Thursday, February 20, 2014

हिन्‍दी रुदन..

कोई ज़िम्‍मेदार और संवेदनशील समाज होता तो हिन्‍दी का प्रकाशन संसार शर्मिंदगी में यह तथ्‍य आज नहीं, वर्षों पहले सार्वजनिक कर चुका होता कि हिन्‍दी में बहुत लोकप्रिय समझी जानेवाली किताबें, 'मैला आंचल', 'आधा गांव', 'गुनाहों का देवता', 'राग दरबारी' की लोकप्रियता, व उनकी बिक्री का तथ्‍यात्‍मक ठीक-ठीक व्‍यौरा क्‍या है. मगर गुटफ़रेबियों और घपलों की पीठ पर रोटी तोड़ता हिन्‍दी का प्रकाशन-संसार सार्वजनिक नैतिकताओं के ऐसे आग्रहों और मोह में नहीं अटकता, 'धंधा चालू आहे' की पीठ पर अपना रजिस्‍टर छुपाये अपनी दुकान चलाता है. दुकान चलाने से ज्‍यादा के संभवत: उसके अरमान व महत्‍वाकांक्षा भी नहीं.

जैसे खुद हिन्‍दी लेखक तक के नहीं. वह एक पिटे इंटर कॉलेज के स्‍टाफ रुम साईज़ के साहित्यिक समाज में ज़रा-सा नाम और यश में मुदित बना रहता है, हिन्‍दी से बाहर के बड़े संसार में आंखे खोलकर देखने और सबक लेने का उसे सुझाव दीजिये, वह विशुद्ध बकलोली बकने लगता है, या ज्‍यादा हुआ तो आपको गालियां बकने लगेगा..

हिन्‍दी के लेखक को आप सुखी देखना चाहते हों तो उसे एक मंच दे दें और हाथ में माइक. इतने मात्र में बेचारे का चेहरा चमकने लगता है. सुख के नशे में उसे दीवाना करना हो तो लगे हाथ तिलकुट ज्ञानेश्‍वरी के डेढ़ और श्रद्धेश्‍वरी के ढाई घेलाटाइप सम्‍मान भी उसकी झोली में गिरा दें, पैरों के बीच पूंछ दबाये वह आजीवन आपका आभारी बना फिरेगा. डेढ़ अखबारी सम्‍पादक और तीन कॉलेजों के हिन्‍दी मास्‍टर उसकी लिखाई पर साहित्यिक भाषा में ऊल-जुलूल गदहपचीसी लिख मारें, इसके अनंतर फिर उसे संसार से अन्‍य और कामना नहीं होगी. वह दूर-दूर तक इसकी चिंता नहीं करेगा कि उसकी किताब की प्रतियों की बिक्री छह सौ पर अटकी हैं, कि वर्ष के अंत तक आठ सौ की सीमा पार पायेंगी. इसकी तो वह कतई चिंता नहीं करता दिखेगा कि किताब कभी दस, बीस, अस्‍सी हज़ार की बिक्री वाला आंकड़ा छूयेंगी, और नहीं छू रहीं तो रास्‍ते में क्‍या है जो उनकी बिक्री के आड़े आ रहा है.

हिन्‍दी का लेखक (व प्रकाशक, दोनों ही) इसकी कभी चिंता नहीं करता कि बेस्‍टसेलर क्‍या बला हैं, और वो कैसे, क्‍या मुल्‍क हैं जहां किताबें हाथों-हाथ दस, बीस और तीस लाख की संख्‍या में बिक जाती हैं. और उसके पश्‍चात भी अन्‍य भाषाओं में अनुवादों वाली बिक्री का एक नया जीवन शुरु करती हैं.

हिन्‍दी का लेखक (व प्रकाशक) इसके फेरे में भी नहीं पड़ता कि क्‍या वज़ह है कि हिन्‍दी प्रदेशों में पाठ्य-पुस्‍तकों से इतर, चमक-दमक वाले नये मॉल्‍स तक खुलना शुरु हो गये हैं, लेकिन साहित्यिक पुस्‍तकों की दुकानें हैं कि कहीं नज़र नहीं आतीं. राज्‍यों की राजधानियों में 'लिटररी फेस्टिवल' के नये चोंचलों की एक सजावट और मेलों वाली सेलिब्रेशन की लहक सजना शुरु हुई है, लेकिन साहित्यिक लोकप्रियता के वास्‍तविक ज़मीनी ठीये बनें, वह लगभग लुप्‍तप्राय है. लेखक इसकी चिंता करता है? क्‍या कितनी कहां चिंता करता है?

या यही खोजने कहां कितना निकलता है कि उन समाजों में ऐसा क्‍या है जिससे हिन्‍दी समाज अछूता, वंचित है कि किताबें छप-छपकर कहीं पहुंचती नहीं? ऐसा क्‍या है कि अमरीका, योरप नहीं, किसी इंडोनेशियाई समाज का लिखवैया अपने पहले उपन्‍यास में ही ऐसा कुछ कह जाता है कि आठ और अट्ठाइस हज़ार नहीं, उसकी पचासेक लाख प्रतियां बिक जाती हैं, जबकि हिन्‍दी का सम्‍मानित लेखक अपनी किताब की पांच हज़ार प्रतियां तक लोगों के बीच नहीं पहुंचा पाता?


5 comments:

  1. sab kuch to aap ne keh dala...ab kehne ko kuch bacha nahi...bilkul sahi kaha aapne.

    ReplyDelete
  2. "...कि आठ और अट्ठाइस हज़ार नहीं, उसकी पचासेक लाख प्रतियां बिक जाती हैं, जबकि हिन्‍दी का सम्‍मानित लेखक अपनी किताब की पांच हज़ार प्रतियां तक लोगों के बीच नहीं पहुंचा पाता...

    पचास लाख! OMG!
    वजह शायद ये तो नईं कि हिंदी में अधिसंख्य, चहुँओर सम्मानित लेखक ही लेखक हैं, पाठक हैये ही नईं!

    ReplyDelete
  3. कितना बिका, कोई प्रमाण नहीं, कैसे बिका कोई हिसाब नहीं, आप लिख कर आहुति डाल दो बस?

    ReplyDelete