Friday, February 28, 2014

चलो हटो फटो कविता













कवितायें खूब होंगी
बेसंभाल जन्‍मती
सब कतार में होंगी
कवि होंगे सतना, सीवान, सांवलपुर
में रेल पकड़कर दिल्‍ली की बस उतरते
मेट्रो में ताड़ते चेहरे कि यहां कौन पढ़ता है कविता
अरे पढ़ो भले लोगों अपना उद्धार करो
मुरझायी कविता का हे ईश्‍वर बाबू मालिक
सरकार कइसहूं हुजूर बेड़ा पार करो

कपड़ों की संभाल और फोन की खंगाल के सफरी
इस वीडियो से निकल उस वीडियो की टहल करते
मन उचट जाये तो फिर झूलती दीवार पर
दिल्‍ली प्रशासन का वही पिटा विज्ञापन पढ़ते
कविता में और वह भी मुई हिंदी में भला कब बहलते हैं
पढ़ना ही होगा नई नौकरियों की अर्जी पढ़ेंगे
तेजी से हाथ चलाते अर्जियों में फर्जी भाषा भरेंगे
एकदम से मुंह उठाये सामने हिंदी चली ही आये
तो फीकी मुस्‍कान की आड़ में लो चला आया डाउनमार्केट
के ख़्याल में उसी तत्‍परता से बहुधा डरेंगे भी

हिंदी - सिनेमा के काम आयेगी
और टीवी पर अदा सजानेवालों के
या ठेलों पर सब्‍जी घुमानेवालों और
रिक्‍शे में सवारियां पहुंचानेवालों के
कविता के मुंह में जाते ही वह जाने किस जनसाहित्‍य की
सेवा में लगी नवेली पतोह हो जायेगी
जिससे चिमटा नहीं उठेगा छनौटा नहीं चलेगा
सूप फटकने में हाथ पिरायेंगे गोईंठा बालने में बड़ा गंधाइन गमकेगा
लब्‍बोलुआब यह कि अढ़ाई पुरस्‍कार का इक ज़रा संसार पाकर
जनसाहित्‍य की चौहद्दी में घूमती कविता उसी में जन जन का मुर्दा मंत्र पढ़ेगी
मंच पर चढ़कर जन का होने में उसके हाथ पैर फूलेंगे कलेजा झूलेगा
जन जो होंगे समाज की ही तरह कविता के निर्धन होंगे
कोई आवारा होगा मजमा सजाकर मंच पर चीखेगा कविता कविता
कविता बेचारी फुदककर किसी लघु पत्रिका में छिप जायेगी
या अल्‍ला मियां की किरपा हुई तो चोंच चटकारती दिल्‍ली के
किसी प्रकाशक की हथेली पर पचहत्‍तर वॉट की टिल्‍ली रोशनी पायेगी
अंधेरी पगडंडियों पर बिजली नहीं बनेगी कहीं बल्‍ब नहीं जलायेगी
यहां से निकलकर ससुरी हिंदी कविता आगे कब कहां जायेगी.

1 comment:

  1. जितना हमने मान दिया, उतना सबने मान दिया। लिखने वाले छीछालेदर करें तो पढ़ने वालों को भी अधिकार है।

    ReplyDelete