Wednesday, March 26, 2014

कानों सुनी..

देश कैसे चलता है, दुनिया किधर जा रही है, जैसे मसलों में चिन की ज़रा दिलचस्‍पी नहीं थी. उसके लिए जो था फिलहाल वू-हान में चमड़े की पट्टि‍यां बनानेवाले कारखाने की नौकरी (पिछले चार वर्षों में यह तीसरी) और उसकी तनख्‍वाह थी (300 यूआन से शुरु होकर अब वह छह गुना 1800 पर आकर ठहरी थी, लेकिन चिन की पैसों वाली भूख को अभी चैन नहीं था). कारखाना उसके दिन के बारह से तेरह घंटे खाता, उसके बाद किसी तरह थोड़ी फुरसत अगर कभी निकलती भी तो चिन के सोचने को उसका वही इकलौता चिरपरिचित विषय होता – पैसा! कहां से उसमें चार यूआन और जुड़े, अपने बिस्‍तरे के कोने में (दस बाई चौदह के उस वर्किंग वूमंस हॉस्‍टल के कमरे को तीन और कामकाजी लड़कियां शेयर करती थीं) लैंप की रौशनी के नीचे वह गोद में एक जिल्‍दवाली नोटबुक खोलकर बैठ जाती और देर तक अपना जोड़-गुना करती रहती कि अभी इतने आयेंगे, या कितने आयेंगे कि जाकर तसल्‍ली आयेगी.

अभी सोलहवां खत्‍म भी नहीं हुआ था जब अपनी बड़ी बहन के माथे घर का जिम्‍मा छोड़कर तिन गांव से, बस और रेल मिलाकर कुल तैंतीस घंटों की दूरी भागी वू-हान मुंहबोली मौसी के पीछे-पीछे रोजगार खोजती यहां पहुंची थी. उसके बाद से पलटकर एक बार गांव नहीं गई. कि जाकर वहां करूंगी क्‍या, पैसों की कमाई गांव में होगी कि वू-हान में? और फिर घर पैसे भेज रही हूं न? और मां-बाप, घर में जो छोटा भाई है, उनकी चिंता नहीं होती, याद से मन नहीं कलपता?

ऐसे टेढ़े सवालों के जवाब में तिन गुमसुम हो जाती है, या कभी-कभी एकदम नाराज़. पिछली बार कारखाने से बीसेक किलोमीटर दूर तीन लड़कियां छुट्टी मनाने निकली थीं (दो को अपने लिए नये जूते खरीदने थे, तिन को कुछ नहीं खरीदना था, वह सिर्फ़ उनकी संगत के लिए गई थी), किसी मैकडॉनल्‍ड में वे लोग पहली मर्तबा जायका लेने अंदर गये थे, और चिन ने हंसते हुए सबको बताया था कि उसे बीच-बीच में बस यही डर लगता है कि कहीं वह अपने भाई का चेहरा भूल न जाये! नहीं तो सच्‍ची, गांव छोड़े का उसे कोई दुख नहीं. इतनी भूख लगती थी, दीदी, गांव में, हमेशा भूख लगी रहती. वो तो हाथ में पैसा पाने के बाद अब हुआ है कि खाने के बारे में चौबीस घंटे चिंता नहीं होती. आप गांव के ऐसे गुन मत गाओ, गांव में कुछ नहीं रखा!

जबकि डीन वाइसनर की कहानी एकदम उलट थी. आठ वर्षों तक यहां-वहां नौकरी करके (और ठीक-ठीक पैसा बनाते हुए भी) अचानक उसका माथा उत्‍तर और उत्‍तर की ठंडी हवाओं से एकदम सटक गया था. पहले तो उसे दारुबाजी की आदत लगी, फिर बीवी जेन के ऊपर उसका गाहे-बगाहे हाथ छोड़ना शुरु हुआ. एक दिन किसी बेमलतब जिरह के बीच गुस्‍से में सुबह-सुबह, अभी वह काम के लिए तैयार भी नहीं हुआ था, उसके हाथ से स्‍कॉच का बोतल जेन के माथे पर टूटा और भर्र-भर्र औरत चेहरे पर खून गिराने लगी और रोने के दरमियान उसके पूरे खानदान को गालियां बकने, तभी डीन को लगा था कहीं सीरियसली गड़बड़ी हो रही है. मतलब इस ऊटपंटांग के ठंड में रहते-रहते कितने समय तक किसी आदमी का माथा स्‍वस्‍थ रह सकता है! उसे नहीं रहना ऐसी घंटा जगह में जहां बगल से गुजरने वाली गाड़ि‍यों के ड्राईवर आपके मुस्‍कराने पर ज़रा सा हाथ उठाकर आपके अभिवादन का जवाब देने की जहमत तक नहीं उठाते. बच्‍चे यहीं बने रहे तो उनको कब पता चलेगा कि फार्मिंग क्‍या होती है और सुबह नदी में जाकर नहाना क्‍या होता है और साली यहां जिंदगी निकल जायेगी बच्‍चे कभी नहीं जानेंगे कि दस मील के दायरे में पड़ोस की दुनिया क्‍या है, कौन और कैसे लोग है! नहीं रहना है घंटा ऐसी दुनिया में!

चिन मुस्‍कराकर फिर बोलती, किया होगा जिसके लिए किया होगा माओ ने, हमको तो यही याद है कि बचपन में हमलोग हमेशा भूखे रहते थे!

फिर अचानक जैसे याद आया हो, चिन मचलकर बोली, देखो, मुझे मालूम भी नहीं कि अभी चेयरमैन माओ कौन है, कौन है, बोलोगी?

हू जिन्‍ताओ, पीठ पीछे बैठे किसी बुजूर्ग ने जवाब दिया.

ओह, पहचानवाली सांस लेकर चिन ने बुजूर्ग के जवाब पर हामी भरी, यानी जियांग जेमीन बाबू गये?

गये नहीं, रिटायर हुए, बुजूर्ग ने आगे बताया, उनकी जगह हू जिन्‍ताओ जिम्‍मेदारी संभाले हैं.

आह, बड़कन लोगों की बड़की जिम्‍मेदारियां, चिन मुस्‍करायी बोली, हमको तो सुबह लड़कियों की भीड़ में तसल्‍ली से नहाकर काम के लिए तैयार हो लें इसी की फुरसत नहीं निकलती, फिर बिल गेट्स साहब की एक जीवनी लाकर रखे हैं कि पढ़के कुछ अपने लिए इंसपिरेशन लेंगे, मगर फुरसत निकले काका तब न?

चोम्‍स्‍की साहब ने कहीं कहा है पूंजीवाद अपने निवेश के लिए जिस हद तक हो सके, समाज को अपने साथ गांठे रखता, उसका भरपूर दोहन करता है, उसके बाद जो मुनाफा होता है उसको वो है कि अपने से अलग और किसी के साथ बांटना नहीं चाहता!

चिन ने कभी माओ नहीं पढ़ा, वह बेचारी क्‍या खाकर कभी चोम्‍स्‍की पढ़ेगी. डीन वैसे भी यहूदियों से नफ़रत करता है.

No comments:

Post a Comment