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| [फोटो : वकील कोसर] |
|| एक ||
दारुण दुर्दांत विशेषणों नहायी कथाओं के
इस भयकातर समय में
नहीं पायी अपनी कहानियों के एक ज़रा एकांत को रह-रहकर टटोलने
फटी धूप के बीचों-बीच फटे गमछे की खीझ-सा फटकने लगता
घबराया गोड़ हिलाता (मन मिज़ाज का उजियारा रहा तो कभी गाल भी बजाता)
बुदबुदाता गुनगुनाता उंगलियों पर मैं अपना समय गिनता हूं.
|| दो ||
तुम कहना उम्मीद
और उस हरमखोर छलावे में
हंसने का मैं घटिया अभिनय जीता
मुरचाखायी चेन-उतरी साइकिल रपटता
दरअसल रोता
इक पूरी उम्र गुज़ारे जाता.
|| तीन ||
तड़पकर वह जो छूट जाना होगा
और सिहरे दीवानगी में फिर वापस बुलाना
लपकती, आह, कैसी तो कितनी आग होगी
धू-धू शां शन्नाक् सड़ सड़ाक
रौशनी का उफ़्फ़ मगर उसमें इक ज़रा गाना न होगा.
|| चार ||
खड़ा था खोया एक अधूरी याद के इन्तज़ार में
भीजता वह थी दूसरी जिस याद की संगत में
प्रेम होता तो इस तरह आंख न फड़कती
बीच गरमी मेरी सामाजिकता का पाजी
यह सूख रहा घड़ा होता.

इतनी उदासी
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