Friday, April 11, 2014

घुमरियां

[फोटो : वकील कोसर]













|| एक ||

दारुण दुर्दांत विशेषणों नहायी कथाओं के
इस भयकातर समय में
नहीं पायी अपनी कहानियों के एक ज़रा एकांत को रह-रहकर टटोलने
फटी धूप के बीचों-बीच फटे गमछे की खीझ-सा फटकने लगता
घबराया गोड़ हिलाता (मन मिज़ाज का उजियारा रहा तो कभी गाल भी बजाता)
बुदबुदाता गुनगुनाता उंगलियों पर मैं अपना समय गिनता हूं.

|| दो ||

तुम कहना उम्‍मीद

और उस हरमखोर छलावे में
हंसने का मैं घटिया अभिनय जीता
मुरचाखायी चेन-उतरी साइकिल रपटता

दरअसल रोता

इक पूरी उम्र गुज़ारे जाता.

|| तीन ||

तड़पकर वह जो छूट जाना होगा
और सिहरे दीवानगी में फिर वापस बुलाना

लपकती, आह, कैसी तो कितनी आग होगी
धू-धू शां शन्‍नाक् सड़ सड़ाक

रौशनी का उफ़्फ़ मगर उसमें इक ज़रा गाना न होगा.

|| चार ||

खड़ा था खोया एक अधूरी याद के इन्‍तज़ार में
भीजता वह थी दूसरी जिस याद की संगत में

प्रेम होता तो इस तरह आंख न फड़कती

बीच गरमी मेरी सामाजिकता का पाजी
यह सूख रहा घड़ा होता.

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