Friday, February 21, 2014

यहां से वहां, कहां-कहां.. (विपुमे में विमर्श जी)..

विमर्श जी की डायरी.. 

मेले में (चमड़े का, नया वाला) अपने कागज़-पत्‍तर दुरुस्‍त करता पहुंच गया हूं (हॉल नं 18), ग्‍यारह बजे तीन अंडों का आमलेट और दो चाय के बाद मन अब कुछ स्थिर लग रहा है, वर्ना गई संध्‍या वाचनजी की कृपा से जो मद्य उदर में अवस्थित हुआ था, वह पूरी रात भयानक उत्‍पात मचाये रहा! कसूर मेरा ही है. हर बार तय करता हूं कि अबकी मेले में मद्य और महिला-माधुर्य से दूरी बनाकर रखूंगा और हर बार होता है कि मेरा पराक्रमी उपक्रम टूट-टूट कर बिखर-बिखर सा जाता है! कसूर नवनीता (पचौरी) और सीता (सान्‍याल) का भी है. न ये दोनों दुष्‍टायें गरिष्‍ठ दैहिक भंगिमाओं में वाचनजी के पृष्‍ठ में डोलती, तैरती मुझमें अतृप्ति का मार्मिक बोध करातीं, न मैं मद्य-अधरों के अंधेरों में गिरता!

मगर अब उठ गया हूं. लगभग. कुछ देर पहले तक माथे में डोलती छायायें थीं, अब नहीं हैं. विविध विमर्श दृष्टि के मध्‍यप्रांत तैरते दिख रहे हैं, और हाथ बढ़ाकर किसी को भी स्‍पर्श कर सकता हूं. कुछ वर्षों पहले तक कैसी त्रासदायी अवसादी हवा थी, यही पथ थे यही हॉल नं 18 की दुनिया थी, उदासियों में नहायी फरवरी की धूप थी, इतने विमर्श नहीं थे, किसी को मेरी ज़रुरत नहीं थी, आह, कैसे दुर्दिन थे, मगर अब चीज़ें धीरे-धीरे सरक रही हैं, दुनिया बदल रही है, विमर्शों के पीछे-पीछे मैं भी कहीं पहुंच रहा हूं. थी, कभी रही होगी, अब हॉल नं 18 अवसादी अंधेरों में नहायी दुनिया नहीं है. जब तक मैं इस और उस मंच पर आगे बढ़कर कुछ बोलता दीख रहा हूं, तब तक तो कतई नहीं है.

सुखहर्षिल दिनों में कचोट बस सिर्फ़ इसी बात का है कि पिछले आठ महीनों से अल्‍सर-पीडि़त हूं (प्रोस्‍ट्रेट तो पिछले दो वर्षों से पीछे लगा ही हुआ है). यही वज़ह होगी शिमला की नवोदिता कवियत्री मंजु गैरियाल ने इतने अनूठे, मीठे शब्‍दों में कहा है, ‘ईश्‍वर तुम्‍हारे सुख भी मुझतक आकर होते हैं मलिन,’ लगता है मेरे मन की बात छीन ली हो, या मुझे मेरे चंचल शब्‍दों से विच्छिन्‍न कर दिया हो, ओह, मंजु, आप कैसे इतना अच्‍छा लिख लेती हो? (आज संध्‍या इन विमर्शों का टंटा निपट जाये तो मैं रात ग्‍यारह के बाद फोन पर मंजु, तुम शिमलावाली को समझता हूं?)

आज बड़ी दिक्‍कत मगर यह होनेवाली है कि मुझे मधुलिकाश्री की नारीवादी काव्‍यमयी नव्‍यशीर्षों वाली उनकी नयी कविताओं पर बोलना है, और मुझे भय है कि मैं पुन: किंचित अस्‍थि‍र होने जा रहा हूं! पहली बात तो यही कि मधुलिकाश्री के चेहरे, या अदरवाइस भी, उनमें ऐसा कुछ है नहीं कि किन्‍हीं भी ऊंचाइयों पर एक विस्‍मय के बाद, कुछ और देर तक बोला जा सके. दूसरे, कविताओं पर बोलने से ज्‍यादा आसान, खुद कवितायें रच लेना है. ख़ास तौर पर जब वह हिन्‍दी की कवितायें हों. और शायद मैं यही करूं भी. बिना मधुलिकाश्री की ओर देखे (समक्ष सीता सान्‍याल हों तो फिर क्‍या कहने), धीमे-धीमे आप्‍त काव्‍य-पंक्तियां अनुश्रूत, उद्भूत करता जाऊं? (अब कृपया मुझसे ‘अनुश्रूत’ व ‘उद्भूत’ का अर्थ न पूछें. मुझे क्‍या मेरे साहित्यिक पिताश्री तक को न ज्ञात होगा. और आज वैसे भी मातृभाषा दिवस है, और विमर्शों में लुप्‍त मैं अब भले न जान पाता होऊं कि मराठी, सिंधी, बंबई की हिंदी, गाजियाबादी बरबादी, सहारनपुरिया, त्रिपुरारी बंगाली क्‍या है मेरी मातृभाषा, मगर वह अनुश्रूत व उद्भूत वाली हिन्‍दी तो नहीं ही है!)..

मधुलिकाश्री की काव्‍य-ऊंचाइयों वाले नारी-विमर्श से निपट लूं तो फिर शमशेर (या शेर सिंह?) के महीन प्रगतिशील संस्‍पर्श को छूता पहुंचूंगा. फिर घिल्डियाल जी की नव्‍य दलित आख्‍यान पर भी अपनी मार्मिक मीमांसा टांकने पहुंचना ही है. नहीं पहुंचता तो दलित मित्र बुरा मान जायेंगे, मैं तो मानूंगा ही. अब इन विविध विमर्शों में एक साथ उड़ते हुए एक दिक्‍कत यह इतनी ज़रूर होती रहती है कि एक उधड़े विमर्श की पंक्तियां आप दूसरे विमर्श में सीते दिखते हैं. जैसे परसों वाचाल जी वाले विमोचन में एक लड़की ने बीच वाक्‍य मुझे सहसा टोककर स्‍तब्‍ध कर ही दिया था, पलटकर सन्‍नभाव मैंने भी उसे मुंहतोड़ जवाब दिया, मगर यह भी सत्‍य है कि मैं स्‍तब्‍ध बना भी रहा. लड़की की चितवन ही ऐसी थी. मुग्‍धभाव अभी तक हूं. मन में एक काव्‍य-पंक्ति आकर डोल गई है, आप भी सुनिये :

अभी-अभी तुम आई हो, और अभी-अभी हुआ हूं मैं..

अहा, कैसी मोहक पंक्तियां हैं, पता नहीं किसकी हैं. मेरी नहीं हैं.

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