भागने को सपना नहीं होगा.
सपनों का कोई जेल नहीं होगा.
तो मेरी मुश्किलों का यही जवाब था कि उड़ने का ख़्याल छोड़ दूं, जमीन पर गिरा रहूं? रंजु दी के बेसिर-पैर के जीवन और कुछ वैसे ही सिर-पैर वाली अंग्रेजी को कान सटाये, कलेजा जोड़े सुनूं, सुनता रहूं और लिखना भूल जाऊं? क्योंकि उसकी कोई ‘बाडी’ होगी भी तो उसका कोई ‘यहां’ नहीं होगा, हीयरिंग नहीं होगी, लिखना लिखना लिखना कितना होगा, उसका सुनना कहीं नहीं होगा? भागने को कोई सपना, सपनों का कोई जेल नहीं होगा?
मुंह में मसाला और दिमाग में बौड़मपना विरजवायी रंजु दी ही नहीं, रामजी सर, बाबूलाल सर, टंकी सर, सुरलता मैडम भी ताड़कर, आंखें फाड़कर सुनाना ही चाहती हैं, सुनना कौन चाहता है, कोई नहीं? आत्मा में झांककर सपनों का जेल देखने, टटोलने की तो किसी को फ़ुरसत नहीं.
चंद्रमोहन झा अलबत्ता, कभी-कभार मधुमेह की मार से उनका मन मुरझाया नहीं रहता तब साइकिल, ईनार, संसार को कुछ देर के लिए अपने से दूर करके मुझे टटोलने ज़रूर चले आते, ‘क्या लिख रहे हो, मुन्ना? मुन्ना ही नाम है न तुम्हारा?’
‘नहीं मालूम मुझे,’ चिढ़ा हुआ जवाब देकर मैं कहीं दूर देखने लगता, ‘रंजु दी और मंजु से जाके क्यों नहीं पूछते? वही जानती हैं, उन्हीं को मालूम है सब!’
रंजु दी सिर-पैर वाला सुनाया करती, मंजु बेसिर-पैर के मेरे जान के पीछे पड़ी रहती, बहुत बार जब देह में ज़रा-सा जान न बची हो तब भी! अब इसी करतूती क़िस्से का ही देखिये, जामुन का खूब बड़ा पेड़ है. इतना बड़ा कि उसमें जामुन कितना, कहां कम कहां ज्यादा फले हैं देखने के लिए भी आंखों पर हाथ की छांह करनी होती, गरदन ऊपर ताने खूब जोर देकर देखना होता, और तब भी अंदाज़ गड़बड़ाया ही रहता, और सही का जायजा लेने की एके सूरत होती कि जितना भी असंभव हो, पेड़ पर चढ़ लिया जाये, और वही मैंने किया भी था, अब यह और बात है कि वैसी ऊंचाई तक पहुंच जाने के बाद अब उतरना असंभव हो रहा था! और इसके बाद तो और जब मंजु नीचे से मौका ताड़ती, हाथ में झाड़ की एक छड़ी फटकारती आकर नीचे खड़ी हुई और गरदन उचका-उचकाकर ऊपर तंज के ढेले उछालने लगी, ‘आते हो कि नहीं नीचे? आते हो कि बुलायें बुन्नू मौसी के? ऊपरे-ऊपरे तुम भागने की कोशिश कर रहे हो न, हमको सब मालूम है! सोचे वहींये वहीं उड़ जाओगे और किसी को खबर नै होगा, हं?’
थोड़ी देर तक अपने हेराये मन को समय और स्थान में सुस्थिर करते चंद्रमोहन झा फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू करते. कहने मुश्किल होता मुझे सुना रहे हैं, या स्वयं को बता रहे हैं. ‘इस दुनिया में कौन सुखी है? कोई सुखी नहीं, मुन्ना!’
‘मैं मुन्ना नहीं!’ मैं चीखकर गुस्से में खड़ा हो जाता.
चंद्रमोहन झा चौंककर मुझे देखते, फिर कातरता में मुस्कराने लगते. ‘ठीक है. जैसा तुम कहो. जैसा मैं कह रहा था.. बैठ जाओ अब. यह कक्षा थोड़ी है जो तुम खड़ा होने का दंड पाओ, बैठो.’
मैं ज़िद में खड़ा रहता, जैसे ज़िद में कक्षा में बैठा रहता. या जामुन के पेड़ पर ‘बैठा हूं’ के अभिनय की आड़ में खड़ा हो-होकर बैठता रहता.
चंद्रमोहन झा धीमे-धीमे सिर झुकाये मुस्कराते, उदासीनता की अपनी दुनिया खोलते, ‘इंजीनियर है, दुकानदार है, किसान है, किसकी जिंदगी सुखी है? सुखी नहीं है तो इंजीनियर दुकानदारी, किसानी छोड़ दें, वही संसार में उनके होने का, रात में सोने और दिन में जागने का मतलब है, जीवन में उनका कर्म है, जैसे लिखनेवाले का लिखना है. उसके हाथ में बस यही इतना है कि अच्छा लेखक होगा तो अच्छी लिखाई पैदा करेगा. गुमकर आत्मा के अंधेरों और उड़कर सात आसमानों की दुनिया में घुमाई करेगा. उसकी पढ़ाई कौन करेगा, यह लिखनेवाले का नहीं, समाज का सवाल है. समाज को जिसकी खोज होगी, उसे वह पायेगा. नहीं खोज होगी तो सिनेमा के गीत-गजल सुनकर सुखी रहेगा. वही उसकी आत्मा की खुराक होगी, वह कुछ नहीं पढ़ेगा, उड़ने कहीं नहीं जायेगा, मगर वह तुम्हारी, या किसी भी लिखनेवाले की चिंता का विषय नहीं होना चाहिये!’
मैं घबराकर दुबारा बैठ जाता, ‘आप क्या कह रहे हैं, क्यों कह रहे हैं, मेरे कुछ भी समझ नहीं आता, चन्नरमोहनजी!’
चंद्रमोहन झा पर मेरी घबराहट का कोई असर न होता, जैसे वामपंथी पार्टियों में जनता के पिछड़ेपन का कभी नहीं हुआ, वह इतमीनान से अपना गाना बजाये जाते, ‘असल सवाल यह नहीं है कि तुमको कोई सुनता है या नहीं, असल बात है, मुन्ना, तुम उड़ना चाहते हो या नहीं!’
पलटकर चिल्लाते हुए मैं चंद्रमोहन झा को जवाब देना चाहता, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती. उस अंधेरे में फिर पहचानना मुश्किल होता कि चंद्रमोहन जी ही थे, या ठहरी हवाओं का खालीपन था मुंह बाये मैं जिसे सुन रहा था!
क्या मतलब है इस तरह बिना पंखों के उड़ते रहने का, या बिना लिखे लगातार लिख-लिखकर पन्ने रंगने का? सिर बथता है, सपने में सियार दिखता है, नीला आसमान और दूर तक फैला मैदान कब दिखता है?
फिर भी पागल लिखते हैं, क्यों लिखते हैं?
मेरी बात का भरोसा नहीं तो इस पागलपने को सुनिये.
(बाकी..)

"मैं ज़िद में खड़ा रहता, जैसे ज़िद में कक्षा में बैठा रहता. या जामुन के पेड़ पर ‘बैठा हूं’ के अभिनय की आड़ में खड़ा हो-होकर बैठता रहता. "- जेल जाने या भागने के लत्थन तो थे मियां। कैसे रह गए रंजू दीदी और मंजू की डांट सुनने के लिए।
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