Sunday, February 16, 2014

स्‍टिल लाईफ़..

एक

घर 

कुछ दूर आगे जाकर लड़की मुड़कर देखी तो दीखा घर की हंसी में वह साथ नहीं थी. लौटकर पीछे आती तो खुशी का सहज अभिनय दुहराती, घरवालों के साथ सहज हो जाती, लेकिन थोड़ा आगे निकलते ही घर उससे छूट जाता. घरवाले दुश्मन नहीं थे, लेकिन लड़की की खुशी से पहले घर की खुशीवाले थे. लड़की भी घर की खुशीवाली थी, मगर बेचारी, अपने मन के आसमान में फिर एक लड़की भी तो थी..

लड़की, घर, खुशी सबसे छूटा हुआ, लड़के ने हंसते भाई को देखकर उसमें भाई की हंसी पहचानकर इस पहचानी की खुशी में खुश हुआ; मगर उस हंसी से बाहर वह भाई को उतना ही पहचानता था जितना अलग-अलग लोगों से भरा वह घर अब उसे नहीं जानता था..

घर में बेल, सीताफल, अमरूद और आम के पेड़ थे, आंगन और अहाता था, टीवी पर गाना बजता और साल के पेड़ के नीचे खड़ी बाइक को ताड़ता कुत्ता आकर उसे गीला कर जाता, भागती बच्ची के सिर पर साथ-साथ मच्छड़ भागते, दरवाज़े के पीछे औरत संझा गाती, एक बूढ़ा कराहता, इतनी आवाज़ों में छनकर धीमे-धीमे दिन खुद को खाली करता, सब जतन होते, मगर जो घर होता उसमें घर नहीं होता..

दो

बाहर

बच्चे ने उलटकर हाथ पोंछी नाक
बस्ते पर ठिठका बेंग बढ़ा आया
सविता कूकर का दाल सहेजकर रोने लगी
संवरण सम्मान से छूटा कवि, कविता धोने
कस्बाई कुत्ता चौंककर भूंकने, कि अहंमन्य
नैतिकता में किसी महानगरीय कुत्ते से भला किसी तरह
मैं कम कैसे हुआ, और जो हुआ तो फिर कैसा कुत्ता हुआ
पुनिया हाथ छिटककर चिनकने, कि देखो, मुंहजार मेहरारु
आज फिर नहीं की है रांधना, पिंटू होता मन-विवर्ण, कि अब
गुपचुप के धंधा में भइया सच्चो बरक्कत नहीं है, राधेमोहन
गोड़ का बिवाई रगड़ते झौंकते कि पंडिताइयो में नै है हो!
मैं चदरी में मुंह लुकाये बुदबुदाकर किसी से नहीं कहता
कि मनभावन साहित्य के जीवन में भी फिर सुबह होगी.

पांच

फिर गिरुँगा

फिर गिरुँगा मुँह के बल
सन्-सनाक् बगल से गुज़रेगी रेल, धम्म्-धड़ाक्
ज़रा दूरी पर लूले लंगड़े बारात का शोर होगा
शायद या संस्कृति के किसी अन्य व्यभिचार का
उठूँगा हाथ झाड़ता नज़रें चुराये लजाये, घबराकर हँसता
सन्न् निर्वाक, चहलती हँसी के खखोर मे़ आ मिला, थेथरई
में खिला, टहलता तुम तक चलूँ तुमको मिलूँगा, नई सजावटों में
वही पुरानी शिकायतें करुँगा, मुँह के बल, किस अदा में आह, फिर गिरुँगा.

छह

तुम और मैं

पाठ और पाठकों से झुंझलाई, थकी चोटखाई कुम्हलाई
छूटी किसी कविता की तरह मिली होंगी तुम
आँखों और उँगलियों में ख़ून लिए, मुँह सिये
दबी नज़रों के ख़ौफ औ' खोये में डूबी, समय जिये
हाथ झटकता, डपटता, कुछ घबराया मिला हूँगा मैं
तीन और तेरह सपनों की लाल झोली अँड़साये
आवारा अदृश्य, लापता घर का बिना किसी को बताये
अजाने ज़ुबानों की गुफ़्तगू बुनता, लजाकर
चुप्पियों में फिर सिर धुनता, कुछ का कुछ गुनगुनाने लगता
किन्हीं और नामों से तुम्हें बुलाने, देखने की तरतीब
कोई और और समय औ' ज़माने की, ख़तरनाक़ बताने लगता

तुम होतीं पास पास, खुश और उदास
छूटी कविता-सी भुलाई, टूटी
मैं दीखता ठिठका अटका उजाड़, हिचकियों में छूटता
भागती रेल से जैसे छूटे पेड़ दिखते हैं दौड़ते पहाड़.

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