Wednesday, April 30, 2014

दोपहर दोस्‍त : एक चित्र

[फोटो : कुल्‍तुर तावा]




















ढलती दोपहर के सींझते पसीनों की छांह धीमे-धीमे सूखती थी, कल फिर मिला था
उखड़ती हवा में दोस्‍त कहकर कुछ उड़ा था, अनमनी हवा ठहर गई
सकपकाकर मैं भी चुप हुआ था, दरमियानी चुप्पियां फुसफुसाकर देर तक बुदबुदाती रही
दोस्‍त.

खुशी-खुशी रोज़़ निकलता हूं, मन के आंगन में लट्टू-सा घनघनाता
अरमानों की उजली गिनती गिनता, ताख के कोने व सिरे सजाता
भागती दुनिया भूगोल के बाहर सीटियां बजाती, लम्‍बी चि‍ट्ठि‍यां लिखती घनघोर
भागता दूर से मैं नज़दीक आता ख़ुद को कैसा खुशियारा पाता

मन के सुनसान के रंगीन घमासान में यह फिर कुछ देर बाद होता
कि कांपती बुदबुदाहटें टटोल की एक आवाज़ देकर रोक लेतीं
फ़ोन पर खरखराया दूर तक एक अबोला गूंजता रहता
मैं पलटकर बोलता दोस्‍त, और आंगन में पटकती गिरती रहतीं दोपहर की सूखी
गर्म हवायें, बेदिल.

Friday, April 18, 2014

सोलेदाद की उम्र क्‍या होती है..

तो मार्क्‍वेज़ साहब गये. कितनी कहानियां सुनाते? एक जीवन में कहानियां सुनाने की भी सीमा होती है. आदमी कहानी सुनने और सुनाने ही नहीं आता इस दुनिया में. एक उम्र के बाद डॉक्‍टर क्‍या कह रहा है, उसे सुनकर और परेशान होने की जगह कंधा झुकाये नज़रों से गोद में उद्वग्निभाव कुछ खोजने का अभिनय करने के लिए भी आये रहता है. पत्‍नी से नाराज़ होकर क्‍यों ससुर तुमसे व्‍याह किये और घर छोड़ देने की बेफ़ि‍जूल धमकियां देने और नोबेल को तो अपन आलू का भंटा समझते हैं के ऊलजुलूल गाने दोहराने और फिर एकदम से सोचकर घबराने के लिए भी आता है, नहीं आता? (सिगरेट भले इतने वर्षों में न छूट सकी, मगर) पहिलकी किताब वही पढ़ी थी जिसने हुज़ूर का पतंग इतनी दूर आसमान में पहुंचा दिया था, फिर तीन पतले उपन्‍यास और बीसेक कहानियों के बाद मैंने भी मार्क्‍वेज़ साहब को सुनना छोड़ दिया था. कि भई, कब तक आपका कोलम्बियनराग सुनते रहें, सुन लिये जो सुनना था, अब कुछ कुशवाहा कांत, प्रेम वाजपेयी व अन्‍य ऐसे दूसरे साहित्‍यमणियों का भी सुनते चलें. दुनिया में सुनने को क्‍या-क्‍या है, और करने को इतना सारा प्रेम है कि ज़रुरत के बखत खोजो तो कभी अपने पास काम लायक चुटकी-भर तक नहीं निकलता. क्‍या करें इतना सारा लिखनेवाले हैं, और हम किताबों के पीछे पगलाये भटकनेवाले हैं कि कहीं कभी मन सुस्थिर होता ही नहीं. अभी कल ही बहके-बहके नज़र गई थी कि लगभग बीस किताबें हैं जिनमें हमने मन फंसाया हुआ है और कहना मुश्किल है कि ठीक-ठीक हम किसकी मुहब्‍बत में हलकान हो रहे हैं. और ऊपर से रहते-रहते इस बीस की जमावट में तीन आकर और जुड़ जाते हैं, निकलकर पाजी छूट नहीं जाते. आज सुबह किसी और संदर्भ से होकर अलेक्‍सांदर वात से चेस्‍लाव मिलोज़ की बतकुच्‍चन पर नजर गई है, गनीमत है कि हुलस में मन उमगा मगर जेब में कौड़ी नहीं हैं तो माई सेन्‍चुरी अमेज़न पर वहीं रहेगी जहां दिख रही है, मेरे बंडल पर आकर सजकर मेरे दिल पर हथौड़ा चलाने नहीं आयेगी कि पढ़ो, पढ़ो, हमें कब पढ़ रहे हो.

दूसरे फिर थामस पिकेटी साहब हैं, उनकी अदायें भी इम्‍प्रैस कर रही हैं कि हाथ बढ़ाकर लपककर उनकी ज़ि‍रह जाकर कैच करें. मगर दुनिया में इतनी ग़ैरबराबरी है और ख़ास तौर पर गरीब की गरीबी इतनी नीची है कि क्‍या खाकर हम पिकेटी साहब की ज़ि‍रह को कैच करेंगे. अभी तो नहीं ही कर सकेंगे. साथ लगभग-लगभग सारी किताबें रही हीं मार्क्‍वेज़ साहब की फिर भी उन्‍हीं को कहां कैच कर लिये? जीवन में यह ख़याल ही रहता है कि कैच करने को, मुहब्‍बत में रंगने को, अभी बहुत समय है, सब करेंगे, अपने सुभीते से करेंगे, मार्क्‍वेज़ साहब का कोलम्बिया अभी माथे में ज़्यादा हो गया है, बाद में करेंगे, माथा ठंडा होने पर करेंगे, और तब तक यही होता है कि मार्क्‍वेज़ साहब दांतों में जीभ निकाले और जाने किन-किन अदाओं वाली फोटुयें खिंचवाकर कूच भी कर जाते हैं! और मैं इसी चिन्‍ता में ख़ुद को दुबला होता देखता रहता हूं कि इतने वर्ष निकल गये लिखाइयों की घसीटाइयां करते, ससुरी, किताब छप नहीं रही थी, और अब छपी है तो हरामखोर कहीं पहुंच नहीं रही है! उल्‍टे-सीधे कुछ सिरफिरे कहते हैं कि हां, लिंक देखा, अच्‍छा तो लग रहा है, उठायेंगे उठायेंगे, और हमारी किताब उठाकर दु:खी होने के बजाय मार्क्‍वेज़ साहब के मैज़ि‍क रियलिज़्म के अवसान पर दु:खकातर होता दिखने लगते हैं..

इन दिनों मलेशियाई मूल के लंदनवासी टैश ऑ की तीसरकी किताब ‘फाईव स्‍टार बिलियनेयर’ पढ़ रहा हूं. रोचक आनन्‍ददायी किताब है. मगर जो मज़ा ‘सियेन आनोस दे सोलेदाद’ पढ़कर छह और आठ दिनों तक किसी दुनिया के मलिन, मार्मिक स्‍वप्‍नलोक में डूबे-सब बिसराये रहने का हुआ था वह आनन्‍द अतुलनीय है. ऐसा आनन्‍द जीवन में किसी उत्‍साही पढ़वैये को भी पंद्रह और बीस किताबें भर ही देती हैं. उसके बाद के आनन्‍द आनन्‍द का चुइंग गम होते हैं, दिल तोड़ कर चक्‍करघिन्‍नी-सा घुमाते रहनेवाला उनमें दीवानापन नहीं ही होता. पहली मर्तबा अस्‍सी के बीच में कभी पढ़ा था, दूसरी मर्तबा तीनेक वर्ष पहले. आनंदानुभूति वैसी ही हुई थी. और मैंने अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा था, रोते-कांखते इतने वर्षों बाद जो हिन्‍दी में अनुवाद आया, मालूम नहीं किस साहित्यिक ऊंचाई के स्‍तर का है. कोई भलेमानुस उससे गुज़रे हों तो अपनी राय ज़ाहिर करें.

गये मैज़ि‍क रियलिज़्म के खिलवैया. संगे-संगे सब अदायें गईं उनकी. बची रह गई हैं हमारी मोहन चोटी और जगदीप धूमाल वाली टिनही पिपिहरी अदायें. उसी में अब बाख़ मोत्‍ज़ार्ट जो सुनना हो, सुनने की अमीरी पायें. और हां, मेरी किताब खरीदते हुए पायें. आप लोग खरीद क्‍यों नहीं रहे हैं, भई? कोई नहीं खरीद रहा! मैं इतना बुरा लिखता हूं? यह सही है कि बहुत अच्‍छा नहीं लिख पाता, और तीन अच्‍छी पंक्तियों के लिख लिये जाने के बाद माथे की नसें चटकने लगती हैं, फिर भी इसका यह मतलब थोड़े हुआ कि आप सीधे-सीधे किताब खरीदने से अपने को बचा लिये जायेंगे? हिन्‍दी साहित्‍य की आपको चिन्‍ता न हो, बात समझ में आती है क्‍योंकि हिन्‍दी साहित्‍य की चिन्‍ता ख़ुद हिन्‍दी साहित्‍य को नहीं है, मगर मेरे साहित्‍य भविष्‍य की तो आपको ज़रा सी चिन्‍ता होनी चाहिये. माने कम से कम दस चुइंग गम बराबर, हां?

आसपास घरवालों की मौज़ूदगी में शर्म महसूस होती हो तो देर रात सबसे आंख बचाकर ही किताब ऑर्डर करिये, बहाने और बचाव के लॉजिक मत समझाइये मुझे (वो ख़ुद मैं अपने को काफी देता रहता हूं), अंधेरे में चुप्‍पे ऑर्डर कीजिये और किताब पाने के बाद फिर सिर पीटने का मन करे तो आप जानते ही हैं मेरी छाती और पीठ कहां पाई जा सकती है, या ख़ुद से भागा हुआ मैं किस ब्‍लॉग पर छिपा पाया जाऊंगा. लेकिन पहले ऑर्डर कीजिये. लिंक यह रहा.

और हां, अदियोस मायेस्त्रो ग्रांदे!

Friday, April 11, 2014

घुमरियां

[फोटो : वकील कोसर]













|| एक ||

दारुण दुर्दांत विशेषणों नहायी कथाओं के
इस भयकातर समय में
नहीं पायी अपनी कहानियों के एक ज़रा एकांत को रह-रहकर टटोलने
फटी धूप के बीचों-बीच फटे गमछे की खीझ-सा फटकने लगता
घबराया गोड़ हिलाता (मन मिज़ाज का उजियारा रहा तो कभी गाल भी बजाता)
बुदबुदाता गुनगुनाता उंगलियों पर मैं अपना समय गिनता हूं.

|| दो ||

तुम कहना उम्‍मीद

और उस हरमखोर छलावे में
हंसने का मैं घटिया अभिनय जीता
मुरचाखायी चेन-उतरी साइकिल रपटता

दरअसल रोता

इक पूरी उम्र गुज़ारे जाता.

|| तीन ||

तड़पकर वह जो छूट जाना होगा
और सिहरे दीवानगी में फिर वापस बुलाना

लपकती, आह, कैसी तो कितनी आग होगी
धू-धू शां शन्‍नाक् सड़ सड़ाक

रौशनी का उफ़्फ़ मगर उसमें इक ज़रा गाना न होगा.

|| चार ||

खड़ा था खोया एक अधूरी याद के इन्‍तज़ार में
भीजता वह थी दूसरी जिस याद की संगत में

प्रेम होता तो इस तरह आंख न फड़कती

बीच गरमी मेरी सामाजिकता का पाजी
यह सूख रहा घड़ा होता.