Saturday, February 22, 2014

रात में मॉडम

टिमटिमाती झिल-मिल हवाओं में तैरी आतीं
रौशनियां लाल नीली हरी पीली
एयरपोर्ट के बाहर के अंधेरों में
तीखी गर्जना में एकदम-से चमककर तेज़ होतीं
दीखता रौशन आसमान कुछ देर दूर तक
फिर लाल नीले सियाह में घुमा गुमा जाता
कहीं और किधर और किसी टैक्‍सी की पीठ पर सवार
सड़कों पर भागी भागी भागी जाती
सोये दुकानों का सिर नहलातीं, पीछे पीछे
पीछे छूटी जातीं, जैसे साथ की रात थी
कोई राज़ की बात, वक़्त हुआ और अब सब पीछे गया
दूर तक पसरे अंधेरों के बाद फिर एक लाल उतरा आता
चुप्‍प चुप्‍प चुप्‍प
तसल्‍ली से सबके चुप बने रहने का मसौदा सजाता
एक धड़धड़ाता ट्रक गुजरता, शहर की नींद की धज्जियां उड़ाता

बहुत दूर, इस सबसे बहुत दूर
किसी घर के सूने पंखे की संगत में अलसाया मॉडम रह-रहकर
रौशनी के फांक बुनता बनाता, न सुनता हो कोई
दुनिया के सुर में चुप्‍पे रात की बेआवाज़ लोरी गाता.

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