उनके सोफे की बांहों पर धंसी, अपने गहरे केश उनके चश्‍मे पर गिराते अपने मन की कचोट का मैंने इतने अच्‍छे से जिक्र किया तो था? (I just hope बालसीकर सर संस्‍कृति मंत्रालय में ही हैं, मगर वह लुच्‍ची मधुलिका जिस तरह मुझसे जलती है कोई भरोसा नहीं कि उसने मुझे पार्टी में भेजा ही गलत आदमी के पास हो? यह सारी जो बुढ़ा रही महिला लेखिकायें हैं, मुझसे ईश्‍वर जाने इतना जलती क्‍यों हैं, क्‍या कर सकती हूं अगर मैं इतना अच्‍छा लिखती हूं? ओह, विपुमे के अंधेरे पृष्‍ठों में जाने अभी क्‍या-क्‍या कुछ चल रहा होगा, और मैं यहां होपलेस पारिवारिक कोडैक मोमेंट्स जी रही हूं, ऐसा क्‍यों कर रही हूं?). सोफे पर धंसी मुझ अबला की देह पर मेरी दोनों लल्लियां आकर चढ़ जाती हैं (वैसे कहां की लल्लियां, एक अट्ठारह की हुई, दूसरी इक्‍कीस की), मेरी देह चरमराती है, मगर आत्‍मा स्‍नेह की पुलक में भर-भर जाता है, आंखों से स्‍नेह की अश्रुधारा बहने लगती है! विपिन भावुक होकर जल्‍दी से मोबाइल निकालकर हम तीनों के तीन स्‍नैप लेते हैं, जिसे अभी कपड़ा बदलकर मुझे FB पर अपलोड करना होगा, I hope it gets me at least 400 likes!

संकल्‍प प्रकाशन के नवीन जी कहते रहते हैं कि क्‍या फैन फोलोइंग है आपकी म श्री, इतनी चिट्ठि‍यां तो हजारी जी के लिखे को भी नहीं प्राप्‍त होती थी? मैं नवीन बुड्ढे को किंचित लजाकर, देह की अकुलाहट में सजाकर, इंफोर्म करती हूं कौन हजारी जी, और हजारी जी के पास वो आंखें थीं जिनसे मैं आपको अपलक तकती रहती हूं, हमेशा आपके बारे में सोच-सोचकर अस्थिर होती रहती हूं? और नवीन जी, आप म श्री की जगह मुझे मिश्री नहीं बुला सकते (ओह, अरुण जी, आप कहां हो?)?

अभी आंखें मुंदी नहीं कि प्रत्‍युष जी का फोन आ रहा है (प्रत्‍युष जी ने छापा है मेरा कोई टाईटल? छापा ही होगा, या कौन जाने एडवांस में बधाई देने के लिए फोन कर रहे हों? किसी नये पुरस्‍कार के लिए मेरे नाम का अनुमोदन हुआ हो? ज्‍योतिर्मय सर ने कोई टांका भिड़ाया हो! ओह, ज्‍योतिर्मय सर, यू आर ए ट्रू अनकरेजिबल बास्‍टर्ड! वेन आर वी मिटिंग नेक्‍स्‍ट?). मगर मैं विपुमे (हॉल नं 18) कल क्‍या पहनकर जानेवाली हूं? ओह, एक अकेली स्‍त्री (लेखिका, सफल) को कितना-कितना कुछ सोचना होता है! सीखो, लड़कियो, मुझसे सीखो, सीखो!

2 comments:

  1. सफल लेखिकाओं (लेखिका महिला ही होगी, ऐसा मान कर चल रही हूं इसलिए प्रचलन के बावजूद 'महिला लेखिका' नहीं लिख रही हूं।) से ईर्ष्या से भरे पूरे इस आलेख में कुछ नया नहीं लगा।

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  2. बहुत ईर्ष्‍या है, एकदम सही, कैसी महीनी में पहचान गईं आप? आह, धन्‍यवाद.

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