Thursday, February 27, 2014

कितने नावों में कितनी बार : एक पुनर्परीक्षा, लघु

यहां पुन: स्‍मरण करना कवि के स्‍मरण की तौहीन, उसे स्‍तुतिहीन करना होगा कि किन प्राथमिक परिस्थितियों में, कितनी सारी ज्‍योतियों की कैसी डगमग सवारियों के आतुर प्रेमालोड़नों का कवि चित्र खींच रहा है (बावजूद इस भव्‍य तथ्‍य के सामने आ-आकर लगातार मुंह मारते रहने के, कि चित्र खींचना, व असभ्‍य जनसंकुल में खोयी जातीं सभ्‍य स्त्रियां, व भारतीय सभ्‍यता के ज्‍योतिपुंजों की निर्मिति कवि का मुख्‍य शगल रहा है, खास तौर पर जब वह बर्कले और कसौनी के हरितवनों में ‘ओ नि:संग ममेतर’‘तुम्‍हें नहीं तो किसे और’ के मार्मिक अकुलाहटों के संधान में नंगे पांव चुपचाप टहलता रहा हो). ख़ैर, हम कितनी नावों में कितनी बार के अपने मुख्‍य विमर्श पर ही लौटें. जिसमें विविधरूपा ज्‍योति के अन्‍वेषण में डगमग कविमना की महीन विवेचना तो है ही, एकनिष्‍ठ एकाग्र पुरोहितप्रधान अन्‍य धर्म-पंथों की महीन लताड़ व अनुपमेय भव्‍य भारतीयता का प्रच्‍छन्‍न गौरवगान भी है!

कवि यहां मात्र ज्‍योति की ही नहीं, विराटा, प्रवीणा, बुद्ध-वीणा, कृष्‍णवंसी (और पावस दिन महाशिवरात्रि की पवित्र दुपहर-सांध्‍य बेला हो, तो) महादेव की धुनि व धुएं की वंदना भी गाये ले रहा है!

संताप, व आत्‍मा की अकुलाई ताप का कैसा विराट, उदात्‍त चित्र कवि खेंचता है जब हथेलियों से छूटकर उसकी प्रेमातुर पंक्तियां विलग हुई कांपती, बुदबुदाती, आत्‍मीय आक्रोश जताती पाठक को (साथ ही ज्‍योति, व ज्‍योतियों को भी) सूचित करती हैं : “और कितनी बार कितने जगमग जहाज़ / मुझे खींच कर ले गये हैं कितनी दूर / किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में / जहां नंगे अंधेरों को / और भी उघाड़ता रहता है / एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश - / जिसमें कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते / केचन चौंधियाते हैं तथ्‍य, तथ्‍य– तथ्‍य-- / सत्‍य नहीं, अंतहीन सच्‍चाइयां... / कितनी बार मुझे / खिन्‍न, विकल, संत्रस्‍त-- / कितनी बार!”

बर्कले व हावर्ड के हरित कदंब, कचनारों के नीचे टहलते, मचलते हुए, ओह, आतताती पश्चिमी सभ्‍यता के प्रति भारतीय व्रती मन का यह कैसा प्रचंड भारतीय सीत्‍कार, व विविध बहुआयामी बेमतलब परायेपनों का नकार, व भारतीयता के ज्‍योतिपुंजों का स्‍वीकारपत्र व अंगीकार-ज्ञापन है. और कितनी रातों में और कितने दिवसहस्राब्दियों में कितनी-कितनी नावों में चढ़कर, कहां-कहां के पासपोर्टों से, ‘हरी घास पर क्षण भर’ से होता हुआ कवि ‘एक बूंद सहसा उछली’ उछालता, पुन: पुन: अपनी ज्‍योतिपुंजल वत्‍सल्‍ताओं पर लौटा आता है, हमारी महान भारतीयता पर अपने काव्‍य का अर्घ्‍य चढ़ाता है. यह विरल देशज काव्‍य-चेतना जनसाहित्‍य के पटे पन्‍नों में ही नहीं, निरुद्देश्‍य साहित्‍य के निश्‍छल निरुत्‍पादित पृष्‍ठों में भी दुलर्भ है.

हरिओम कुंवर और सुमेधा तिवारी की रचनाशीलताओं में खोये हुए ‘कितनी नावों में कितनी बार’ के मेधा-पाठ से आप छूटे रह गये हों, तो कृपया अभी लौटकर इस दुर्लभ निधि में स्‍वयं को भूल जाने का मौका दें, जैसे मैं तो रहता ही हूं लौटता, भूल और भुलाये रखने की त्‍वराभूमियों के तरल तरंगों में आंदोलित होता, जितनी पता नहीं कितनी नावों में कितनी-कितनी तो बार..?

3 comments:

  1. आखिर कितनी नावों में आथिखर कितनी कितनी बार. उफ!

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    1. यह उत्‍तर-संवाद, विशेषकर के 'आथिखर' का पदाघात, अगली नावयात्रा में निश्‍चयंभावी प्रेरणादायी साबित होगा. आह, धन्‍यवाद!

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    2. ब्लॉग की सेटिंग की खासियत है क्या, कि अगर एक से ज्यादा अक्षर डिलीट करना चाहें तो नहीं होते. पूरा शब्द भी नहीं हटता. इसलिए थ रह गया, मिट नहीं पाया. यह और जगह भी हुआ है, सिर्फ इस ब्लॉग पर.

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