Wednesday, March 12, 2014

बिना शीर्षक













ये जो इतना इतना है
और उसके बाद उस पर जोड़कर
कुछ इतना, रात को सारे उतनों के
हिसाब के नीचे खड़े चुप की खामोशी
में फिर दिखता है क्‍या कितना.
***
स्‍टीवन पिंकर और पैरी एंडरसन
कापुचिन्‍स्‍की और काबोमावा और
शरण शर्मा, अरुंधति, अंतोनियोनी
अचेबे, अनजान और अरागान इतनी
दुनिया में कितनी गुफ्तगुएं हैं, और
सब गुफ्तगुओं के बाद के सन्‍नाटे में
आदमी फिर अपने एकांत में
फुसफुसाता है खुद से चुपचाप
कौन गु- फ्- त- गू.

1 comment:

  1. बिना शीर्षक...
    कितने ही शीर्षक... कितने ही सन्नाटे...
    सब समेटे हुए...!!!

    ReplyDelete