Saturday, March 1, 2014

मैं उनमें कहीं नहीं था जो भाग गई थीं, या जेल गये थे..

जीवन मुश्किल हो तो उसकी कहानी आसान हो जाती है. मगर जीवन जब बेचैनियों का अनगढ़, अधूरा हिसाब हो तो उसकी कहानी का फिर कोई ओर-छोर होता है?

उम्र में मुझसे तीन महीने पीछे, अनुभव में सात जिला और तेईस शहर आगे, सुनंदा घर से भाग गई थी. कुछ अनूठा नहीं हुआ था, न पहली बार हुआ था. हमारे घर की होशियार (और इसी वज़ह से ज़्यादा असंतुष्‍ट) लड़कियां हाथ-पैर मारती जब बुरी तरह थक जातीं, मन में प्रेम का पारा ऊपर बढ़ता, परवान चढ़ता, कहीं ऊपर जाकर फिर हारी हुई दुपहरिया की नींद ऊंघने लगता, और वे समझ नहीं पातीं कि इस मुकाम पर आकर अब इससे आगे क्‍या, तो घबराकर एक दिन घर से भाग जातीं. कोई नई बात नहीं थी. लड़कियां घर से भागतीं, मर्द जेल चले जाते. बुन्‍नू मौसी पत्‍ते पर सुपाड़ी की बुकनी रखकर गिलौरी मोड़ती होशियारी के प्रतिपक्ष वाले वकील की भूमिका में बोलतीं, ‘हुशियारिये छांटना है त कौनो और घर छांटके पैदा होइये, ई घर में हुशियारी सोहाता नहीं है!’

मैंने अभी पोस्‍ट आफिस का बटन खोलकर ठीक से पेशाब करना तक नहीं सीखा था और मेरे माथे पर ‘कंपल्सिव डिप्रैसिव’ के गाढ़े काले बादल डोलने लगे थे. अहाते में लट्टू की हार और कक्षा में पेंसिल चोरियों की मार वाली उत्‍तेजनाओं में बहता रह-रहकर मैं एकदम उखड़ जाता और अपने एकांत के अंधेरे में घबराया परेशान होने लगता कि कोई तो कमी होगी मुझमें जो मैं जेल नहीं जा पा रहा. और मैं नहीं जा पा रहा तो इसीलिए कि क़ायदे से असंतुष्‍ट (और अंततोगत्‍वा) होशियार नहीं हो पा रहा?

बुन्‍नू मौसी और उनके होंठों की बदरंग लाली को नज़रअंदाज़ करता, भागा बेहुशियारों की भीड़ में खुद को गुम करता, आंखें मींचे मैं जोर-जोर मन ही मन बुदबुदाता कि राजू चाचा जहां कहीं जिस जेल में हों, उन तक मेरा शिकायतनामा पहुंच जाये और मेरे कानों में वह चुपके से जेल जाने की तरकीब फुसफुसा जायें! कान खोले चौंकन्‍ना मैं दीवानेपन में दौड़ता कमरे, दालान, छत एक कर देता, टिंगड़ी की बिल्‍ली घबराकर मुझ पर चढ़ जाती, या मेथी खोंटती सोमारु बो के हाथ का कठवत छूट जाता, मेरे कानों में सायं-सायं का शोर गूंजता रहता, हंसते हुए राजू चाचा के जवाब की तसल्‍ली उन कानों में कभी नहीं उतरती!

देवनरायन सर स्‍कूल के लिए उछलकर साइकिल पर चढ़ते परेशान होते कि देखो, यहीये देश था एक ठो पुश्किन पैदा किये था, और वहीये देश है एक गो पुतिन जहंवा गंध मचाये है! चुपचाप आगे चाल की डोल में चले जा रहे नीले हवाई चप्‍पल के अपने पैरों में डूबा मैं देवनरायन सर और उनकी बातों को देखने की जगह संध्‍या तिवारी को निरखने लगता जो स्‍कूल के लिए स्‍कर्ट सहेजकर करीने से रिक्‍शे में जगह लेकर बैठती और फिर गोद में उंगलियों के साथ धीमे-धीमे जाने क्‍या खेलने लगती और मैं सड़क के किनारे-किनारे उसके साथ तेज़ी से चलने लगता और चूंकि होशियार नहीं होता कभी जान नहीं पाता कि वह क्‍या है जिसे संध्‍या तिवारी अपनी उंगलियों के बीच लेकर खेलती रहती, और मैं यह सोच-सोचकर मचलता दीवाना हुआ जाता कि अभी और कितना-कितना समय और होता कि मैं संध्‍या तिवारी के खेल का रहस्‍यलोक भेद नहीं पाता और टूटकर, हारकर, तड़पकर, सारे जतनों के बावजूद स्‍कूल से छूटकर शहर के दूसरे ओर-छोर तक भले पहुंच जाऊं, किसी भी तरह जेल नहीं ही पहुंच पाता? जेल पहुंचकर सुखी होनेवाले घर के वे दूसरे मर्द थे. घर से बेचैन होकर भागनेवाली वे लड़कियां भी दूसरी ही थीं, मैं वह दूसरा नहीं था. मेरी होशियारी सपना थी और बेचैनियां निरुद्देश्‍य. मैं जो था अपने ख़यालों की महीनियों में और भीड़ के बेमतलब पन्‍नों में कैद था, उससे बाहर मैं कहीं नहीं था. कुछ नहीं था!

त्‍यौहार के भोज के लिए पांत में पत्‍तल सजाये जाते, नंगे पैर और सस्‍ते यूनिफार्म में कोई नामालूम बैंड पिपिहरी और ड्रम पर ‘सच्‍चा-झूठा’ फिल्‍म का गाना चीखता, रेलवे फाटक के नज़दीक वाले केबिन में नवीन सिन्‍हा अपनी चिरपरिचित गुमनाम पगलेटी में चिलीयन व कोलम्बियन कवियों का भोजपुरी में तर्जुमा करने की हास्‍यास्‍पद कोशिश में खांस-खांसकर और बीमार हुए जाते, साईकिल दुकान से लगे टीन की आड़ में तापस की टीपू एक के बाद एक सात पिल्‍ले पैदा करती और पिनाकी बोस के यहां डाक से खुद का दस्‍तखत किया, अंग्रेजी में ‘लव एंड विशेस’ का डिक्‍लरेशन करता, साक्षात असल विजय अरोड़ा की फोटो आती, और अभी डेढ़ दिन भी नहीं गुजरता कि विजेंदर फूफा हथेली पर खैनी पीटते, जाने किसको चैलेंज करते, सबकी सूचनार्थ डिक्‍लेयर करते कि इसमें सरप्राइस क्‍या है, फोटो हमारे पास भी आया था, बहुत पहले से आया है, बेला बोस, विश्‍वजीत, जाय मुखर्जी तीनों का पाये थे, और सिग्‍नेचर, लब और अफेक्‍सन सब हम्‍मों पाये रहे, साला, कौन नवका ऐसा आप मैदान मार लिये हो, हं?

मैं टीपू के पिल्‍लों और बेला बोस और विजय अरोड़ा सबको भूला, भरे मैदान में गिरा कसकर आंखें मींचे फुसफुसाता मुझको इस मैदान के अदृश्‍य घेरों से बचा लो, राजू, मनोहर, देवानंद, सुरंजन चाचा! निकलकर भाग जाने दो उन न दिखती रेलगाड़ि‍यों की छुकछुक और बस अड्डों की घरड़-धरड़ में, इस धंसे हुए घर और फंसे हुए समय से बहुत बहुत, बहुत दूर?

रंजु दी पुड़ि‍या के गमकौवे मसाले से मुंह भरती, गाल में गड्ढा बनाती मुस्कियाती, ‘तोरा बहुत गल्‍तफहमी है, मुन्‍ना, कि तू निकल जायेगा, उड़ जायेगा! कहां से जायेगा? उड़ने के लिए पंख से ज्‍यादा पहले देह जरूरी है, वो है तोरा पास? रियल सोल इन ए रियल बाड़ी? इट इस नाट! दैट इस जस्‍ट नाट हीयर, यू आर नाट! डोंट यू गेट दैट, यू डंबविट फूल?

(बाकी..)

1 comment:

  1. सारे अंधेरों और बेचैनियों के बाद भी भाग जाना सबके मिजाज के बस का नहीं. बढ़ियल पोस्ट चढ़ाए.

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